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नेपाल-चीन व्यापार घाटा: बीआरआई परियोजनाएं बढ़ा रही आर्थिक असमानता, 195 अरब रुपए का आयात

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नेपाल-चीन व्यापार घाटा: बीआरआई परियोजनाएं बढ़ा रही आर्थिक असमानता, 195 अरब रुपए का आयात

सारांश

नेपाल-चीन व्यापार घाटा गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में 195 अरब रुपए का आयात हुआ। बीआरआई परियोजनाओं में 60% ठेके चीनी कंपनियों को मिलते हैं। नेपाल का विनिर्माण क्षेत्र सिकुड़ रहा है और चीनी पूंजी की शर्तें निर्भरता का चक्र और मजबूत कर रही हैं।

मुख्य बातें

वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में नेपाल का चीन से आयात 195 अरब रुपए से अधिक रहा, जबकि निर्यात नगण्य रहा।
बीआरआई परियोजनाओं में 60 प्रतिशत से अधिक ठेके चीनी कंपनियों को मिलते हैं, जबकि गैर-चीनी वित्तपोषित परियोजनाओं में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत है।
नेपाल 2017 में औपचारिक रूप से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में शामिल हुआ था, लेकिन इससे आर्थिक असंतुलन और बढ़ा।
नेपाल का विनिर्माण क्षेत्र खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र और निर्माण सामग्री तक सीमित है और चीनी आयात से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहा है।
नेपाल के केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय ने चीन पर आयात निर्भरता को आधिकारिक तौर पर संरचनात्मक जोखिम माना है।
चीनी एफडीआई के साथ आने वाली पूंजी घरेलू बाजार में चीनी प्रतिस्पर्धा भी लाती है, जिससे नेपाली उद्योग और कमजोर होते हैं।

नई दिल्ली, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। नेपाल और चीन के बीच व्यापार घाटा लगातार गहराता जा रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में नेपाल ने चीन से 195 अरब रुपए से अधिक का आयात किया, जबकि निर्यात इसकी तुलना में नगण्य रहा। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, वाहन और वस्त्र जैसी वस्तुओं की भारी खरीद ने इस आर्थिक असमानता को और विकराल बना दिया है।

व्यापार असंतुलन की भयावह तस्वीर

यूरेशिया रिव्यू में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, नेपाल और चीन के बीच का यह व्यापारिक असंतुलन केवल आंकड़ों की समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक विकृति है। नेपाल चीन को जो निर्यात करता है, वह आयात के मुकाबले इतना कम है कि दोनों के बीच की खाई हर वर्ष चौड़ी होती जा रही है।

नेपाल का विनिर्माण क्षेत्र मुख्यतः खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र और निर्माण सामग्री तक सीमित है। जहां-जहां चीनी आयात से प्रतिस्पर्धा होती है, वहां नेपाली उत्पादकों की बाजार हिस्सेदारी तेजी से सिकुड़ रही है।

बीआरआई परियोजनाएं: समाधान या जाल?

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में नेपाल 2017 में औपचारिक रूप से शामिल हुआ था। लेकिन इस पहल ने दोनों देशों के बीच आर्थिक असंतुलन को कम करने की बजाय और पक्का कर दिया है।

विश्व बैंक के शोध के अनुसार, चीन द्वारा वित्तपोषित बीआरआई परियोजनाओं में 60 प्रतिशत से अधिक ठेके चीनी कंपनियों को दिए जाते हैं। इसके विपरीत, गैर-चीनी संस्थानों द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं में यह आंकड़ा केवल 30 प्रतिशत के आसपास रहता है। नेपाली निर्माण कंपनियां अपने ही देश की परियोजनाओं में सहायक भूमिका तक सीमित रह जाती हैं।

उपकरण आपूर्ति और विशेष इंजीनियरिंग कार्यों के ठेके चीनी कंपनियां हथिया लेती हैं। इससे स्थानीय रोजगार और कौशल विकास दोनों प्रभावित होते हैं।

एफडीआई का दोधारा असर

यूरेशिया रिव्यू के लेख में स्पष्ट किया गया है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के रूप में आने वाली चीनी पूंजी अपने साथ चीनी प्रतिस्पर्धा भी लेकर आती है। यानी निवेश के नाम पर नेपाल के घरेलू बाजार में चीनी उत्पाद और चीनी कंपनियां और मजबूत होती जाती हैं।

