मक्का समझौता: पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये का पहचान-आधारित गठबंधन कितना टिकाऊ?
सारांश
मुख्य बातें
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए मक्का समझौते की दीर्घकालिक व्यवहार्यता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल धार्मिक या पहचान-आधारित साझेदारी किसी सुदृढ़ सुरक्षा गठबंधन की नींव नहीं बन सकती — इसके लिए साझा सुरक्षा खतरे, स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य और सदस्य देशों की पारस्परिक प्रतिबद्धता अनिवार्य होती है। 7 अगस्त को मक्का में हुआ यह समझौता अंतरराष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
गठबंधन की ऐतिहासिक कसौटी
विश्लेषकों के अनुसार, शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों का गठबंधन इसलिए सफल रहा क्योंकि सोवियत संघ के रूप में उनके सामने एक साझा और स्पष्ट खतरा था। सभी सदस्य देशों के सुरक्षा हित और भू-राजनीतिक चिंताएँ एक-दूसरे से मेल खाती थीं, इसलिए वे गठबंधन की लागत और ज़िम्मेदारियाँ साझा करने को तैयार थे।
इसके विपरीत, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये तीन अलग-अलग क्षेत्रों — दक्षिण एशिया, खाड़ी और पश्चिम एशिया — में स्थित हैं और उनकी सुरक्षा चुनौतियाँ भिन्न हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह भौगोलिक और रणनीतिक विभाजन गठबंधन की व्यावहारिकता को कमज़ोर करता है।
साझा खतरे का अभाव
विश्लेषण में एक केंद्रीय सवाल उठाया गया है — इन तीनों देशों का साझा सुरक्षा खतरा आखिर क्या है? यदि भारत के साथ तनाव की स्थिति में पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई का सामना करता है, तो क्या सऊदी अरब या तुर्किये उसकी प्रत्यक्ष सैन्य मदद करेंगे? इसी तरह, यदि ईरान या हूती बलों द्वारा सऊदी अरब पर हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेंगे?
तुर्किये का प्रमुख सुरक्षा मुद्दा कुर्द बलों से जुड़ा है, जिसमें पाकिस्तान या सऊदी अरब की कोई स्पष्ट भूमिका नहीं है। एक देश पर हमले को तीनों पर हमला मानने की शर्त — जैसी NATO में है — यहाँ अनुपस्थित है, जो इस साझेदारी की सबसे बड़ी कमज़ोरी मानी जा रही है।
पहचान-आधारित गठबंधन की सीमाएँ
विशेषज्ञों का कहना है कि साझा मुस्लिम पहचान के आधार पर बने गठबंधन ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर साबित हुए हैं। 2019 के कुआलालंपुर शिखर सम्मेलन का उदाहरण उल्लेखनीय है, जब पाकिस्तान और तुर्किये ने मलेशिया के साथ मिलकर मुस्लिम दुनिया में सऊदी नेतृत्व को चुनौती देने का प्रयास किया था।
गौरतलब है कि आज सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे मुस्लिम-बहुल देश सूडान संघर्ष में अलग-अलग पक्षों का समर्थन कर रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक एकता राष्ट्रीय हितों के टकराव को नहीं रोक सकती।
फिलिस्तीन और क्षेत्रीय विरोधाभास
मक्का समझौते में फिलिस्तीन का मुद्दा साझा चिंता के रूप में उल्लिखित है। परंतु विश्लेषकों के अनुसार, फिलिस्तीन के समर्थन में सबसे सक्रिय ताकतें ईरान और हूती हैं — जिनके साथ सऊदी अरब के संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। यह विरोधाभास इस गठबंधन की रणनीतिक सुसंगतता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
विश्लेषण के अनुसार, मक्का समझौता पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में उभरा एक राजनीतिक समन्वय है — न कि कोई दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था। तीनों देशों को जोड़ने वाली कोई व्यापक साझा रक्षा नीति या रणनीतिक रोडमैप अभी तक सामने नहीं आई है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का संदर्भ
विश्लेषण में भारत की विदेश नीति का भी उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है और अपने सुरक्षा तथा आर्थिक हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लिए हैं। अमेरिका के साथ मज़बूत रक्षा और आर्थिक संबंध होने के बावजूद भारत ने क्यूबा, ईरान या चीन के प्रति वाशिंगटन की नीतियों को स्वतः नहीं अपनाया।
यह उदाहरण दर्शाता है कि राष्ट्रीय हितों पर आधारित व्यावहारिक कूटनीति, पहचान-आधारित गठबंधन से अधिक टिकाऊ सिद्ध होती है। मक्का समझौते की परीक्षा तब होगी जब इन तीन देशों में से किसी एक को वास्तविक सुरक्षा संकट का सामना करना पड़े और देखा जाए कि बाकी दो किस हद तक साथ खड़े होते हैं।