ड्यूरंड रेखा पर भड़की हिंसा: 48 घंटे में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में 31 पख्तून मारे गए
सारांश
Key Takeaways
- 48 घंटे में 26 पख्तूनों की जान गई।
- पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हवाई हमले किए।
- अधिकतर हताहत सामान्य नागरिक थे।
- यह घटनाक्रम सुरक्षा और मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल उठाता है।
- स्थानीय लोगों का विश्वास सुरक्षा एजेंसियों पर कम हो रहा है।
नई दिल्ली, 22 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के एक हमले में 48 घंटे के भीतर 26 पख्तूनों की जान गई है। हाल ही में 20 और 21 फरवरी की रात, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में सीमा पार हवाई हमले किए।
इस्लामाबाद का दावा है कि उनका लक्ष्य तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के ठिकानों को निशाना बनाना था। हालांकि, अफगानिस्तान के क्षेत्रीय प्रशासन और स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार, यह हमला नंगरहार के बिसूद जिले में एक आवासीय परिसर पर हुआ। इस हमले में 17 नागरिकों की मौत की सूचना है, जिनमें 11 बच्चे भी शामिल हैं, जबकि महिलाओं के मारे जाने की भी खबरें हैं।
विश्वसनीय रक्षा सूत्रों के मुताबिक, घटनास्थल से मिली तस्वीरों में कोई कथित आतंकवादी शिविर नहीं है। बल्कि, इस हमले में कई घरों को नष्ट किया गया है। इसके साथ ही, दफनाने के लिए कफन में लिपटे बच्चों के शव भी दिखाई दिए हैं। रक्षा सूत्रों ने बताया कि इस हवाई हमले के एक दिन के भीतर ही यह हिंसा ड्यूरंड रेखा पार कर पाकिस्तान लौट आई। खैबर जिले की तिराह घाटी में मोर्टार गोले एक नागरिक वाहन पर गिरे, जिससे पांच पख्तूनों की मौत हुई, जिनमें दो बच्चे शामिल हैं। स्थानीय लोगों की हत्या से नाराज लोगों ने नजदीकी सैन्य चौकी के बाहर प्रदर्शन किया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इसके जवाब में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर सीधी गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें चार और पख्तून मारे गए और पांच अन्य घायल हुए। कुल मिलाकर, 48 घंटों से भी कम समय में दोनों देशों में 26 पख्तूनों की जान चली गई। इस घटनाक्रम की शुरुआत पाकिस्तान द्वारा सीमा-पार हवाई हमले से हुई, जिसके बाद पाकिस्तानी सेना ने अपने ही नागरिकों पर गोली चलाई।
रिपोर्टों के अनुसार, पिछले साल जनवरी 2025 से अब तक पाकिस्तान में आतंक-रोधी अभियानों में 168 से अधिक पख्तूनों की जान गई है। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। वहीं, सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच अफगानिस्तान में पाकिस्तानी हमलों में कम से कम 88 पख्तून नागरिकों की मौत हुई है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि हताहतों में ज्यादातर सामान्य नागरिक होते हैं, और ये घटनाएं पख्तून-बहुल क्षेत्रों में होती हैं।
हमले के लक्ष्य की बात करें तो अक्सर रिहायशी मकान, सामान्य लोगों के वाहन, गांवों के सार्वजनिक स्थल और विरोध स्थलों को निशाना बनाया जाता है। टीटीपी मुख्यतः पख्तून क्षेत्रों में सक्रिय है, और उसके कई लड़ाके पख्तून हैं। पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है कि उग्रवादी नेटवर्क को स्थानीय लोगों का समर्थन प्राप्त है। स्वतंत्र आलोचकों का कहना है कि यह तर्क धीरे-धीरे एक खतरनाक रूप ले चुका है। पाकिस्तान सेना संदेह के आधार पर अनुमान लगाती है, और इसी अनुमान के आधार पर लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, जिससे लोगों को सामूहिक दंड दिया जाता है।
रक्षा सूत्रों के अनुसार, पूरे गांवों को ‘ऑपरेशनल जोन’ घोषित किया जाता है। कथित संबंधों के आधार पर मकान ध्वस्त किए जाते हैं। मोर्टार और ड्रोन हमले रिहायशी इलाकों पर होते हैं। इसका विरोध करने वाले लोगों को शत्रु माना जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि आतंक-रोधी सिद्धांत लगातार किसी एक जातीय क्षेत्र के नागरिक जीवन को युद्धक्षेत्र में बदल दे, तो सुरक्षा और जातीय प्रोफाइलिंग के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 1947 के बाद से पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक कमान संरचना में पंजाब-आधारित अभिजात वर्ग का वर्चस्व रहा है। पख्तूनों का कहना है कि पख्तून-बहुल इलाकों में भारी सैन्य तैनाती की गई है। बार-बार कर्फ्यू और चौकियां बनाने का काम जारी है, लोगों को गायब करने के आरोप लगे हैं, घरों का ध्वस्तीकरण किया गया है और इलाके में बार-बार बमबारी की जाती है।
इन घटनाओं को कुछ समूह संरचनात्मक दमन के रूप में देखते हैं। 20 और 21 फरवरी की घटनाओं में दो देशों में अलग-अलग झंडों के नीचे 26 पख्तून मारे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना अभी जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन पख्तून क्षेत्रों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि उन्हें सुरक्षा देने की बजाय उनके पूरे इलाके को ही संदिग्ध माना जा रहा है।