यह स्थिति आंशिक रूप से प्रतिस्पर्धात्मकता की समस्या है और आंशिक रूप से नीतिगत विफलता भी। नेपाल सरकार अब तक कोई ठोस नीति नहीं बना पाई है जो इस असंतुलन को पलट सके।

नेपाल सरकार की स्वीकारोक्ति

नेपाल के केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय दोनों ने अपनी सार्वजनिक नीतिगत योजनाओं में चीन पर आयात निर्भरता को एक संरचनात्मक जोखिम के रूप में दर्ज किया है। इसका समाधान दो ही रास्तों से संभव है — या तो आयात स्रोतों में विविधता लाई जाए, जिसके लिए नए व्यापार समझौते और आपूर्ति शृंखला का पुनर्निर्माण जरूरी है।

दूसरा विकल्प है — आयात प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना, जिसके लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश और कौशल विकास की आवश्यकता है। फिलहाल नेपाल के पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

आगे का रास्ता: विरोधाभास में फंसा नेपाल

विश्लेषण में यह भी रेखांकित किया गया है कि इन दोनों ही विकल्पों के लिए चीनी पूंजी उपलब्ध है, लेकिन उसकी शर्तें अंततः नेपाल को उसी निर्भरता के चक्र में वापस धकेल देती हैं। यह एक ऐसी आर्थिक दुविधा है जिससे बाहर निकलने के लिए नेपाल को भारत, जापान और पश्चिमी देशों के साथ वैकल्पिक साझेदारियां विकसित करनी होंगी।

गौरतलब है कि भारत भी नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और दोनों देशों के बीच खुली सीमा नेपाल को आर्थिक विविधीकरण का एक स्वाभाविक अवसर देती है। आने वाले महीनों में नेपाल सरकार की व्यापार नीति और बीआरआई के तहत नई परियोजनाओं पर होने वाले निर्णय यह तय करेंगे कि नेपाल इस आर्थिक जाल से निकल पाता है या और गहरा फंसता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक रणनीतिक जाल की तस्वीर है जिसे बीआरआई के आकर्षक आवरण में लपेटकर परोसा गया। विडंबना यह है कि जिस पूंजी से नेपाल इस निर्भरता से मुक्त होना चाहता है, वह पूंजी भी चीन से ही आती है और अपनी शर्तें साथ लाती है। मुख्यधारा की कवरेज इसे केवल आर्थिक असंतुलन बताकर छोड़ देती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या नेपाल की संप्रभुता धीरे-धीरे आर्थिक निर्भरता की बेड़ियों में जकड़ी जा रही है? भारत के लिए यह एक संकेत भी है — नेपाल के साथ संतुलित और पारदर्शी आर्थिक साझेदारी विकसित करने का यह सबसे उचित समय है।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नेपाल और चीन के बीच व्यापार घाटा कितना है?
वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में नेपाल का चीन से आयात 195 अरब रुपए से अधिक रहा, जबकि चीन को निर्यात इसकी तुलना में बहुत कम रहा। यह असंतुलन हर वर्ष बढ़ता जा रहा है।
बीआरआई परियोजनाओं से नेपाल को क्या नुकसान हो रहा है?
विश्व बैंक के शोध के अनुसार, बीआरआई परियोजनाओं में 60 प्रतिशत से अधिक ठेके चीनी कंपनियों को मिलते हैं। इससे नेपाली कंपनियां अपने ही देश की परियोजनाओं में हाशिए पर चली जाती हैं और स्थानीय रोजगार प्रभावित होता है।
नेपाल इस व्यापार असंतुलन से कैसे बाहर निकल सकता है?
नेपाल के पास दो विकल्प हैं — आयात स्रोतों में विविधता लाना या घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना। लेकिन दोनों के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी और कौशल विकास की जरूरत है, जो फिलहाल नेपाल के पास उपलब्ध नहीं है।
नेपाल 2017 में बीआरआई में क्यों शामिल हुआ था?
नेपाल ने 2017 में बीआरआई में इस उम्मीद से भाग लिया था कि इससे बुनियादी ढांचे का विकास होगा और आर्थिक संपर्क बढ़ेगा। लेकिन परिणाम उलटे रहे और व्यापार असंतुलन और गहरा हो गया।
क्या नेपाल सरकार इस समस्या से अवगत है?
हां, नेपाल के केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय दोनों ने चीन पर आयात निर्भरता को अपनी सार्वजनिक योजनाओं में एक संरचनात्मक जोखिम के रूप में चिन्हित किया है। हालांकि अब तक कोई ठोस नीतिगत समाधान सामने नहीं आया है।
राष्ट्र प्रेस
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