ट्रंप का नाटो देशों के ईरान अभियान में शामिल न होने पर गुस्सा
सारांश
Key Takeaways
- डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो के सहयोगियों द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान में भाग न लेने पर नाराजगी व्यक्त की।
- उन्होंने कहा कि अमेरिका को बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं है।
- ट्रंप ने नाटो को एकतरफा व्यवस्था बताया।
- ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका की नीति में महत्वपूर्ण है।
- उन्होंने ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने का दावा किया।
वॉशिंगटन, १७ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को कहा कि नाटो के अधिकांश सहयोगी देशों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान में शामिल होने से मुँह मोड़ लिया है। इस पर उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका को किसी बाहरी समर्थन की आवश्यकता नहीं है।
ट्रंप ने एक बयान में कहा, “हमें हमारे अधिकतर नाटो सहयोगियों ने बताया है कि वे ईरान के 'आतंकी शासन' के खिलाफ हमारे सैन्य अभियान में भाग नहीं लेना चाहते।” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि लगभग सभी देश इस बात पर सहमत हैं कि ईरान को किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार प्राप्त नहीं करने दिया जाना चाहिए।
नाटो देशों के रुख पर ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस प्रतिक्रिया से चौंकाने वाली बात नहीं लगी। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा मानता रहा हूँ कि नाटो एकतरफा व्यवस्था है, हम उनकी रक्षा करते हैं, लेकिन जरूरत के समय वे हमारे लिए कुछ नहीं करते।”
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। उन्होंने कहा, “हमने ईरान की नौसेना, वायुसेना, एयर डिफेंस और रडार सिस्टम को समाप्त कर दिया है, और उनके शीर्ष नेतृत्व को भी लगभग नष्ट कर दिया है।”
उन्होंने कहा कि इन सैन्य सफलताओं के बाद अब सहयोगियों की सहायता की आवश्यकता नहीं रह गई है। उन्होंने कहा, “हमें अब नाटो देशों की मदद की न तो आवश्यकता है और न ही हमारी कभी थी।”
ट्रंप ने जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई सहयोगियों के लिए भी यही रुख अपनाया और कहा, “हमें किसी की मदद की आवश्यकता नहीं है।”
उन्होंने एक दिन पहले ओवल ऑफिस में भी सहयोगी देशों के रवैये पर निराशा व्यक्त की थी। ब्रिटेन का उल्लेख करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने कुछ युद्धपोत और माइनस्वीपर भेजने का आग्रह किया था, लेकिन जवाब उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं आया।
ट्रंप ने कहा, “मैंने बाद में कहा कि अब उनकी आवश्यकता नहीं है। मुझे मदद शुरू में चाहिए थी, जीत के बाद नहीं।”
उन्होंने विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिका जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
गौरतलब है कि १९४९ में स्थापित नाटो सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है, जिसमें अमेरिका सबसे बड़ा सैन्य और वित्तीय योगदानकर्ता है। रक्षा खर्च और जिम्मेदारी के बंटवारे को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति का एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। अपने पहले कार्यकाल में, ट्रंप ने २०१५ के ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया था, यह कहते हुए कि यह समझौता ईरान को स्थायी रूप से परमाणु हथियार बनाने से नहीं रोकता।