बलूचिस्तान में भारी नुकसान के बाद पाक सेना बैकफुट पर, रिटायर्ड जवानों की वापसी को 30 अक्टूबर की डेडलाइन
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में बढ़ते हमलों तथा जवानों की सेवा त्याग की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण गंभीर जनबल संकट में घिरती जा रही है। इस कमी को पाटने के लिए फ्रंटियर कॉर्प्स, बलूचिस्तान (उत्तर) के इंस्पेक्टर जनरल ने एक आधिकारिक संदेश जारी कर सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों को 30 अक्टूबर 2026 तक तत्काल रिपोर्ट करने और दोबारा भर्ती होने का निर्देश दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम इस बात का संकेत है कि पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र अभूतपूर्व दबाव में है।
जनबल संकट की जड़ें
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पाक सेना इस समय दो मोर्चों पर एक साथ मार झेल रही है। एक तरफ बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए), बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) और तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हमलों में हताहतों की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो दूसरी ओर मनोबल टूटने से बड़ी संख्या में सैनिक नौकरी छोड़ रहे हैं या लापता हो रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, "उनका मनोबल गिरा हुआ है और वे अब लड़ना नहीं चाहते, इसलिए वे नौकरी छोड़ रहे हैं।"
अकेले सितंबर 2026 में इन अलगाववादी गुटों ने सुरक्षा बलों पर 94 हमले किए। बीएलए ने दावा किया है कि इन हमलों में उसने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के 105 जवानों को मार गिराया। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
ऑपरेशन तेज़ करने की तैयारी या मजबूरी?
एक अधिकारी के अनुसार इस संदेश के दो संभावित अर्थ हैं। पहला यह कि सेना वास्तव में जनबल की भारी कमी से जूझ रही है। दूसरा यह कि पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान और केपी में अपने ऑपरेशन तेज़ करने की योजना बना रही है। अधिकारी ने कहा, "बीएलए और बीएलएफ जैसे गुटों ने अपनी क्षमताएँ काफी बढ़ा ली हैं और महिला सुसाइड यूनिट भी बनाई हैं, जिन्होंने सुरक्षा बलों पर सफल हमले किए हैं।"
विशेषज्ञों का कहना है कि मस्तुंग, नुश्की, खान, टेक, वाशुक और पंजूर जैसे इलाकों में बीएलए और बीएलएफ ने पाक सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुँचाया है। ये इलाके बीएलए के गढ़ माने जाते हैं और यहाँ घात लगाकर किए गए हमलों में काफिलों और चेकपोस्टों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया है।
रिटायर्ड जवानों की वापसी: शर्तें और फायदे
जारी संदेश के अनुसार 30 अक्टूबर 2026 की समय सीमा तय की गई है, लेकिन वापसी को अनिवार्य नहीं किया गया है। वापस आने वाले जवानों के लिए कोई उम्र सीमा भी तय नहीं है। वापसी पर उन्हें उनकी पिछली सर्विस के अनुसार वेतन दिया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार रिटायर्ड जवानों को इसलिए प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि वे अनुभवी होते हैं और बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के तत्काल ऑपरेशन में शामिल हो सकते हैं।
कथित तौर पर हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने कई रिटायर्ड सैनिकों को लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे गुटों के साथ मिलकर तैनात किया है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
ज़मीनी हालात और स्थानीय समर्थन का असर
विश्लेषकों के अनुसार बलूचिस्तान और केपी के कई इलाकों में बीएलए, बीएलएफ और टीटीपी का व्यावहारिक नियंत्रण बन गया है। स्थानीय आबादी का समर्थन मिलने से इन गुटों की ह्यूमन इंटेलिजेंस क्षमता मजबूत हुई है। इसका सीधा असर यह है कि सुरक्षा बलों को जमीनी सूचनाएँ नहीं मिल पा रहीं, जो हताहतों की बढ़ती संख्या की एक अहम वजह मानी जा रही है।
आने वाले समय में पाकिस्तान की प्राथमिकता केपी से पहले बलूचिस्तान में हालात स्थिर करने की होगी, लेकिन बीएलए की बढ़ती मारक क्षमता और सेना के गिरते मनोबल को देखते हुए यह काम आसान नहीं होगा।