6 जुलाई 2026
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अंकारा नाटो समिट 2026: रक्षा खर्च, ईरान ऑपरेशन और जन-विरोध से गहराती गठबंधन की दरारें

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अंकारा नाटो समिट 2026: रक्षा खर्च, ईरान ऑपरेशन और जन-विरोध से गहराती गठबंधन की दरारें

सारांश

अंकारा समिट से पहले नाटो की एकता की परीक्षा हो रही है — ईरान ऑपरेशन पर यूरोपीय दूरी, GDP के 5% रक्षा खर्च के अव्यावहारिक लक्ष्य और तुर्किए की सड़कों पर उठते विरोध के स्वर गठबंधन की बुनियादी दरारों को उजागर कर रहे हैं।

मुख्य बातें

नाटो नेता अंकारा में मंगलवार-बुधवार को समिट कर रहे हैं, जहाँ रणनीतिक मतभेद केंद्र में हैं।
फरवरी में ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान में किसी भी यूरोपीय नाटो सदस्य ने सीधी भागीदारी नहीं की।
हेग समिट में तय 2035 तक GDP के 5% रक्षा खर्च के लक्ष्य को लागू करने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों पर सैन्य जोखिम से बचने और अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का लाभ उठाने का आरोप लगाया।
अंकारा , इस्तांबुल और इज़मिर में नाटो-विरोधी प्रदर्शन हुए; नीदरलैंड्स और स्पेन में भी ऐसे विरोध हो चुके हैं।
समिट में बड़े रक्षा खरीद समझौते अपेक्षित हैं, जिनसे अमेरिकी रक्षा उद्योग को लाभ होने की संभावना है।

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के नेता अंकारा में मंगलवार और बुधवार को होने वाले समिट में एकजुटता का प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे — लेकिन रणनीतिक प्राथमिकताओं, रक्षा खर्च के लक्ष्यों और गठबंधन के दीर्घकालिक उद्देश्य पर गहरे मतभेद इस बार पहले से कहीं ज़्यादा उजागर हैं। ईरान के खिलाफ हाल के अमेरिकी सैन्य अभियान, GDP के 5% रक्षा खर्च के विवादास्पद लक्ष्य और तुर्किए के कई शहरों में नाटो-विरोधी प्रदर्शनों ने समिट से पहले ही माहौल तनावपूर्ण बना दिया है।

ईरान ऑपरेशन पर यूरोपीय दूरी

मतभेद के सबसे तीखे संकेत फरवरी के अंत में उस समय सामने आए जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य हमले किए। नाटो के अधिकांश यूरोपीय सदस्यों ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के वाशिंगटन के घोषित उद्देश्य के लिए राजनीतिक समर्थन तो दिया, लेकिन ऑपरेशन में सीधी भागीदारी से सभी ने दूरी बनाए रखी। रिपोर्टों के अनुसार, सहयोगी देशों ने होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की अमेरिकी कोशिशों में सहायता के लिए युद्धपोत भेजने में भी हिचकिचाहट दिखाई।

इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों पर कड़ा प्रहार किया और आरोप लगाया कि वे अमेरिकी सुरक्षा गारंटी का लाभ उठाते हैं, लेकिन सैन्य जोखिम उठाने से बचते हैं।

अंकारा सेंटर फॉर मिडिल ईस्टर्न स्टडीज के वरिष्ठ शोधकर्ता ओयतुन ओरहान ने कहा कि कई यूरोपीय सदस्य ईरान पर अमेरिकी हमलों को वाशिंगटन के साथ एकजुटता के बजाय मुख्यतः क्षेत्रीय स्थिरता के नज़रिए से देखते हैं। उन्होंने कहा, "प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप उन्हें जवाबी कार्रवाई के खतरे में डाल सकता था, ऊर्जा आपूर्ति बाधित कर सकता था और ऐसे समय में प्रवासन के दबाव को बढ़ा सकता था जब कई देश पहले से गंभीर घरेलू चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।"

अंकारा में नाटो मामलों के विश्लेषक पत्रकार सेरकान डेमिरटास का मानना है कि यूरोप का यह रवैया पिछले संघर्षों से सीखे सबक को दर्शाता है। उन्होंने कहा, "इराक, अफगानिस्तान और लीबिया के अनुभवों ने कई यूरोपीय सरकारों को बिना स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय वैधता और सुनिश्चित उद्देश्यों के सैन्य अभियानों में भाग लेने से बहुत सतर्क कर दिया है।"

GDP का 5% रक्षा खर्च — वादा या दबाव?

