पाकिस्तान में 2.62 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर, गरीब परिवारों के सामने शिक्षा की गहरी खाई
सारांश
Key Takeaways
पाकिस्तान में गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों को शिक्षा हासिल करने में अब भी गंभीर संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, जबकि संपन्न परिवारों के बच्चों को बेहतर स्कूलिंग और उज्ज्वल करियर के अवसर सहज उपलब्ध हैं। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में प्रकाशित एक रिपोर्ट और संपादकीय के अनुसार, यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक और सामाजिक भी है — और दशकों से जस की तस बनी हुई है।
चौंकाने वाले आँकड़े
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में करीब 2.62 करोड़ बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं। इनमें 1.34 करोड़ लड़कियाँ शामिल हैं, जो इस संकट में लैंगिक असमानता की गहरी परत को उजागर करती हैं। स्कूल जाने की उम्र के लगभग 20 से 28 प्रतिशत बच्चे किसी भी शैक्षणिक संस्थान में नामांकित नहीं हैं। इनमें से कई बच्चों को शिक्षा के बजाय जीविका कमाने को प्राथमिकता देनी पड़ती है।
शिक्षा का अधिकार: सबके लिए नहीं?
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के संपादकीय में सवाल उठाया गया कि कुछ बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिलता है, जबकि अन्य इससे क्यों वंचित रह जाते हैं। गुणवत्तापूर्ण स्कूल केवल उन्हीं के लिए क्यों हैं जो उनका खर्च उठा सकते हैं, जबकि लाखों बच्चों को कमज़ोर विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ता है। संपादकीय में यह भी कहा गया कि बच्चे जन्म से समान होते हैं और उनमें वर्ग, हैसियत या भेदभाव की कोई भावना नहीं होती — समाज ही उन्हें असमानता और ऊँच-नीच का एहसास कराता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति सबसे विकट
रिपोर्ट में बताया गया कि खासतौर पर ग्रामीण और संसाधनों की कमी वाले क्षेत्रों के लाखों बच्चों को बुनियादी अधिकार भी उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी के अवसरों तक सीमित पहुँच मिलती है। यह ऐसे समय में और भी चिंताजनक है जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और बजटीय दबावों से जूझ रहा है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सहायक प्रोफेसर मुजीब अली ने कहा कि वर्षों बाद भी वही स्थिति बनी हुई है। उनके अनुसार, संपन्न परिवारों के बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ और बेहतर अवसर मिलते हैं, जिससे वे प्रतिष्ठित करियर तक पहुँचते हैं। दूसरी ओर, गरीब परिवारों के बच्चों को कमज़ोर सरकारी स्कूल, सीमित संसाधन और अपर्याप्त सहयोग मिलता है।
मुजीब अली ने स्पष्ट शब्दों में कहा,