17 जुलाई 2026
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ईरान-अमेरिका समझौता मसौदे पर गहरे मतभेद, तेहरान करेगा अपने संशोधन: रिपोर्ट

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ईरान-अमेरिका समझौता मसौदे पर गहरे मतभेद, तेहरान करेगा अपने संशोधन: रिपोर्ट

सारांश

ईरान-अमेरिका युद्ध खत्म करने की कोशिशें एक नए पेच में फँस गई हैं। अमेरिका ने मसौदे में बदलाव कर तेहरान को भेजा, तो ईरान ने भी जवाबी संशोधन की तैयारी कर ली। फ्रोजन एसेट्स और परमाणु शर्तें दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी अड़चन बनी हुई हैं।

मुख्य बातें

ईरान ने स्पष्ट किया कि वह अमेरिका के संशोधित एमओयू मसौदे को स्वीकार नहीं करेगा और अपने बदलाव करेगा।
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की फ्रोजन एसेट्स जारी करने के प्रावधान और परमाणु शर्तों पर आपत्ति जताई है।
दोनों देशों के बीच 8 अप्रैल को अस्थायी सीजफायर हुआ था; युद्ध 28 फरवरी को शुरू हुआ था।
संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ ने कहा — ईरानी अधिकार सुरक्षित हुए बिना कोई समझौता नहीं।
पाकिस्तान की मध्यस्थता से दोनों पक्षों के बीच प्रस्तावों का आदान-प्रदान जारी है।

तेहरान और वाशिंगटन के बीच युद्धविराम को स्थायी रूप देने की कोशिशों को उस समय नया झटका लगा, जब ईरान ने स्पष्ट किया कि वह अमेरिका द्वारा संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) के मसौदे को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करेगा, बल्कि उसमें अपने अनुसार बदलाव करेगा। ईरान की अर्ध-सरकारी तस्नीम समाचार एजेंसी ने एक जानकार सूत्र के हवाले से 1 जून को यह जानकारी दी। सूत्र ने साफ कहा कि 'अभी कुछ भी अंतिम नहीं है।'

मसौदे पर क्या है विवाद

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मसौदे के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई है — खासकर ईरान की जमी हुई संपत्तियों (फ्रोजन एसेट्स) को जारी करने वाले प्रावधान पर। इसके अलावा, ट्रंप ने ईरान के परमाणु पदार्थों को लेकर समझौते में और सख्त शर्तें जोड़ने की मांग की है।

तस्नीम के सूत्र ने प्रतिक्रिया में कहा कि अमेरिका की ओर से किए गए बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि तेहरान उन्हें मंजूर करता है। ईरान केवल उसी मसौदे को स्वीकार करेगा जिस पर उसकी अपनी सहमति होगी।

संघर्ष और वार्ता की पृष्ठभूमि

यह ऐसे समय में आया है जब दोनों देश उस युद्ध को खत्म करने के लिए एक समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, जो कथित तौर पर 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुआ था। 8 अप्रैल को दोनों देशों के बीच एक अस्थायी सीजफायर हुआ था।

गौरतलब है कि पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की मध्यस्थता से दोनों पक्षों ने युद्ध समाप्त करने की शर्तों को लेकर कई प्रस्तावों का आदान-प्रदान किया है।

ईरानी संसद अध्यक्ष की कड़ी चेतावनी

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ ने संसद की एक ऑनलाइन बैठक में कहा कि जब तक ईरानी लोगों के अधिकार सुरक्षित नहीं होते, तेहरान अमेरिका के साथ किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि ईरानी वार्ताकारों को 'दुश्मन' के शब्दों और वादों पर भरोसा नहीं है।

गालिबाफ ने कहा, 'हमारा मानदंड ऐसे ठोस नतीजे हैं जिन्हें हमें हासिल करना है, ताकि हम बदले में अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें। जब तक हमें यकीन नहीं होगा कि हमने ईरानी राष्ट्र के अधिकार सुरक्षित कर लिए हैं, हम किसी भी समझौते को मंजूरी नहीं देंगे।'

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि संघर्ष के एक नए चरण में विरोधी पक्ष आर्थिक दबाव और मीडिया प्रचार के जरिए देश के भीतर मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

गालिबाफ का एक्स पर विवादास्पद बयान

शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में गालिबाफ ने कहा था, 'हम बातचीत से नहीं, बल्कि मिसाइलों से रियायतें हासिल करते हैं; बातचीत में हम बस उन्हें समझाते हैं।' यह बयान कूटनीतिक प्रक्रिया के बीच ईरान की आक्रामक भाषा का स्पष्ट संकेत है।

आगे क्या होगा

दोनों पक्षों के बीच मसौदे पर जारी मतभेदों के बीच, स्थायी शांति समझौते की राह अभी भी कठिन दिखती है। पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली वार्ता प्रक्रिया जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन फ्रोजन एसेट्स और परमाणु शर्तों पर गतिरोध निकट भविष्य में किसी सफलता की संभावना को सीमित करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि गालिबाफ जैसे नेता 'मिसाइलों से रियायत' वाली भाषा से यह संदेश देते हैं कि ईरान दबाव में नहीं झुका। पाकिस्तान की मध्यस्थता एक सकारात्मक कदम है, लेकिन जब तक परमाणु सत्यापन और संपत्तियों की वापसी पर ठोस सहमति नहीं बनती, कोई भी मसौदा अधूरा रहेगा। इतिहास गवाह है कि ऐसी वार्ताओं में अंतिम समझौता अक्सर उस बिंदु पर होता है जब दोनों पक्ष घरेलू दबाव से अधिक थक जाते हैं।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईरान और अमेरिका के बीच एमओयू मसौदे पर मतभेद क्यों हैं?
अमेरिका ने मसौदे में बदलाव कर तेहरान को वापस भेजा है, जिसमें ईरान की फ्रोजन एसेट्स जारी करने के प्रावधान पर राष्ट्रपति ट्रंप की आपत्ति और परमाणु पदार्थों पर सख्त शर्तें शामिल हैं। ईरान ने इन बदलावों को अस्वीकार करते हुए अपने संशोधन करने की तैयारी की है।
ईरान-अमेरिका के बीच यह युद्ध कब और कैसे शुरू हुआ?
यह संघर्ष कथित तौर पर 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुआ। 8 अप्रैल को दोनों देशों के बीच एक अस्थायी सीजफायर हुआ, जिसके बाद से स्थायी समझौते की कोशिशें जारी हैं।
ईरानी संसद अध्यक्ष गालिबाफ ने समझौते पर क्या कहा?
गालिबाफ ने कहा कि जब तक ईरानी लोगों के अधिकार सुरक्षित नहीं होते, तेहरान कोई भी समझौता स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरानी वार्ताकारों को 'दुश्मन' के वादों पर भरोसा नहीं है और समझौते के लिए ठोस, सत्यापन-योग्य परिणाम जरूरी हैं।
पाकिस्तान इस वार्ता में क्या भूमिका निभा रहा है?
पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में उसकी मध्यस्थता से दोनों पक्षों ने युद्ध समाप्त करने की शर्तों पर कई प्रस्तावों का आदान-प्रदान किया है।
क्या ईरान-अमेरिका के बीच जल्द कोई स्थायी समझौता हो सकता है?
फिलहाल स्थायी समझौते की संभावना कम दिखती है, क्योंकि फ्रोजन एसेट्स और परमाणु शर्तों पर दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं। तस्नीम के सूत्र ने स्पष्ट कहा है कि 'अभी कुछ भी अंतिम नहीं है।'
राष्ट्र प्रेस
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