समिट में एक अन्य केंद्रीय मुद्दा पिछले साल हेग में हुए नाटो समिट में लिए गए उस संकल्प को लागू करना है, जिसमें सहयोगी देशों ने 2035 तक रक्षा खर्च को GDP के 5% तक पहुँचाने का वादा किया था। इसे ट्रंप प्रशासन की 'नाटो 3.0' रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य यूरोपीय पारंपरिक रक्षा की मुख्य ज़िम्मेदारी वाशिंगटन से हटाकर यूरोपीय सदस्यों पर डालना है।

तुर्किए के विश्लेषक हसन उनाल का मानना है कि अधिकांश यूरोपीय सरकारों ने यह लक्ष्य मुख्यतः वाशिंगटन से टकराव से बचने के लिए स्वीकार किया। उन्होंने कहा, "2035 के लिए लक्ष्य पर सहमत होना — जो अभी एक दशक दूर है — अमेरिका का सीधे विरोध करने की तुलना में राजनीतिक रूप से आसान था।" उनाल ने यह भी तर्क दिया कि धीमी आर्थिक वृद्धि, अधिक सार्वजनिक ऋण और बुजुर्ग होती जनसंख्या वाले कुछ यूरोपीय देशों के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। उन्होंने कहा, "सरकारों को मतदाताओं को यह समझाने में कठिनाई होगी कि सैन्य बजट में इतनी भारी बढ़ोतरी ज़रूरी है।"

सड़कों पर नाटो-विरोधी प्रदर्शन

समिट से पहले अंकारा, इस्तांबुल और इज़मिर में नाटो-विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने गठबंधन को एक साम्राज्यवादी युद्ध-संगठन बताया और आरोप लगाया कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिकों के वेतन से संसाधन छीनता है। प्रदर्शनकारियों के बैनरों पर लिखा था — 'नाटो को जंग चाहिए, श्रमिकों को शांति चाहिए', 'बजट लोगों के लिए, नाटो के लिए नहीं' और 'नाटो को नहीं, जंग को नहीं'।

इस्तांबुल में मजदूरों, आम नागरिकों और राजनीतिक दलों के सदस्यों ने सप्ताहांत की बड़ी रैलियों में नाटो को भंग करने की माँग की। गौरतलब है कि इसी तरह के प्रदर्शन 2025 और 2026 में नीदरलैंड्स और स्पेन में भी हो चुके हैं।

मरमारा यूनिवर्सिटी, इस्तांबुल के विद्वान बारिस डोस्टर ने कहा कि ये प्रदर्शन बढ़ते सैन्यीकरण के घरेलू आर्थिक बोझ को लेकर जनता की बढ़ती चिंता को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा, "नाटो कोई साधारण रक्षा संगठन नहीं है — इसकी अपनी आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताएँ हैं।"

अमेरिकी रक्षा उद्योग को लाभ का सवाल

अंकारा समिट में बड़े रक्षा खरीद समझौतों की घोषणा अपेक्षित है, जिनसे अमेरिकी रक्षा कंपनियों को लाभ होने की संभावना है। विश्लेषक हसन उनाल ने कहा, "जब सहयोगी देश नाटो मानकों के अनुसार सैन्य उपकरण खरीदते हैं, तो अमेरिकी रक्षा उद्योग को स्वाभाविक रूप से फायदा होता है। गठबंधन की रणनीतिक दिशा पर अमेरिका का प्रभाव स्पष्ट है।"

