16 अक्टूबर 2026
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अमेरिकी सीनेटरों का ट्रंप-सऊदी परमाणु डील रोकने का प्रस्ताव, मध्य पूर्व में हथियार होड़ की चेतावनी

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अमेरिकी सीनेटरों का ट्रंप-सऊदी परमाणु डील रोकने का प्रस्ताव, मध्य पूर्व में हथियार होड़ की चेतावनी

सारांश

अमेरिकी सीनेटरों ने ट्रंप प्रशासन की सऊदी परमाणु डील को सीधी चुनौती दी है — चेतावनी दी कि बिना 'गोल्ड स्टैंडर्ड' सुरक्षा उपायों के यह डील मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ की नींव बन सकती है। 29 नवंबर के बाद सीनेट में वोटिंग का रास्ता खुलेगा।

मुख्य बातें

सीनेटर जेफ मर्कले (ओरेगन) और एडवर्ड मार्के (मैसाचुसेट्स) ने 16 अक्टूबर 2026 को संयुक्त असहमति प्रस्ताव पेश किया।
प्रस्ताव ट्रंप प्रशासन के सऊदी अरब के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते को रोकने के लिए है।
29 नवंबर के बाद सीनेट में वोटिंग का रास्ता खुलेगा; संघीय कानून के तहत कांग्रेस को समीक्षा के लिए 90 दिन का समय मिला है।
सीनेटरों के अनुसार, डील IAEA अतिरिक्त प्रोटोकॉल और यूरेनियम संवर्धन पर पाबंदी ('गोल्ड स्टैंडर्ड') — दोनों की अनदेखी करती है।
चिंता जताई गई कि ईरान इसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर भविष्य की वार्ता में ढाल के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
UAE के साथ अमेरिकी परमाणु समझौते में सख्त प्रतिबंध थे — सऊदी डील की उससे तुलना की जा रही है।

अमेरिकी कांग्रेस के दो वरिष्ठ डेमोक्रेट सीनेटरों ने 16 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित असैन्य परमाणु सहयोग समझौते को रोकने के लिए सीनेट में संयुक्त असहमति प्रस्ताव पेश किया है। सीनेटरों का तर्क है कि यह डील मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ को जन्म दे सकती है और स्थापित अंतरराष्ट्रीय अप्रसार मानकों पर खरी नहीं उतरती।

प्रस्ताव के पीछे कौन हैं

ओरेगन के सीनेटर जेफ मर्कले और मैसाचुसेट्स के सीनेटर एडवर्ड मार्के ने यह संयुक्त प्रस्ताव पेश किया है। मर्कले सीनेट विदेश संबंध समिति के वरिष्ठ सदस्य हैं। संघीय कानून के अनुसार, इस प्रस्ताव से 29 नवंबर के बाद सीनेट में मतदान का रास्ता खुलेगा — समझौते के लागू होने से पहले। संघीय कानून कांग्रेस को ऐसे किसी भी समझौते की समीक्षा के लिए 90 दिन का समय देता है।

सीनेटरों की मुख्य आपत्तियाँ

सीनेटरों के अनुसार, यह समझौता दो बुनियादी सुरक्षा उपायों की अनदेखी करता है। पहला है असैन्य परमाणु सहयोग का तथाकथित 'गोल्ड स्टैंडर्ड', जिसके तहत प्राप्तकर्ता देश यूरेनियम संवर्धन और खर्च किए गए परमाणु ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण से परहेज करने की प्रतिबद्धता देता है। दूसरा है अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अतिरिक्त प्रोटोकॉल का पालन, जो निरीक्षकों को अघोषित परमाणु गतिविधियों की जाँच के लिए व्यापक पहुँच प्रदान करता है।

मर्कले ने कहा, 'सऊदी अरब को अमेरिका की असैन्य परमाणु ऊर्जा तकनीक तक पहुंच देना, बिना इस बात की पुख्ता गारंटी के कि यह परमाणु बम की नींव नहीं बनेगी, अस्वीकार्य है। हम इतने बड़े फैसले में आंख बंद करके नहीं चल सकते।'

क्षेत्रीय अस्थिरता की चेतावनी

मार्के ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित डील पहले से अस्थिर मध्य पूर्व को और अधिक जटिल बना सकती है। उन्होंने कहा, 'अमेरिका-सऊदी परमाणु डील मेगावाट के बारे में नहीं, बल्कि मेगाटन के बारे में है।' साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि यह समझौता अंतरराष्ट्रीय अप्रसार मानकों से नीचे है।

सीनेटरों ने विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का उदाहरण देते हुए तुलना की, जिसके वाशिंगटन के साथ परमाणु सहयोग समझौते में संवेदनशील गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध थे। उनका तर्क है कि सऊदी अरब को रियायत देने से अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ भी इसी तरह की छूट माँग सकती हैं।

