25 सितंबर 2026
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वंदे मातरम पर ₹5 जुर्माना और लाठियाँ, फिर भी क्रांतिकारियों के होठों से न उतरा यह तराना

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वंदे मातरम पर ₹5 जुर्माना और लाठियाँ, फिर भी क्रांतिकारियों के होठों से न उतरा यह तराना

सारांश

1875 में लिखी एक कविता, 1905 में ₹5 के जुर्माने और लाठियों से भी न रुकी, फाँसी के तख्ते पर भी जीवित रही — वंदे मातरम के 150 साल का यह सफर 2026 में एक करोड़ कंठों के सामूहिक उद्घोष तक पहुँचा।

मुख्य बातें

25 सितंबर 2026 को 'नमामि भारतम्' कार्यक्रम के तहत एक करोड़ से अधिक नागरिकों द्वारा संपूर्ण वंदे मातरम के सामूहिक गायन का लक्ष्य रखा गया।
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की और यह 1882 में उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित हुआ।
नवंबर 1905 में रंगपुर के 200 छात्रों पर वंदे मातरम गाने के लिए प्रत्येक पर ₹5 का जुर्माना लगाया गया था।
17 अगस्त 1909 को मदन लाल ढींगरा के अंतिम शब्द 'वंदे मातरम' थे; मैडम भीकाजी कामा के 1907 के तिरंगे पर भी यही लिखा था।
24 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान दर्जा दिए जाने की घोषणा की।
वंदे मातरम के 150 वर्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' लेकर आई; 88 वर्षों बाद सभी छह पदों के गायन की परंपरा फिर शुरू हुई।

वंदे मातरम — एक ऐसा राष्ट्रगीत जिसे गाने पर कभी ₹5 का जुर्माना लगता था, युवाओं को पीटा जाता था और गिरफ्तारियाँ होती थीं — फिर भी यह स्वतंत्रता संग्राम के हर मोर्चे पर क्रांतिकारियों के लबों पर जीवित रहा। 25 सितंबर 2026 को 'नमामि भारतम्' कार्यक्रम के तहत देशभर में संपूर्ण वंदे मातरम के सामूहिक गायन का आयोजन हुआ, जिसमें एक करोड़ से अधिक छात्र, शिक्षक, अभिभावक और नागरिकों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया था। इससे पहले 15 अगस्त 2026 को भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से पहली बार संपूर्ण वंदे मातरम का सामूहिक गायन हुआ था — एक ऐसा क्षण जिसे ऐतिहासिक माना गया।

एक कविता से राष्ट्रगीत तक का सफर

वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी। इस तथ्य की पुष्टि श्री अरबिंदो के उस लेख से होती है जो उन्होंने 16 अप्रैल 1907 को अंग्रेजी दैनिक 'बंदे मातरम' में लिखा था। अरबिंदो ने उस लेख में उल्लेख किया कि बंकिम चंद्र ने यह गीत 32 वर्ष पहले लिखा था और तब बहुत कम लोगों ने इसे सुना था। बाद में 1882 में इसे बंकिम चंद्र के कालजयी उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया, जो इससे पहले बंगाली मासिक पत्रिका 'बंगदर्शन' में प्रकाशित हुआ था।

उपन्यास 'आनंदमठ' में ऐसे संन्यासियों की कथा है जिन्हें 'संतान' — अर्थात भारत माता की संतान — कहा गया है। वंदे मातरम इन संतानों का मुख्य गीत था, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र बना। बंकिम चंद्र 19वीं सदी के बंगाल के सबसे प्रभावशाली साहित्यकारों में थे, जिनकी लेखनी ने आधुनिक बंगाली गद्य के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक नींव रखी।

राजनीतिक नारे से जन-जन की आवाज़ तक

1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम गाया था। 1902 में स्थापित अनुशीलन समिति के प्रशिक्षण शिविरों की शुरुआत और समाप्ति वंदे मातरम के साथ होती थी। भारत सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय के अनुसार, राजनीतिक नारे के रूप में इसका सबसे पहला प्रयोग 7 अगस्त 1905 को हुआ, जब हज़ारों छात्रों ने कोलकाता के टाउन हॉल की ओर जुलूस निकालते हुए वंदे मातरम से आसमान गुंजाया और विदेशी सामानों के बहिष्कार तथा स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव पारित किया।

अक्टूबर 1905 में उत्तरी कलकत्ता में 'बंदे मातरम संप्रदाय' की स्थापना हुई, जिसके सदस्य हर रविवार प्रभात फेरियाँ निकालते थे। इन फेरियों में कभी-कभी स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर भी शामिल होते थे। 20 मई 1906 को बारीसाल (अब बांग्लादेश) में दस हज़ार से अधिक लोगों — हिंदू और मुसलमान दोनों — ने वंदे मातरम के झंडे लेकर मार्च किया।

जुर्माना, लाठी और गिरफ्तारी — फिर भी न रुका यह तराना

नवंबर 1905 में रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से प्रत्येक पर ₹5-₹5 का जुर्माना लगाया गया — सिर्फ इसलिए कि वे वंदे मातरम गाने के 'दोषी' थे। रंगपुर में जाने-माने नेताओं को स्पेशल कांस्टेबल बनाकर वंदे मातरम गाने से रोकने का निर्देश दिया गया। 1908 में बेलगाम, कर्नाटक में जिस दिन लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले भेजा जा रहा था, वंदे मातरम गाने पर मौखिक प्रतिबंध लगाया गया। आदेश न मानने पर पुलिस ने कई युवाओं को पीटा और गिरफ्तार किया।

