6 जुलाई 2026
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अंकारा नाटो समिट 2026: रक्षा खर्च और ईरान ऑपरेशन पर गहराती दरारें, यूरोपीय एकता दांव पर

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अंकारा नाटो समिट 2026: रक्षा खर्च और ईरान ऑपरेशन पर गहराती दरारें, यूरोपीय एकता दांव पर

सारांश

अंकारा समिट एकता का मंच नहीं, परीक्षा का मैदान बन गई है। ईरान ऑपरेशन में यूरोप की अनिच्छा, जीडीपी के 5% रक्षा खर्च का बोझ और सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी — नाटो के भीतर की दरारें अब छिपाए नहीं छिप रहीं।

मुख्य बातें

नाटो नेता 8-9 जुलाई 2026 को अंकारा में समिट कर रहे हैं, जहाँ आंतरिक मतभेद केंद्र में हैं।
फरवरी 2026 में ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायली सैन्य हमलों में कोई भी यूरोपीय नाटो सदस्य प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हुआ।
हेग समिट 2025 में तय जीडीपी के 5% रक्षा खर्च का 2035 का लक्ष्य व्यावहारिक बाधाओं के कारण संदिग्ध माना जा रहा है।
अंकारा , इस्तांबुल और इजमिर में नाटो-विरोधी प्रदर्शन हुए; नीदरलैंड्स और स्पेन में भी ऐसे प्रदर्शन हो चुके हैं।
समिट में बड़े रक्षा खरीद समझौते अपेक्षित, जिनसे अमेरिकी रक्षा कंपनियों को लाभ होने की संभावना।

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के शीर्ष नेता 8-9 जुलाई 2026 को अंकारा में एकत्रित हो रहे हैं, लेकिन यह समिट एकता के प्रदर्शन से कहीं अधिक आंतरिक दरारों की परीक्षा बनती दिख रही है। रणनीतिक प्राथमिकताओं, रक्षा बजट लक्ष्यों और गठबंधन के दीर्घकालिक उद्देश्यों पर मतभेद अब सार्वजनिक रूप से उभर चुके हैं।

ईरान ऑपरेशन ने उजागर की खाई

फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ किए गए सैन्य हमलों ने नाटो के भीतर की असहमति को खुलकर सामने ला दिया। नाटो के अधिकांश यूरोपीय सदस्यों ने वाशिंगटन के घोषित उद्देश्य — ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना — के लिए राजनीतिक समर्थन तो दिया, किंतु कोई भी देश ऑपरेशन में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने को तैयार नहीं हुआ।

रिपोर्टों के अनुसार, नाटो सहयोगियों ने होर्मुज स्ट्रेट को पुनः खोलने की अमेरिकी कोशिशों में युद्धपोत भेजने से भी परहेज किया। इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि वे अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का लाभ उठाते हैं, परंतु जोखिम उठाने से बचते हैं।

अंकारा सेंटर फॉर मिडिल ईस्टर्न स्टडीज के वरिष्ठ शोधकर्ता ओयतुन ओरहान ने कहा, 'प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप उन्हें जवाबी कार्रवाई के खतरे में डाल सकता था, ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर सकता था और ऐसे समय में प्रवासन के दबाव को बढ़ा सकता था, जब कई देश पहले से ही गंभीर घरेलू चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।'

नाटो मामलों के विश्लेषक पत्रकार सेरकान डेमिरटास ने इस रुख को इराक, अफगानिस्तान और लीबिया के अनुभवों से उपजी सतर्कता से जोड़ा। उन्होंने कहा, 'इन संघर्षों ने कई यूरोपीय सरकारों को बिना स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय वैधता और परिभाषित उद्देश्यों के सैन्य अभियानों में भाग लेने से बेहद हिचकिचाने पर मजबूर कर दिया है।'

जीडीपी का 5% रक्षा खर्च: वादा बनाम हकीकत

अंकारा समिट का सबसे बड़ा एजेंडा आइटम हेग नाटो समिट 2025 में हुए उस समझौते का क्रियान्वयन है, जिसमें सदस्य देशों ने 2035 तक रक्षा खर्च को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5% तक पहुँचाने का संकल्प लिया था। इसे ट्रंप प्रशासन के 'नाटो 3.0' एजेंडे का केंद्रबिंदु माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य यूरोप की पारंपरिक रक्षा की जिम्मेदारी वाशिंगटन से हटाकर यूरोपीय देशों पर डालना है।

तुर्किए के विश्लेषक हसन उनाल के अनुसार, कई यूरोपीय सरकारों ने यह लक्ष्य मुख्यतः वाशिंगटन से टकराव टालने के लिए स्वीकार किया। उन्होंने कहा, '2035 के लिए लक्ष्य पर सहमत होना, जो अभी एक दशक दूर है, अमेरिका का सीधे विरोध करने की तुलना में राजनीतिक रूप से आसान था।' उनाल ने आगे बताया कि धीमी आर्थिक वृद्धि, अधिक सार्वजनिक ऋण और बुजुर्ग होती आबादी इस लक्ष्य को पूरा करने में बड़ी बाधाएँ हैं। घरेलू राजनीति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है — यूरोपीय समाज आमतौर पर स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण को रक्षा खर्च से ऊपर रखते हैं। उन्होंने कहा, 'सरकारों को मतदाताओं को यह समझाने में मुश्किल हो सकती है कि सैन्य बजट में इतनी बड़ी बढ़ोतरी जरूरी है।'

