पाकिस्तान मध्य पूर्व में सैन्य प्रतिबद्धताएं बढ़ा रहा, अफगान-भारत मोर्चे अभी भी सक्रिय: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान एक साथ कई सक्रिय संघर्ष मोर्चों — अफगान सीमा पर हवाई हमले और भारत के साथ नाजुक तनाव-शमन प्रक्रिया — से जूझते हुए भी मध्य पूर्व में अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं का विस्तार कर रहा है। यूरोपीय समाचार वेबसाइट 'ईयू रिपोर्टर' में लेखिका दिमित्रा स्टाइकू की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है, जो 13 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हुई। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर नए हवाई हमले किए, जबकि भारत के साथ उसके संबंध अभी भी नाजुक दौर में हैं।
मक्का त्रिपक्षीय रक्षा समझौता
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा — यानी एक तरह की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस समझौते के बारे में कहा था कि यह 'सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने और क्षेत्र तथा उससे बाहर शांति, सुरक्षा एवं स्थिरता को बढ़ावा देने के तीनों देशों के साझा संकल्प को दर्शाता है।' 5 अक्टूबर 2026 को इस्लामाबाद ने इसी समझौते के तहत सऊदी अरब में सैन्य बलों की त्वरित तैनाती को लेकर तुर्किये के साथ सहमति भी जताई।
हूती संघर्ष में बढ़ती भागीदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, हूती विद्रोहियों के साथ सऊदी अरब का टकराव बढ़ने के बीच पाकिस्तान की भागीदारी अब केवल कूटनीतिक एकजुटता तक सीमित नहीं रही। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान का समर्थन अब सैन्य उपकरणों, सलाहकारों और अभियान संबंधी सहायता तक पहुँच चुका है। हालाँकि, पाकिस्तान ने अभी तक यमन में लड़ाई के लिए अपनी सेना प्रत्यक्ष रूप से तैनात करने का कोई औपचारिक फैसला नहीं किया है।
स्टाइकू ने रिपोर्ट में यह भी उठाया कि पाकिस्तान की यह बढ़ती भागीदारी रक्षा प्रतिबद्धताओं, सैन्य समन्वय, सलाहकारों और सैन्य सामग्री की आपूर्ति के रास्ते और गहरी हो सकती है।
पश्चिमी और पूर्वी मोर्चे पर दबाव
पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर स्थिति पहले से ही जटिल है। तालिबान सरकार के साथ बढ़ते टकराव और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से उत्पन्न खतरे ने पाकिस्तान की अफगान सीमा को एक सक्रिय संघर्ष क्षेत्र में बदल दिया है। सितंबर के आखिर में अफगानिस्तान के भीतर नए हवाई हमले इसी पृष्ठभूमि में हुए।
पूर्वी मोर्चे पर भारत के साथ संबंध भी दबाव में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के गंभीर सैन्य टकराव के बाद तनाव कम करने की नाजुक प्रक्रिया जारी है, जबकि सिंधु जल संधि से जुड़ा विवाद भी अभी अनसुलझा है।
2015 का संसदीय फैसला और मौजूदा स्थिति की तुलना
रिपोर्ट में वर्ष 2015 की उस घटना का उल्लेख किया गया है जब सऊदी अरब ने यमन में सैन्य हस्तक्षेप के लिए पाकिस्तान से मदद माँगी थी। उस समय पाकिस्तान की संसद में इस मुद्दे पर बहस हुई और निर्वाचित सांसदों ने तटस्थ रहने का फैसला किया था। उनकी मुख्य चिंता थी कि सैन्य हस्तक्षेप से ईरान के साथ संबंध बिगड़ सकते हैं और देश के भीतर शिया-सुन्नी तनाव बढ़ सकता है।
लेखिका स्टाइकू ने इस ऐतिहासिक फैसले की तुलना मौजूदा स्थिति से करते हुए कहा कि वर्ष 2026 में सैन्य प्रतिष्ठान की 'क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने, रणनीतिक प्रतिष्ठा हासिल करने और खाड़ी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बनने' की महत्वाकांक्षाओं को देश के हितों के रूप में पेश किए जाने का खतरा है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल
रिपोर्ट में इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई गई है कि इन सैन्य फैसलों पर संसद में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और निगरानी कितनी प्रभावी है। स्टाइकू ने स्पष्ट लिखा कि 'पाकिस्तान के सैन्य जनरलों के हितों को स्वतः ही पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों के बराबर नहीं माना जा सकता।'
उनके अनुसार, जब निर्वाचित संस्थाओं के पास इन दोनों के बीच अंतर तय करने की शक्ति कम हो जाती है, तो जरूरत से ज्यादा रणनीतिक विस्तार केवल खराब विदेश नीति का मामला नहीं रह जाता — बल्कि यह भी दिखाता है कि वास्तव में देश पर शासन कौन कर रहा है। पाकिस्तान की आगामी विदेश नीति की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या नागरिक संस्थाएं इन फैसलों पर नियंत्रण पुनः स्थापित कर पाती हैं।