1907 में मैडम भीकाजी कामा ने स्टटगार्ट, बर्लिन में पहली बार भारत के बाहर तिरंगा फहराया — उस झंडे पर वंदे मातरम लिखा था। 17 अगस्त 1909 को मदन लाल ढींगरा को इंग्लैंड में फाँसी दी गई; फाँसी के तख्ते पर उनके अंतिम शब्द थे — 'वंदे मातरम'। 1909 में पेरिस में भारतीय देशभक्तों ने जिनेवा से 'वंदे मातरम' नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अक्टूबर 1912 में जब गोपाल कृष्ण गोखले केप टाउन, दक्षिण अफ्रीका पहुँचे, तो वंदे मातरम के नारे लगाते लोगों के जुलूस ने उनका स्वागत किया।

विभाजन की रेखा: 1937 का विवाद और राजनीतिक तनाव

आज़ादी की नींव पड़ने से पहले ही वंदे मातरम सांप्रदायिक तनाव का केंद्र बन गया। दिसंबर 1908 में मुस्लिम लीग के दूसरे अधिवेशन में अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने कहा कि वंदे मातरम जैसे गीत को राष्ट्रीय नारा बताना हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना है। 1 मार्च 1938 को 'द न्यू टाइम्स ऑफ लाहौर' में मोहम्मद अली जिन्ना ने लिखा कि भारत के मुसलमान वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध है।

टैगोर ने स्पष्ट किया कि गीत के पहले दो छंद मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन करते हैं, किसी धार्मिक देवता से संबंधित नहीं। हालाँकि गीत के तीसरे और चौथे छंद में देवी दुर्गा का उल्लेख आता है — यही वह बिंदु था जहाँ से असहमति उपजी। 1923 में जब मोहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस की अध्यक्षता संभाली, तो संपूर्ण वंदे मातरम गायन के तुरंत बाद वह बैठक से बाहर चले गए।

1937 में कांग्रेस अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे, एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें राष्ट्रीय आयोजनों में केवल शुरुआती दो पदों के गायन की अनुशंसा की गई। कांग्रेस का कहना है कि यह स्वतंत्रता संग्राम के शीर्ष नेताओं की सर्वसम्मत राय थी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) आरोप लगाती रही है कि यह निर्णय तुष्टिकरण की राजनीति का परिणाम था और इसने दो-राष्ट्र सिद्धांत को बल दिया।

संविधान सभा से 'नमामि भारतम्' तक

14-15 अगस्त 1947 की रात स्वतंत्र भारत की पहली संविधान सभा वंदे मातरम के साथ ही शुरू हुई थी। BJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, तब तक राष्ट्रगान के रूप में 'जन-गण-मन' अंगीकार नहीं हुआ था। 24 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान दर्जा दिया जाएगा। उन्होंने कहा, 'वंदे मातरम गीत, जिसने भारत के स्वाधीनता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा।' इस प्रकार रवींद्रनाथ टैगोर के 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान और बंकिम के 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' लेकर आई, जो राष्ट्रीय गीत को वही कानूनी संरक्षण देता है जो वर्तमान में राष्ट्रगान को प्राप्त है। 2026 के नए दिशानिर्देशों के तहत लगभग 88 वर्षों के अंतराल के बाद सभी छह पदों (पूर्ण संस्करण) के गायन की परंपरा को फिर से जोड़ा गया — और 25 सितंबर 2026 को 'नमामि भारतम्' के माध्यम से यह परंपरा जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया गया।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे BJP और कांग्रेस दोनों अलग-अलग ढंग से पढ़ते हैं। असली सवाल यह है कि क्या यह पुनरुद्धार राष्ट्रीय एकता की भावना से प्रेरित है या विभाजन-युग की विरासत पर राजनीतिक दावेदारी से — और क्या इस बहस में वे आवाज़ें सुनी जा रही हैं जो 1937 में भी हाशिये पर थीं।
RashtraPress
25 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वंदे मातरम की रचना कब और किसने की थी?
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी। बाद में यह गीत उनके 1882 में प्रकाशित उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया, जो पहले बंगाली पत्रिका 'बंगदर्शन' में धारावाहिक रूप में छपा था।
वंदे मातरम गाने पर अंग्रेजों ने क्या दंड दिया था?
नवंबर 1905 में रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से प्रत्येक पर ₹5-₹5 का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के 'दोषी' थे। 1908 में बेलगाम में इस गीत पर मौखिक प्रतिबंध लगाया गया और पुलिस ने युवाओं को पीटा तथा गिरफ्तार किया।
वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा कब मिला?
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान दर्जा और सम्मान दिया जाएगा। इस प्रकार जन-गण-मन राष्ट्रगान और वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत बना।
1937 में वंदे मातरम के केवल दो छंद गाने का निर्णय क्यों लिया गया?
1937 के कांग्रेस अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे, राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो पदों के गायन की अनुशंसा की गई। कांग्रेस का तर्क था कि यह शीर्ष नेताओं की सर्वसम्मत राय थी, जबकि BJP का आरोप है कि यह मुस्लिम लीग के दबाव में तुष्टिकरण की राजनीति का नतीजा था।
2026 में वंदे मातरम के संपूर्ण गायन की परंपरा कैसे बहाल हुई?
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' लेकर आई, जिसने राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण दिया। 2026 के नए दिशानिर्देशों के तहत लगभग 88 वर्षों के अंतराल के बाद सभी छह पदों के गायन की परंपरा फिर से शुरू हुई।
राष्ट्र प्रेस
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