मुंबई: केईएम अस्पताल में 700 ग्राम के प्रीमेच्योर शिशु को 5 महीने बाद मिली नई जिंदगी
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई के केईएम अस्पताल की नवजात गहन देखभाल इकाई (एनआईसीयू) ने नियोनेटल केयर के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है — मात्र 700 ग्राम वजन के साथ समय से पहले जन्मे एक शिशु को 5 महीने की सघन देखभाल के बाद 3.3 किलोग्राम वजन के साथ स्वस्थ घर भेजा गया। बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) द्वारा संचालित इस सरकारी अस्पताल ने रविवार को शिशु को छुट्टी दी, जो अब पूरी तरह माँ का दूध पी रहा है।
मुख्य घटनाक्रम
जन्म के समय शिशु की हालत अत्यंत नाजुक थी, इसलिए उसे तुरंत केईएम अस्पताल के नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में भर्ती किया गया। अगले 5 महीनों तक विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम ने चौबीसों घंटे निगरानी रखते हुए उसकी देखभाल की। अस्पताल के बयान के अनुसार, शिशु को गहन देखभाल और श्वसन सहायता (रेस्पिरेटरी सपोर्ट) की लगातार आवश्यकता पड़ी।
चिकित्सा चुनौतियाँ और विशेषज्ञ देखभाल
नियोनेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. अनीता हरिबालकृष्ण की देखरेख में यह पूरी उपचार प्रक्रिया संपन्न हुई। डॉक्टरों के अनुसार, शिशु ने इलाज के दौरान कई जानलेवा जटिलताओं का सामना किया। लगातार निगरानी, अनेक विशेषज्ञों की संयुक्त देखभाल और मेडिकल व नर्सिंग टीम के अथक परिश्रम से इन जटिलताओं पर धीरे-धीरे काबू पाया गया।
अस्पताल ने अपने बयान में कहा कि यह सफलता केईएम की एनआईसीयू सुविधाओं, डॉक्टरों की विशेषज्ञता और टीम वर्क का परिणाम है, जो सबसे नाजुक नवजात शिशुओं का उपचार संभव बनाती है।
यह पहली बार नहीं
गौरतलब है कि नवजात देखभाल के क्षेत्र में यह कोई अकेली उपलब्धि नहीं है। इसी वर्ष मार्च में, नागपुर के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञों ने 26 सप्ताह में समय से पहले जन्मे 700 ग्राम वजन के एक अन्य शिशु की जान बचाई थी। उस मामले में एनआईसीयू में 100 दिनों की सघन देखभाल के बाद, जब शिशु का वजन 1.88 किलोग्राम हो गया, तो उसे स्थिर हालत में छुट्टी दी गई थी। उस शिशु को सांस लेने में गंभीर परेशानी थी और जन्मजात हृदय संबंधी समस्याओं का भी उपचार करना पड़ा था।
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की ताकत
यह ऐसे समय में आया है जब सरकारी अस्पतालों की संसाधन सीमाओं को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं। बीएमसी द्वारा संचालित केईएम अस्पताल जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का यह प्रयास दर्शाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में भी उच्च-स्तरीय नियोनेटल केयर संभव है। आने वाले समय में ऐसी और सफलताएँ भारत की नवजात मृत्यु दर को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं।