ईरान डील पर सुसान राइस का हमला: 'बेहद खराब आत्मसमर्पण', ट्रंप प्रशासन ने किया खारिज
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसान राइस ने रविवार, 21 जून को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान समझौते पर तीखा प्रहार करते हुए इसके ढाँचे को 'हैरान कर देने वाला और बेहद खराब आत्मसमर्पण' करार दिया। यह बयान ओबामा प्रशासन के किसी वरिष्ठ पूर्व अधिकारी की ओर से अब तक की सबसे कड़ी सार्वजनिक आलोचना मानी जा रही है। दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि सैन्य दबाव और कूटनीतिक रणनीति के बल पर ईरान को कमज़ोर स्थिति में बातचीत की मेज पर लाया गया है।
राइस की मुख्य आपत्तियाँ
एबीसी के कार्यक्रम 'दिस वीक' में बोलते हुए राइस ने कहा, 'यह बहुत ही गंभीर और गलत कदम है।' उनका आरोप था कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई व्यापक और अंतिम समझौता हासिल किए बिना ही उसे बड़ी रियायतें दे दी हैं। उनके अनुसार, अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले ही ईरान को खुलकर तेल बेचने, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था तक पहुँच पाने और अपने जमे हुए धन को वापस हासिल करने की दिशा में बढ़ने की अनुमति मिल गई है।
राइस ने कहा, 'जैसा कि मंत्री ने खुद माना, समझौते पर हस्ताक्षर होते ही — यानी गुरुवार से — ईरान अब अपना सारा तेल और तेल उत्पाद बिना किसी रुकावट के वैश्विक बाज़ार में बेच सकता है।' उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस समझौता ज्ञापन (एमओयू) में ऐसे प्रावधान हैं जिनके तहत भविष्य में प्रतिबंध हट सकते हैं और ईरान के आसपास अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम हो सकती है।
परमाणु कार्यक्रम पर चिंता
राइस ने स्पष्ट किया कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी भी लगभग वैसा ही बना हुआ है। उनके शब्दों में, 'इस समझौते में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि परमाणु सामग्री को ईरान से बाहर ले जाया जाएगा।' उन्होंने यह भी कहा कि 'दशकों से यह साफ था कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल बातचीत और कूटनीति के ज़रिए ही संभव है' — यह इशारा उस रणनीतिक क्रम की ओर था जो उनके अनुसार शुरू से अपनाई जानी चाहिए थी।
ट्रंप प्रशासन का पलटवार
ट्रंप प्रशासन ने इन आलोचनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया। ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने तर्क दिया कि ईरान पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा कमज़ोर स्थिति में बातचीत की मेज पर आया है। इसके पीछे होर्मुज स्ट्रेट से जहाज़ों की आवाजाही का फिर से सामान्य होना और सैन्य दबाव की रणनीति को प्रमुख कारण बताया गया। प्रशासन का दावा है कि ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी नुकसान पहुँचा है और यही दबाव ईरानी नेतृत्व को बातचीत के लिए तैयार करने में सहायक रहा।
आगे क्या होगा
यह बहस ऐसे समय में सामने आई है जब उपराष्ट्रपति जेडी वेंस स्विट्जरलैंड में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की तैयारी कर रहे हैं। इन वार्ताओं का उद्देश्य एक व्यापक समझौते की दिशा में बातचीत को आगे बढ़ाना है। इसका नतीजा न केवल मध्य पूर्व में अमेरिका की नीति, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर भी गहरा असर डाल सकता है। गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव, होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएँ और कूटनीतिक संवाद — तीनों एक साथ देखने को मिले हैं।