अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौता: यूरेनियम संवर्धन की छूट पर अमेरिकी सांसदों और विशेषज्ञों ने उठाए गंभीर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत सऊदी अरब को भविष्य में अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा। इस समझौते ने वाशिंगटन में अमेरिकी कांग्रेस के सांसदों और अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है, जो इसे परमाणु हथियारों के वैश्विक प्रसार के लिए एक खतरनाक मिसाल मानते हैं।
समझौते में क्या है
इस समझौते के अंतर्गत सऊदी अरब के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। समझौते से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसमें ऐसे सुरक्षा प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका उद्देश्य सऊदी अरब को हथियार निर्माण हेतु यूरेनियम संवर्धन से रोकना है। यदि संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगी और संबंधित तकनीक सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी।
यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किया गया है। अब इसे अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजा जाएगा, जहाँ सांसदों के पास समीक्षा के लिए 90 दिन का समय होगा। हालाँकि, यदि कांग्रेस इसे अस्वीकार भी करती है, तो राष्ट्रपति वीटो का उपयोग कर इसे लागू करा सकते हैं।
दोनों देश अगले दो वर्षों तक यह अध्ययन करेंगे कि सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से कितना आवश्यक और व्यावहारिक है।
सबसे बड़ी चिंता: अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से छूट
समझौते में एक विशेष प्रावधान सबसे अधिक विवाद का कारण बना हुआ है — सऊदी अरब को उन कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट दी गई है जो सामान्यतः ऐसे परमाणु समझौतों में अनिवार्य होते हैं। इनकी जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निरीक्षण करेंगे।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जो बाइडेन और बराक ओबामा के मध्य-पूर्व सलाहकार रह चुके रिचर्ड नेफ्यू ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की भूमिका सीमित करना भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल साबित हो सकता है। उन्होंने तर्क दिया, "अमेरिकी निरीक्षक तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन केवल अमेरिकी निगरानी पर अन्य देशों का भरोसा बनना मुश्किल है।" नेफ्यू के अनुसार, यदि ईरान जैसे देश यह कहें कि उनके परमाणु कार्यक्रम की जाँच केवल रूस करेगा, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा — और यही द्विमानक इस समझौते को कमज़ोर बनाता है।
अमेरिकी कांग्रेस में विरोध
कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति की बैठक में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से शुरू हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि अगले 10 वर्षों में सऊदी अरब की सत्ता किसके हाथ में होगी, यह कोई नहीं जानता।
शेरमन ने कहा, "आज अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन और पुनर्प्रसंस्करण कार्यक्रम का विरोध कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर सऊदी अरब को उसी दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति दे रहा है। दोनों मामलों में फर्क सिर्फ इतना दिखता है कि इस बार अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।" उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो सीनेटर रहते हुए 'नो न्यूक्लियर वेपन्स फॉर सऊदी अरेबिया एक्ट' के सह-प्रायोजक थे।
वहीं, फिलीपींस दौरे पर पत्रकारों से बातचीत में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने समझौते पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि अमेरिका ऐसा कोई भी समझौता नहीं करेगा जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा पैदा हो।
इजरायल और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर
इस समझौते को लेकर इजरायल में भी चिंता गहरा गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे इजरायल की सुरक्षा के लिए गंभीर रणनीतिक विफलता बताया और कहा कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों ने भी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक बताया है।
गौरतलब है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी उसी दिशा में कदम उठाएगा। यह बयान इस समझौते के संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ
समझौते का सबसे बड़ा आर्थिक लाभार्थी अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनी वेस्टिंगहाउस को मिलने की संभावना है। हालाँकि समझौते में कंपनी का नाम नहीं है, लेकिन सऊदी रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता देने के प्रावधान से वेस्टिंगहाउस के AP1000 रिएक्टरों के उपयोग की संभावना काफी बढ़ गई है। ये रिएक्टर लाखों घरों को बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। समझौते में यूरेनियम खनन, रिएक्टर निर्माण उपकरण और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी अन्य अमेरिकी कंपनियों को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने, एक रिपोर्ट के अनुसार, कहा कि यह समझौता अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा और परमाणु सुरक्षा व अप्रसार के उच्चतम मानकों का पालन करता है। परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ, हालाँकि, आगाह करते हैं कि यह समझौता एक खतरनाक वैश्विक मिसाल बन सकता है और अन्य देश भी इसी तरह की छूट की माँग कर सकते हैं।