अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्मसिद्ध नागरिकता बरकरार रखी, H-1B पर 3 लाख भारतीयों को राहत
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 30 जून 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले में अमेरिका में जन्म लेने वाले सभी बच्चों की नागरिकता के अधिकार को संवैधानिक रूप से बरकरार रखा, जिससे एच-1बी वर्क वीजा पर रह रहे करीब 3 लाख भारतीयों को बड़ी राहत मिली है। यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश को सीधी चुनौती देता है, जिसमें अस्थायी वीजाधारकों के यहाँ जन्मे बच्चों को नागरिकता से वंचित करने की कोशिश की गई थी।
फैसले में क्या कहा गया
मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत के फैसले में लिखा, 'हम संविधान के 14वें संशोधन में किए गए उस वादे को निभाते हैं, जिसमें अमेरिका में जन्म लेने वाले सभी लोगों को नागरिकता देने की बात कही गई है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकता का अर्थ देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्ण भागीदारी का अधिकार है — 'तब भी और आज भी।'
यह संशोधन 1866 में पारित और 1868 में लागू हुआ था। इसका मूल उद्देश्य गृहयुद्ध के बाद मुक्त किए गए दासों और उनके बच्चों को पूर्ण अमेरिकी नागरिकता प्रदान करना था। सुप्रीम कोर्ट ने इस सौ वर्ष से अधिक पुरानी व्यवस्था को बदलने की ट्रंप की कोशिश को खारिज कर दिया।
भारतीय प्रवासियों पर असर
एच-1बी वीजाधारक भारतीयों के लिए यह फैसला विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ग्रीन कार्ड की लंबी प्रतीक्षा सूची के चलते इनमें से कई लोगों को स्वयं अमेरिकी नागरिकता पाने में कई दशक लग सकते हैं। इस फैसले के बाद छात्र वीजा, विजिटर वीजा और अन्य अस्थायी वीजा पर रहने वाले लोगों के बच्चों को भी जन्म लेते ही अमेरिकी नागरिकता मिलेगी और उन्हें जीवनभर अमेरिका में रहने का अधिकार होगा।
इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट संस्था के कार्यकारी निदेशक चिंतन पटेल ने कहा, 'आज का फैसला इस बात की मजबूत पुष्टि करता है कि अमेरिका में किसे अपना माना जाता है। ट्रंप के इस आदेश से भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रवासी परिवार सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले थे।' उन्होंने आगे कहा, 'आज सुप्रीम कोर्ट ने उन परिवारों को देखा और कहा: आपके बच्चे अमेरिकी हैं। वे यहीं के हैं।'
ट्रंप की प्रतिक्रिया और आगे की रणनीति
फैसले पर नाराजगी जताते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे 'देश के लिए बुरी खबर' बताया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'हम कांग्रेस में कानून बनाकर इसे आसानी से बदल सकते हैं। इसके लिए संविधान में लंबा और मुश्किल संशोधन करने की ज़रूरत नहीं है।' हालाँकि, कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट संवैधानिक फैसले के बाद कोई भी साधारण कानून अदालत में टिकना मुश्किल होगा।
गौरतलब है कि ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही यह कार्यकारी आदेश जारी किया था। उनका तर्क था कि यह कदम मुख्य रूप से तथाकथित 'बर्थ टूरिज़्म' को रोकने के लिए था — जिसमें कुछ लोग टूरिस्ट वीजा पर अमेरिका आकर बच्चे को जन्म दिलाते हैं। लेकिन उन्होंने यह प्रतिबंध एच-1बी और अन्य वैध अस्थायी वीजाधारकों पर भी लागू करने की कोशिश की, जो आलोचकों के अनुसार कानूनी रूप से देश में रह रहे लोगों के साथ अन्याय था।
राजनीतिक समर्थन और विरोध
भारतीय मूल की अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर फैसले का स्वागत करते हुए लिखा, 'मैं खुद एक प्रवासी हूँ। मैं जानती हूँ कि जब इस देश के वादे निभाए जाते हैं तो उनका क्या मतलब होता है, और जब उन्हें तोड़ा जाता है तो उसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।' उन्होंने यह भी कहा, 'हमारे संविधान में कोई अपवाद नहीं है। जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता इस देश का कानून है, और आज सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिर से स्पष्ट कर दिया है।'
आगे क्या होगा
ट्रंप प्रशासन कथित तौर पर अमेरिकी कांग्रेस के माध्यम से विधायी रास्ता अपनाने पर विचार कर रहा है, लेकिन इसके लिए दोनों सदनों में पर्याप्त बहुमत और संवैधानिक अनुकूलता — दोनों की ज़रूरत होगी। फिलहाल यह फैसला लाखों भारतीय प्रवासी परिवारों के लिए एक निर्णायक कानूनी सुरक्षा कवच बन गया है।