सड़कों पर विरोध: अंकारा से एम्स्टर्डम तक

समिट से ठीक पहले अंकारा, इस्तांबुल और इजमिर में नाटो-विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने गठबंधन को 'साम्राज्यवादी युद्ध संगठन' बताया और आरोप लगाया कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिकों की मजदूरी से संसाधन छीनता है। बैनरों पर लिखा था: 'नाटो को युद्ध चाहिए, श्रमिकों को शांति चाहिए' और 'बजट लोगों के लिए, नाटो के लिए नहीं।' गौरतलब है कि इसी तरह के प्रदर्शन 2025 और 2026 में नीदरलैंड्स और स्पेन में भी हो चुके हैं।

मरमारा यूनिवर्सिटी, इस्तांबुल के विद्वान बारिस डोस्टर ने कहा कि ये प्रदर्शन बढ़ते सैन्यीकरण के घरेलू आर्थिक बोझ को लेकर जनता की गहरी चिंता को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा, 'नाटो कोई साधारण रक्षा संगठन नहीं है — इसकी अपनी आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताएँ हैं।'

रक्षा खरीद और अमेरिकी उद्योग का हित

अंकारा समिट में बड़े रक्षा खरीद समझौतों की घोषणा अपेक्षित है, जिनसे अमेरिकी रक्षा उद्योग को सर्वाधिक लाभ होने की संभावना है। विश्लेषक उनाल ने कहा, 'जब सदस्य देश नाटो मानकों के अनुरूप सैन्य उपकरण खरीदते हैं तो अमेरिकी रक्षा कंपनियों को स्वाभाविक रूप से फायदा होता है। गठबंधन की रणनीतिक दिशा पर अमेरिका का प्रभाव निर्विवाद है।'

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब नाटो की आंतरिक एकजुटता पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। अंकारा समिट से निकलने वाले संयुक्त बयान की भाषा और रक्षा खर्च लक्ष्यों पर ठोस प्रतिबद्धताएँ यह तय करेंगी कि गठबंधन इन दरारों को पाट पाता है या वे और गहरी होती हैं। विश्लेषकों के अनुसार, समिट का असली परिणाम घोषणाओं में नहीं, बल्कि अगले कुछ महीनों में सदस्य देशों के वास्तविक बजट आवंटन में दिखेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जब खतरा दूर का लगे तो वादे आसानी से हो जाते हैं। जीडीपी के 5% का लक्ष्य 2035 तक है — यानी कई चुनाव चक्र बाद — जो इसे राजनीतिक रूप से सुरक्षित, लेकिन जवाबदेही की दृष्टि से खोखला बनाता है। ईरान ऑपरेशन में यूरोप की अनुपस्थिति कोई विफलता नहीं, बल्कि एक सचेत रणनीतिक गणना थी — जो बताती है कि अनुच्छेद 5 की एकजुटता और स्वैच्छिक सैन्य जोखिम में फर्क है। असली सवाल यह है कि क्या नाटो एक साझा रक्षा ढाँचा है या अमेरिकी रणनीतिक हितों का बहुपक्षीय आवरण — और यूरोप के मतदाता अब यही पूछ रहे हैं।
RashtraPress
6 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अंकारा नाटो समिट 2026 में मुख्य मुद्दे क्या हैं?
अंकारा समिट में दो प्रमुख मुद्दे हैं: पहला, हेग समिट 2025 में तय जीडीपी के 5% रक्षा खर्च के 2035 के लक्ष्य का क्रियान्वयन; दूसरा, फरवरी 2026 में ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन में यूरोपीय देशों की भागीदारी न करने पर उपजे मतभेद। बड़े रक्षा खरीद समझौतों की घोषणा भी अपेक्षित है।
नाटो के जीडीपी के 5% रक्षा खर्च के लक्ष्य पर विवाद क्यों है?
विश्लेषकों का कहना है कि कई यूरोपीय देशों ने यह लक्ष्य वाशिंगटन से टकराव टालने के लिए स्वीकार किया, न कि वास्तविक प्रतिबद्धता से। धीमी आर्थिक वृद्धि, अधिक सार्वजनिक ऋण, बुजुर्ग होती आबादी और घरेलू राजनीतिक दबाव इस लक्ष्य को पूरा करने में बड़ी बाधाएँ हैं।
ईरान ऑपरेशन में यूरोपीय नाटो देशों ने भाग क्यों नहीं लिया?
यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन में प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया क्योंकि उन्हें जवाबी कार्रवाई, ऊर्जा आपूर्ति बाधा और प्रवासन संकट का डर था। विश्लेषकों के अनुसार इराक, अफगानिस्तान और लीबिया के अनुभवों ने यूरोपीय सरकारों को बिना स्पष्ट वैधता के सैन्य अभियानों से दूर रहना सिखाया है।
अंकारा समिट के खिलाफ तुर्किए में प्रदर्शन क्यों हुए?
अंकारा, इस्तांबुल और इजमिर में प्रदर्शनकारियों ने नाटो को साम्राज्यवादी युद्ध संगठन बताते हुए आरोप लगाया कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिकों की मजदूरी से संसाधन छीनता है। मजदूर संगठनों, आम नागरिकों और राजनीतिक दलों ने इन रैलियों में हिस्सा लिया।
नाटो 3.0 क्या है और इसका यूरोप पर क्या असर पड़ेगा?
नाटो 3.0 ट्रंप प्रशासन का वह एजेंडा है जिसके तहत यूरोप की पारंपरिक रक्षा की मुख्य जिम्मेदारी वाशिंगटन से हटाकर यूरोपीय सदस्य देशों पर डाली जाएगी। इसके लिए जीडीपी के 5% रक्षा खर्च का 2035 तक का लक्ष्य तय किया गया है, जो यूरोपीय सरकारों के लिए घरेलू राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बड़ी चुनौती है।
राष्ट्र प्रेस
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