मक्का त्रिपक्षीय समझौता: साझा दुश्मन नहीं, विचारधारा अलग — रिपोर्ट में गहरे विरोधाभास उजागर
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच अगस्त 2026 की शुरुआत में हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को नाटो जैसे सुरक्षा ढाँचे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन कनाडा स्थित विश्लेषण संस्था जियोपॉलिटिकल मॉनिटर की एक रिपोर्ट इस दावे पर गंभीर सवाल उठाती है। रिपोर्ट के अनुसार, इस त्रिपक्षीय पक्ष में न कोई साझा मूल्य हैं, न समान हित, न एक जैसी खतरे की पहचान और न ही कोई साझा दुश्मन — जो किसी भी टिकाऊ सैन्य गठबंधन की बुनियादी शर्तें मानी जाती हैं।
समझौते की पृष्ठभूमि और दावे
रिपोर्ट बताती है कि ईरान युद्ध ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति को बदल दिया है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बार-बार निशाना बनाया गया है और अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को समुद्री यातायात और ऊर्जा आपूर्ति के लिए पूरी तरह खुला रखने में असमर्थ रहा है। इस पृष्ठभूमि में मध्य पूर्व के देश वाशिंगटन से परे अपने रक्षा साझेदारों में विविधता लाने की दिशा में बढ़े हैं।
मक्का समझौते में नाटो के अनुच्छेद 5 जैसा प्रावधान शामिल है, जिसके तहत तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। यही प्रावधान इसे नाटो की तर्ज पर एक बाध्यकारी रक्षा संधि का रूप देता है।
विरोधाभास: सदस्यों के दुश्मनों से गहरे रिश्ते
रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि इस समूह के कुछ सदस्यों के संबंध एक-दूसरे के दुश्मनों के साथ गहरे हैं। एक केंद्रीय सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब, जिसने पिछले दशक में भारत के साथ अपने संबंध काफी मजबूत किए हैं, नई दिल्ली के साथ किसी भावी संघर्ष में पाकिस्तान का साथ देगा।
रिपोर्ट में अतीत का एक महत्वपूर्ण उदाहरण दिया गया है: रियाद ने इस्लामाबाद से यमन युद्ध में सैनिक, जहाज और विमान भेजने का अनुरोध किया था, लेकिन पाकिस्तान की संसद ने युद्ध में भाग न लेने के पक्ष में मतदान किया। रिपोर्ट के अनुसार, 'हर देश युद्ध और शांति के मामलों पर अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विचार करता है, और इसलिए इस बात को लेकर आशंकाएँ हैं कि क्या तीनों देश एक-दूसरे की मदद करेंगे — और अगर करेंगे भी तो किस हद तक, यह एक खुला सवाल बना हुआ है।'
वैचारिक खाई: नाटो से तुलना
रिपोर्ट के अनुसार, नाटो एक सफल सैन्य गठबंधन का आदर्श उदाहरण है क्योंकि वह साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और कानूनी आधार पर खड़ा है। यह वैचारिक एकता गठबंधन को मजबूत बनाती है।
इसके विपरीत, मक्का समझौते में ऐसी कोई जोड़ने वाली राजनीतिक विचारधारा नहीं है। रिपोर्ट में तीनों देशों की शासन-व्यवस्था का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि सऊदी अरब एक धर्म-आधारित शासन वाला देश है जो अंदरूनी सुधार करते हुए भी प्रमुख इस्लामिक देश की अपनी स्थिति बनाए रखना चाहता है। पाकिस्तान में सेना-समर्थित लोकतंत्र है और वह धर्म का उपयोग एक नीतिगत हथियार के रूप में करता है। तुर्की को एक संकटग्रस्त लोकतंत्र के रूप में देखा जाता है जो राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा का समर्थन करता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण विरोधाभास यह है कि सऊदी अरब खुद मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे राजनीतिक इस्लाम को अपने शासन के लिए खतरा मानता है — जबकि तुर्की इसी विचारधारा का समर्थक है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि बिना साझा मूल्यों, समान हितों और एक जैसी खतरे की पहचान के, इस त्रिपक्षीय समझौते के सामने सबसे बुनियादी सवाल यह है कि ये तीनों देश आखिर एकजुट कैसे रहेंगे। कथित तौर पर, राजनीतिक इच्छाशक्ति की यह कमी समझौते की दीर्घकालिक व्यवहार्यता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या तीनों देश इस संधि को महज एक राजनयिक संकेत से आगे ले जाकर एक कार्यशील रक्षा तंत्र में बदल पाते हैं।