बड़ा फैसला: AAP के 7 राज्यसभा सांसदों की सदस्यता रद्द हो, राघव चड्ढा भी शामिल — संजय सिंह
सारांश
Key Takeaways
- AAP ने राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन से 7 सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की।
- राघव चड्ढा समेत 7 AAP सांसद BJP में शामिल हो गए, जिनके खिलाफ दसवीं अनुसूची के तहत याचिका दाखिल।
- कपिल सिबल और पी. डी. टी. आचार्य ने कानूनी राय दी — इन सांसदों की सदस्यता स्वतः समाप्त होनी चाहिए।
- संजय सिंह ने ED-CBI के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाया और इसे लोकतंत्र के विरुद्ध बताया।
- उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के दलबदल मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया था — AAP ने इसका हवाला दिया।
- AAP ने चेतावनी दी कि यदि सभापति ने शीघ्र कार्रवाई नहीं की, तो पार्टी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार है।
नई दिल्ली, 26 अप्रैल: आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन से मांग की है कि पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए 7 राज्यसभा सांसदों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त की जाए। इन सांसदों में राघव चड्ढा का नाम भी शामिल है। AAP नेता और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने रविवार को मीडिया से बातचीत में यह मांग उठाई।
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत याचिका दाखिल
संजय सिंह ने बताया कि संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अंतर्गत एक औपचारिक याचिका सभापति के समक्ष प्रस्तुत की गई है। इस याचिका में 7 सांसदों की सदस्यता पूर्णतः रद्द करने का अनुरोध किया गया है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल और संविधान विशेषज्ञ पी. डी. टी. आचार्य जैसे कानूनी दिग्गजों ने स्पष्ट राय दी है कि इन सदस्यों की सदस्यता स्वतः समाप्त होनी चाहिए।
संजय सिंह ने सभापति से अनुरोध किया कि इस मामले में शीघ्र सुनवाई की जाए और निष्पक्ष निर्णय सुनाया जाए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक जनादेश की रक्षा के लिए यह कदम अत्यंत आवश्यक है।
AAP का आरोप — ED-CBI के दुरुपयोग से तोड़ी पार्टी
संजय सिंह ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इन सांसदों को प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जैसी केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के जरिए AAP से अलग कराया गया। उन्होंने इसे लोकतंत्र के साथ विश्वासघात, पंजाब की जनता के साथ धोखा और संविधान को कमजोर करने का प्रयास बताया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी सांसद के विचार पार्टी से मेल नहीं खाते, तो उन्हें पहले सदस्यता से इस्तीफा देना चाहिए और उसके बाद दूसरी पार्टी में जाना चाहिए। जनादेश के आधार पर चुने जाने के बाद पाला बदलना संवैधानिक रूप से अनुचित है।
उत्तराखंड-अरुणाचल जैसे मामलों का दिया हवाला
संजय सिंह ने उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में हुए दलबदल के मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन मामलों में भी देरी हुई, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर न्याय दिलाया। उन्होंने कहा कि AAP इस मामले में कानूनी लड़ाई जारी रखेगी और संविधान का सम्मान सुनिश्चित करवाएगी।
राघव चड्ढा पर 'झूठे प्रचार' का आरोप खारिज
संजय सिंह ने उन खबरों को सिरे से नकार दिया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि पंजाब के विधायक राघव चड्ढा के संपर्क में हैं। उन्होंने इसे BJP द्वारा फैलाया गया झूठा प्रचार करार दिया। उन्होंने कहा कि पूरे पंजाब में इन सांसदों का जनता विरोध कर रही है, लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और नारे लगा रहे हैं।
गहरा विश्लेषण — दलबदल और लोकतंत्र पर सवाल
यह मामला केवल 7 सांसदों की सदस्यता तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक राजनीतिक पैटर्न को उजागर करता है जिसमें विपक्षी दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के माध्यम से दबाव बनाकर पाला बदलवाने के आरोप लगते रहे हैं। गोवा, मणिपुर, मेघालय जैसे राज्यों में भी इसी तरह के दलबदल की घटनाएं देखी गई हैं।
संविधान की दसवीं अनुसूची वर्ष 1985 में राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में लाई गई थी, जिसका उद्देश्य दलबदल पर अंकुश लगाना था। लेकिन सभापति/अध्यक्ष द्वारा निर्णय लेने में देरी इस कानून की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह टिप्पणी की है कि दलबदल याचिकाओं पर 3 महीने के भीतर फैसला होना चाहिए।
अब सबकी नजरें राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन पर हैं कि वे इस याचिका पर कब और क्या निर्णय लेते हैं। AAP ने संकेत दिया है कि यदि सभापति समय पर कार्रवाई नहीं करते, तो पार्टी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी।