23 जुलाई 2026
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अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौता: यूरेनियम संवर्धन की छूट पर अमेरिकी सांसदों और विशेषज्ञों ने उठाए गंभीर सवाल

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अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौता: यूरेनियम संवर्धन की छूट पर अमेरिकी सांसदों और विशेषज्ञों ने उठाए गंभीर सवाल

सारांश

ट्रंप प्रशासन का सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग समझौता महज एक व्यापारिक करार नहीं — यह वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था की परीक्षा है। अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से छूट और यूरेनियम संवर्धन का रास्ता खोलने पर अमेरिकी सांसद और विशेषज्ञ एकजुट होकर सवाल उठा रहे हैं।

मुख्य बातें

ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ धारा 123 के तहत परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का प्रावधान है।
सऊदी अरब को सामान्य अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षणों से छूट दी गई है; उनकी जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निगरानी करेंगे।
अमेरिकी कांग्रेस के पास समीक्षा के लिए 90 दिन का समय है, लेकिन राष्ट्रपति वीटो से इसे लागू करा सकते हैं।
सांसद ब्रैड शेरमन ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से तुलना करते हुए दोहरे मानक का आरोप लगाया।
इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर रणनीतिक विफलता बताया।
अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस के AP1000 रिएक्टरों को सऊदी परियोजना में प्राथमिकता मिलने की संभावना है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत सऊदी अरब को भविष्य में अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा। इस समझौते ने वाशिंगटन में अमेरिकी कांग्रेस के सांसदों और अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है, जो इसे परमाणु हथियारों के वैश्विक प्रसार के लिए एक खतरनाक मिसाल मानते हैं।

समझौते में क्या है

इस समझौते के अंतर्गत सऊदी अरब के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। समझौते से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसमें ऐसे सुरक्षा प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका उद्देश्य सऊदी अरब को हथियार निर्माण हेतु यूरेनियम संवर्धन से रोकना है। यदि संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगी और संबंधित तकनीक सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी।

यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किया गया है। अब इसे अमेरिकी कांग्रेस के पास भेजा जाएगा, जहाँ सांसदों के पास समीक्षा के लिए 90 दिन का समय होगा। हालाँकि, यदि कांग्रेस इसे अस्वीकार भी करती है, तो राष्ट्रपति वीटो का उपयोग कर इसे लागू करा सकते हैं।

दोनों देश अगले दो वर्षों तक यह अध्ययन करेंगे कि सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से कितना आवश्यक और व्यावहारिक है।

सबसे बड़ी चिंता: अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से छूट

समझौते में एक विशेष प्रावधान सबसे अधिक विवाद का कारण बना हुआ है — सऊदी अरब को उन कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट दी गई है जो सामान्यतः ऐसे परमाणु समझौतों में अनिवार्य होते हैं। इनकी जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निरीक्षण करेंगे।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जो बाइडेन और बराक ओबामा के मध्य-पूर्व सलाहकार रह चुके रिचर्ड नेफ्यू ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की भूमिका सीमित करना भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल साबित हो सकता है। उन्होंने तर्क दिया, "अमेरिकी निरीक्षक तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन केवल अमेरिकी निगरानी पर अन्य देशों का भरोसा बनना मुश्किल है।" नेफ्यू के अनुसार, यदि ईरान जैसे देश यह कहें कि उनके परमाणु कार्यक्रम की जाँच केवल रूस करेगा, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा — और यही द्विमानक इस समझौते को कमज़ोर बनाता है।

अमेरिकी कांग्रेस में विरोध

कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति की बैठक में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से शुरू हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि अगले 10 वर्षों में सऊदी अरब की सत्ता किसके हाथ में होगी, यह कोई नहीं जानता।

शेरमन ने कहा, "आज अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन और पुनर्प्रसंस्करण कार्यक्रम का विरोध कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर सऊदी अरब को उसी दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति दे रहा है। दोनों मामलों में फर्क सिर्फ इतना दिखता है कि इस बार अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।" उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो सीनेटर रहते हुए 'नो न्यूक्लियर वेपन्स फॉर सऊदी अरेबिया एक्ट' के सह-प्रायोजक थे।

वहीं, फिलीपींस दौरे पर पत्रकारों से बातचीत में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने समझौते पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि अमेरिका ऐसा कोई भी समझौता नहीं करेगा जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा पैदा हो।

इजरायल और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर

इस समझौते को लेकर इजरायल में भी चिंता गहरा गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे इजरायल की सुरक्षा के लिए गंभीर रणनीतिक विफलता बताया और कहा कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों ने भी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक बताया है।

गौरतलब है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी उसी दिशा में कदम उठाएगा। यह बयान इस समझौते के संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ

समझौते का सबसे बड़ा आर्थिक लाभार्थी अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनी वेस्टिंगहाउस को मिलने की संभावना है। हालाँकि समझौते में कंपनी का नाम नहीं है, लेकिन सऊदी रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता देने के प्रावधान से वेस्टिंगहाउस के AP1000 रिएक्टरों के उपयोग की संभावना काफी बढ़ गई है। ये रिएक्टर लाखों घरों को बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। समझौते में यूरेनियम खनन, रिएक्टर निर्माण उपकरण और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी अन्य अमेरिकी कंपनियों को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने, एक रिपोर्ट के अनुसार, कहा कि यह समझौता अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा और परमाणु सुरक्षा व अप्रसार के उच्चतम मानकों का पालन करता है। परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ, हालाँकि, आगाह करते हैं कि यह समझौता एक खतरनाक वैश्विक मिसाल बन सकता है और अन्य देश भी इसी तरह की छूट की माँग कर सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह सऊदी अरब को इसी दिशा में आगे बढ़ने की छूट दे रहा है, और अंतर केवल आर्थिक लाभ का है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षण को अमेरिकी एकपक्षीय निगरानी से बदलना वैश्विक अप्रसार व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमज़ोर करता है — क्योंकि यदि यह मानक बन जाए, तो रूस भी क्यूबा में यही तर्क देगा। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का वह सार्वजनिक बयान — कि ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने पर सऊदी अरब भी वही करेगा — इस समझौते की असली जोखिम-परत को उजागर करता है, जिसे वाशिंगटन की आधिकारिक भाषा सावधानी से ढकती है।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिका-सऊदी परमाणु सहयोग समझौता क्या है?
यह अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत हुआ समझौता है, जिसके तहत सऊदी अरब को भविष्य में यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा और अमेरिकी कंपनियाँ वहाँ परमाणु रिएक्टर बनाएंगी। इसमें सुरक्षा प्रावधान हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निगरानी करेंगे।
अमेरिकी सांसद इस समझौते का विरोध क्यों कर रहे हैं?
सांसद ब्रैड शेरमन सहित कई सांसदों का कहना है कि यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका के रुख के विपरीत है और दोहरे मानक स्थापित करता है। उनकी चिंता यह भी है कि अगले दशक में सऊदी सत्ता किसके हाथ में होगी, यह अनिश्चित है।
इस समझौते में अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण से छूट क्यों दी गई है?
समझौते में यह प्रावधान किया गया है कि सामान्य अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षण की जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निगरानी करेंगे। विशेषज्ञ रिचर्ड नेफ्यू के अनुसार, यह व्यवस्था वैश्विक विश्वसनीयता के लिए खतरनाक मिसाल बन सकती है, क्योंकि अन्य देश भी इसी तर्क का उपयोग कर सकते हैं।
इजरायल को इस समझौते से क्या आपत्ति है?
इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे इजरायल की सुरक्षा के लिए गंभीर रणनीतिक विफलता बताया है। उनका कहना है कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है, खासकर क्राउन प्रिंस के उस बयान के मद्देनज़र जिसमें उन्होंने ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने पर सऊदी अरब के भी ऐसा करने की बात कही थी।
इस समझौते से किन अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा?
समझौते में अमेरिकी कंपनियों को सऊदी परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में प्राथमिकता दी गई है। कंपनी वेस्टिंगहाउस के AP1000 रिएक्टरों के उपयोग की संभावना सबसे अधिक बताई जा रही है; इसके अलावा यूरेनियम खनन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी अन्य अमेरिकी कंपनियाँ भी लाभान्वित होंगी।
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