ईरान कनेक्शन

सीनेटरों ने यह भी चिंता जताई कि यदि सऊदी अरब को वे परमाणु क्षमताएँ दी गईं जो तेहरान को नहीं दी गई हैं, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर भविष्य की किसी भी वार्ता या प्रतिबंध का विरोध करने का तर्क खड़ा कर सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब ईरान का परमाणु कार्यक्रम पहले से ही अंतरराष्ट्रीय निगरानी में है।

आगे क्या होगा

यह प्रस्ताव अभी सीनेट में पेश हुआ है और 29 नवंबर के बाद मतदान हो सकता है। यदि कांग्रेस इस प्रस्ताव को पारित नहीं करती, तो समीक्षा अवधि समाप्त होने के बाद समझौता स्वतः लागू हो सकता है। ट्रंप प्रशासन की रियाद के साथ परमाणु कूटनीति अब एक नई राजनीतिक चुनौती का सामना कर रही है, और सीनेट की प्रतिक्रिया इस डील का भविष्य तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि अमेरिकी परमाणु अप्रसार नीति के भीतर गहरी दरार का संकेत है। ट्रंप प्रशासन रियाद को व्यावसायिक और रणनीतिक फायदे की नजर से देख रहा है, जबकि विशेषज्ञ और डेमोक्रेट यह तर्क दे रहे हैं कि यूएई जैसे पड़ोसी के साथ 'गोल्ड स्टैंडर्ड' लागू करके सऊदी को उससे कम पर छूट देना दोहरा मापदंड है। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ईरान — जो पहले से ही परमाणु वार्ता में कड़े रुख पर है — इस रियायत को अपने कार्यक्रम को उचित ठहराने के तर्क के रूप में भुनाए। मध्य पूर्व में परमाणु क्षमताओं का प्रसार एक बार शुरू हो गया तो उसे पलटना लगभग असंभव होगा — यही वह बिंदु है जिसे मुख्यधारा कवरेज अक्सर नजरअंदाज करती है।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिकी सीनेटरों ने सऊदी परमाणु डील के खिलाफ प्रस्ताव क्यों पेश किया?
सीनेटर जेफ मर्कले और एडवर्ड मार्के का कहना है कि यह डील दो बुनियादी अप्रसार सुरक्षा उपायों — 'गोल्ड स्टैंडर्ड' (यूरेनियम संवर्धन पर रोक) और IAEA के अतिरिक्त प्रोटोकॉल — की अनदेखी करती है। उनके अनुसार, यह मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ को बढ़ावा दे सकती है।
यह संयुक्त असहमति प्रस्ताव क्या होता है और इसका क्या असर होगा?
संयुक्त असहमति प्रस्ताव एक विधायी कदम है जिससे 29 नवंबर के बाद सीनेट में इस डील पर मतदान का रास्ता खुलता है। संघीय कानून के तहत कांग्रेस को ऐसे किसी समझौते की समीक्षा के लिए 90 दिन मिलते हैं, और यदि कांग्रेस इसे रोकने का प्रस्ताव नहीं अपनाती तो समझौता स्वतः लागू हो सकता है।
परमाणु सहयोग में 'गोल्ड स्टैंडर्ड' क्या है?
'गोल्ड स्टैंडर्ड' असैन्य परमाणु सहयोग की वह शर्त है जिसके तहत प्राप्तकर्ता देश यूरेनियम संवर्धन और खर्च किए गए परमाणु ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण से परहेज करने की प्रतिबद्धता देता है। इसी मानक का पालन UAE ने अमेरिका के साथ अपने परमाणु सहयोग समझौते में किया था।
इस डील से ईरान पर क्या असर पड़ सकता है?
सीनेटरों ने चिंता जताई है कि यदि सऊदी अरब को वे परमाणु क्षमताएँ दी गईं जो तेहरान को नहीं दी गई हैं, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर भविष्य के किसी भी प्रतिबंध या वार्ता का विरोध करने का तर्क खड़ा कर सकता है। यह क्षेत्रीय परमाणु अप्रसार कूटनीति को और जटिल बना सकता है।
क्या यह प्रस्ताव ट्रंप की सऊदी डील को रोक सकता है?
यह प्रस्ताव 29 नवंबर के बाद सीनेट में मतदान का रास्ता खोलता है। हालाँकि, डील रुकेगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सीनेट में पर्याप्त वोट जुटते हैं या नहीं। अगर कांग्रेस प्रस्ताव पारित नहीं करती, तो 90 दिन की समीक्षा अवधि के बाद समझौता लागू हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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