आगे क्या होगा

अंकारा समिट नाटो के लिए एक निर्णायक परीक्षण है — क्या गठबंधन रक्षा खर्च, रणनीतिक स्वायत्तता और घरेलू जन-असंतोष के बीच संतुलन बना सकता है? विश्लेषकों के अनुसार, समिट के नतीजे यह तय करेंगे कि 'नाटो 3.0' की अवधारणा केवल कागज़ पर है या ज़मीन पर भी उतरती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक रणनीतिक संकेत है कि यूरोप अमेरिकी एजेंडे का स्वचालित अनुसरण करने को तैयार नहीं। GDP के 5% का लक्ष्य राजनीतिक रूप से सुविधाजनक था — एक दशक दूर की तारीख़ पर सहमति जो वर्तमान बजट पर कोई बाध्यता नहीं डालती। असली सवाल यह है कि क्या 'नाटो 3.0' की परिकल्पना यूरोपीय संप्रभुता को मज़बूत करती है या केवल अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए नए बाज़ार खोलती है — और तुर्किए की सड़कों पर उठते नारे बताते हैं कि यह सवाल अब केवल विश्लेषकों का नहीं, जनता का भी है।
RashtraPress
6 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अंकारा नाटो समिट 2026 में मुख्य मुद्दे क्या हैं?
इस समिट में तीन प्रमुख मुद्दे हैं — ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान पर यूरोपीय सदस्यों की दूरी, 2035 तक GDP के 5% रक्षा खर्च के लक्ष्य को लागू करने की व्यावहारिक चुनौतियाँ, और तुर्किए के शहरों में नाटो-विरोधी जन-प्रदर्शन। ये मतभेद गठबंधन की एकता के लिए गंभीर परीक्षण बन रहे हैं।
नाटो के GDP 5% रक्षा खर्च लक्ष्य पर विवाद क्यों है?
हेग समिट में तय यह लक्ष्य 2035 तक का है, और विश्लेषकों का कहना है कि कई यूरोपीय देशों ने इसे मुख्यतः अमेरिका से टकराव से बचने के लिए स्वीकार किया। धीमी आर्थिक वृद्धि, अधिक सार्वजनिक ऋण और बुजुर्ग होती जनसंख्या वाले देशों के लिए इसे हासिल करना कठिन होगा, साथ ही यूरोपीय समाज स्वास्थ्य और शिक्षा को रक्षा खर्च से पहले रखते हैं।
ईरान ऑपरेशन में यूरोपीय नाटो सदस्यों ने भाग क्यों नहीं लिया?
विश्लेषकों के अनुसार, यूरोपीय देशों ने जवाबी कार्रवाई के ख़तरे, ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने और प्रवासन दबाव बढ़ने की आशंका से प्रत्यक्ष भागीदारी से परहेज किया। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया के अनुभवों ने यूरोपीय सरकारों को बिना स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय वैधता के सैन्य अभियानों में शामिल होने से सतर्क कर दिया है।
तुर्किए में नाटो-विरोधी प्रदर्शन किस बात को लेकर हो रहे हैं?
अंकारा, इस्तांबुल और इज़मिर में प्रदर्शनकारियों ने नाटो पर शिक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिकों के वेतन से संसाधन छीनने का आरोप लगाया और गठबंधन को साम्राज्यवादी युद्ध-संगठन बताया। ऐसे ही प्रदर्शन 2025-2026 में नीदरलैंड्स और स्पेन में भी हो चुके हैं, जो यूरोप में बढ़ते सैन्यीकरण के विरुद्ध व्यापक जन-असंतोष को दर्शाते हैं।
अंकारा समिट में रक्षा खरीद समझौतों से किसे फायदा होगा?
समिट में बड़े रक्षा खरीद समझौतों की घोषणा अपेक्षित है, और विश्लेषकों का कहना है कि नाटो मानकों के अनुसार उपकरण खरीदने से अमेरिकी रक्षा कंपनियों को स्वाभाविक लाभ होगा। यह सवाल उठाता है कि क्या बढ़ा हुआ यूरोपीय रक्षा खर्च यूरोपीय रक्षा उद्योग को मज़बूत करेगा या मुख्यतः अमेरिकी हितों की सेवा करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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