ईरान को बैंकिंग और तेल निर्यात की छूट पर अमेरिका में विवाद, सुसान राइस ने बताया 'बड़ी गलती'
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिका और ईरान के बीच बन रहे नए कूटनीतिक समझौते के तहत ईरान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार में अपना तेल बेच सकेगा — और इसके साथ ही उसे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था तथा रोकी गई संपत्तियों तक पहुँच की अनुमति भी दी जा रही है। ट्रंप प्रशासन ने रविवार, 21 जून को कहा कि इस घटनाक्रम का असर वैश्विक तेल कीमतों और भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर पड़ सकता है।
ऊर्जा मंत्री राइट का बयान
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने एबीसी के कार्यक्रम 'दिस वीक' में कहा कि ईरान का ऊर्जा बाज़ार में वापस आना वॉशिंगटन-तेहरान वार्ता के शुरुआती परिणामों में से एक होगा। उन्होंने बताया कि ईरान पिछले करीब 47 वर्षों से तेल बेचता आ रहा है। राइट के अनुसार, पहले ट्रंप कार्यकाल में ईरान के तेल निर्यात में भारी कमी आई थी, जबकि बाइडेन सरकार के दौरान इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
राइट ने कहा, 'हमने उन्हें दो महीने तक दिखाया कि हम उनका एक बूंद तेल भी बिकने से रोक सकते हैं।' उनके अनुसार, इससे वार्ता में वॉशिंगटन की स्थिति मज़बूत हुई। ईरान के तेल निर्यात के 15 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक के स्तर पर पहुँचने की उम्मीद जताई गई है — जो हालिया तनाव से पहले की मात्रा के करीब है।
होर्मुज़ स्ट्रेट और ऊर्जा बाज़ार पर असर
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, होर्मुज़ स्ट्रेट के आसपास हुई रुकावटों और खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण ऊर्जा बाज़ारों में जो अनिश्चितता बनी हुई थी, वह अब कम हो रही है। राइट ने कहा कि इस अहम समुद्री मार्ग से तेल और प्राकृतिक गैस की आवाजाही सामान्य हो चुकी है।
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में बढ़ा हुआ उत्पादन, वेनेजुएला से अतिरिक्त आपूर्ति और बड़े तेल उत्पादक देशों के सहयोग से आने वाले समय में ऊर्जा कीमतें और नीचे आ सकती हैं।
सुसान राइस की आलोचना
पूर्व ओबामा प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसान राइस ने इस घटनाक्रम पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर से पहले ही ईरान को बड़े आर्थिक लाभ दिए जा रहे हैं। राइस के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर होते ही — यानी गुरुवार से — ईरान अपने संपूर्ण तेल और तेल उत्पादों को बिना किसी रुकावट के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच सकेगा।
राइस ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था का उपयोग करने और रोकी गई संपत्तियों तक पहुँच देने के फ़ैसले को 'बहुत बड़ी और बेहद खराब रियायत' बताया। आलोचकों का कहना है कि ऐसी छूट अंतिम समझौते के बाद दी जानी चाहिए थी, न कि वार्ता के दौरान।
भारत पर संभावित प्रभाव
यह ऐसे समय में आया है जब भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और ईरानी तेल की वापसी से उसे सस्ती ऊर्जा आपूर्ति का लाभ मिल सकता है। गौरतलब है कि भारत पहले भी ईरानी तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह व्यापार बाधित हुआ था। ईरान के तेल निर्यात के फिर से बढ़ने से वैश्विक बाज़ार में आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
आगे क्या होगा
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत अभी जारी है और अंतिम समझौते की रूपरेखा अभी तय होनी बाकी है। राजनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों की नज़र इस बात पर है कि क्या वार्ता से पहले दी गई आर्थिक रियायतें अमेरिका की सौदेबाज़ी की ताकत को कमज़ोर करेंगी या इससे समझौते की राह आसान होगी।