अंकारा नाटो समिट 2026: रक्षा खर्च, ईरान ऑपरेशन और जन-विरोध से गहराती गठबंधन की दरारें
सारांश
मुख्य बातें
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के नेता अंकारा में मंगलवार और बुधवार को होने वाले समिट में एकजुटता का प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे — लेकिन रणनीतिक प्राथमिकताओं, रक्षा खर्च के लक्ष्यों और गठबंधन के दीर्घकालिक उद्देश्य पर गहरे मतभेद इस बार पहले से कहीं ज़्यादा उजागर हैं। ईरान के खिलाफ हाल के अमेरिकी सैन्य अभियान, GDP के 5% रक्षा खर्च के विवादास्पद लक्ष्य और तुर्किए के कई शहरों में नाटो-विरोधी प्रदर्शनों ने समिट से पहले ही माहौल तनावपूर्ण बना दिया है।
ईरान ऑपरेशन पर यूरोपीय दूरी
मतभेद के सबसे तीखे संकेत फरवरी के अंत में उस समय सामने आए जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य हमले किए। नाटो के अधिकांश यूरोपीय सदस्यों ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के वाशिंगटन के घोषित उद्देश्य के लिए राजनीतिक समर्थन तो दिया, लेकिन ऑपरेशन में सीधी भागीदारी से सभी ने दूरी बनाए रखी। रिपोर्टों के अनुसार, सहयोगी देशों ने होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की अमेरिकी कोशिशों में सहायता के लिए युद्धपोत भेजने में भी हिचकिचाहट दिखाई।
इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों पर कड़ा प्रहार किया और आरोप लगाया कि वे अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का लाभ उठाते हैं, लेकिन सैन्य जोखिम उठाने से बचते हैं।
अंकारा सेंटर फॉर मिडिल ईस्टर्न स्टडीज के वरिष्ठ शोधकर्ता ओयतुन ओरहान ने कहा कि कई यूरोपीय सदस्य ईरान पर अमेरिकी हमलों को वाशिंगटन के साथ एकजुटता के बजाय मुख्यतः क्षेत्रीय स्थिरता के नज़रिए से देखते हैं। उन्होंने कहा, "प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप उन्हें जवाबी कार्रवाई के खतरे में डाल सकता था, ऊर्जा आपूर्ति बाधित कर सकता था और ऐसे समय में प्रवासन के दबाव को बढ़ा सकता था जब कई देश पहले से गंभीर घरेलू चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।"
अंकारा में नाटो मामलों के विश्लेषक पत्रकार सेरकान डेमिरटास का मानना है कि यूरोप का यह रवैया पिछले संघर्षों से सीखे सबक को दर्शाता है। उन्होंने कहा, "इराक, अफगानिस्तान और लीबिया के अनुभवों ने कई यूरोपीय सरकारों को बिना स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय वैधता और सुनिश्चित उद्देश्यों के सैन्य अभियानों में भाग लेने से बहुत सतर्क कर दिया है।"
GDP का 5% रक्षा खर्च — वादा या दबाव?
समिट में एक अन्य केंद्रीय मुद्दा पिछले साल हेग में हुए नाटो समिट में लिए गए उस संकल्प को लागू करना है, जिसमें सहयोगी देशों ने 2035 तक रक्षा खर्च को GDP के 5% तक पहुँचाने का वादा किया था। इसे ट्रंप प्रशासन की 'नाटो 3.0' रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य यूरोपीय पारंपरिक रक्षा की मुख्य ज़िम्मेदारी वाशिंगटन से हटाकर यूरोपीय सदस्यों पर डालना है।
तुर्किए के विश्लेषक हसन उनाल का मानना है कि अधिकांश यूरोपीय सरकारों ने यह लक्ष्य मुख्यतः वाशिंगटन से टकराव से बचने के लिए स्वीकार किया। उन्होंने कहा, "2035 के लिए लक्ष्य पर सहमत होना — जो अभी एक दशक दूर है — अमेरिका का सीधे विरोध करने की तुलना में राजनीतिक रूप से आसान था।" उनाल ने यह भी तर्क दिया कि धीमी आर्थिक वृद्धि, अधिक सार्वजनिक ऋण और बुजुर्ग होती जनसंख्या वाले कुछ यूरोपीय देशों के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। उन्होंने कहा, "सरकारों को मतदाताओं को यह समझाने में कठिनाई होगी कि सैन्य बजट में इतनी भारी बढ़ोतरी ज़रूरी है।"
सड़कों पर नाटो-विरोधी प्रदर्शन
समिट से पहले अंकारा, इस्तांबुल और इज़मिर में नाटो-विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने गठबंधन को एक साम्राज्यवादी युद्ध-संगठन बताया और आरोप लगाया कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिकों के वेतन से संसाधन छीनता है। प्रदर्शनकारियों के बैनरों पर लिखा था — 'नाटो को जंग चाहिए, श्रमिकों को शांति चाहिए', 'बजट लोगों के लिए, नाटो के लिए नहीं' और 'नाटो को नहीं, जंग को नहीं'।
इस्तांबुल में मजदूरों, आम नागरिकों और राजनीतिक दलों के सदस्यों ने सप्ताहांत की बड़ी रैलियों में नाटो को भंग करने की माँग की। गौरतलब है कि इसी तरह के प्रदर्शन 2025 और 2026 में नीदरलैंड्स और स्पेन में भी हो चुके हैं।
मरमारा यूनिवर्सिटी, इस्तांबुल के विद्वान बारिस डोस्टर ने कहा कि ये प्रदर्शन बढ़ते सैन्यीकरण के घरेलू आर्थिक बोझ को लेकर जनता की बढ़ती चिंता को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा, "नाटो कोई साधारण रक्षा संगठन नहीं है — इसकी अपनी आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताएँ हैं।"
अमेरिकी रक्षा उद्योग को लाभ का सवाल
अंकारा समिट में बड़े रक्षा खरीद समझौतों की घोषणा अपेक्षित है, जिनसे अमेरिकी रक्षा कंपनियों को लाभ होने की संभावना है। विश्लेषक हसन उनाल ने कहा, "जब सहयोगी देश नाटो मानकों के अनुसार सैन्य उपकरण खरीदते हैं, तो अमेरिकी रक्षा उद्योग को स्वाभाविक रूप से फायदा होता है। गठबंधन की रणनीतिक दिशा पर अमेरिका का प्रभाव स्पष्ट है।"
आगे क्या होगा
अंकारा समिट नाटो के लिए एक निर्णायक परीक्षण है — क्या गठबंधन रक्षा खर्च, रणनीतिक स्वायत्तता और घरेलू जन-असंतोष के बीच संतुलन बना सकता है? विश्लेषकों के अनुसार, समिट के नतीजे यह तय करेंगे कि 'नाटो 3.0' की अवधारणा केवल कागज़ पर है या ज़मीन पर भी उतरती है।