लालकृष्ण आडवाणी के 99वें जन्मदिन पर PM मोदी ने लिखा विशेष लेख, गांधीनगर को बताया 'घर वापसी'
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 8 नवंबर 2026 को अपना 99वाँ जन्मदिन मनाया। इस विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक विस्तृत लेख लिखकर आडवाणी के सात दशकों से अधिक के सार्वजनिक जीवन, वैचारिक योगदान और राष्ट्र-निर्माण में उनकी भूमिका को श्रद्धापूर्वक रेखांकित किया। लेख में मोदी ने आडवाणी को आधुनिक भारत के इतिहास के जीवंत साक्षी के रूप में चित्रित किया।
विभाजन की पीड़ा से राजनीति की ऊँचाई तक
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में लिखा, 'ऐसे व्यक्तित्व बहुत कम हैं, जिनके जीवन में आधुनिक भारत के इतिहास के इतने सारे अध्याय समाए हों।' उन्होंने बताया कि आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को देव दीपावली के दिन हुआ था। 1947 में देश के विभाजन के समय उन्हें सिंध में अपना घर, परिवेश और पूरी जानी-पहचानी दुनिया छोड़कर नई जगह बसना पड़ा। मोदी ने लिखा कि इस दर्दनाक अनुभव के बावजूद आडवाणी के मन में कभी कड़वाहट या पछतावा नहीं रहा।
प्रधानमंत्री के अनुसार शून्य से जीवन को नए सिरे से खड़ा करने का यही संकल्प आडवाणी की पहचान बन गया — और यही गुण बाद में जनसंघ को मजबूत बनाने और भारतीय जनता पार्टी के निर्माण में भी झलका।
BJP को देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाने का श्रेय
मोदी ने अपने लेख में आडवाणी के BJP राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यकाल को भारतीय राजनीति का एक निर्णायक दौर बताया। उन्होंने लिखा कि आडवाणी के नेतृत्व में 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से घटकर 200 से भी नीचे आ गईं। इसके बाद 1996 में BJP पहली बार देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। मोदी ने यह भी रेखांकित किया कि आडवाणी ने कार्यकर्ताओं की अनेक पीढ़ियाँ तैयार कीं और 'राष्ट्र प्रथम' के सिद्धांत पर पार्टी की मजबूत नींव रखी।
वैचारिक स्पष्टता और छद्म धर्मनिरपेक्षता पर निर्भीक रुख
प्रधानमंत्री ने आडवाणी की दो विशेषताओं को विशेष रूप से उजागर किया। पहली — उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता, जो उनके भाषणों, लेखन और साक्षात्कारों में स्पष्ट रूप से झलकती थी। जनसंघ और BJP के लिए उनके द्वारा लिखे गए प्रस्ताव आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं। दूसरी विशेषता थी — छद्म धर्मनिरपेक्षता पर उनका स्पष्ट और निर्भीक रुख, जिसने भारतीय राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी।
वाजपेयी-आडवाणी की अनूठी राजनीतिक जोड़ी
मोदी ने अपने लेख में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी की दशकों लंबी साझेदारी को भारतीय राजनीति में एक अनूठी मिसाल बताया। उन्होंने लिखा कि राजनीति में अक्सर महत्वाकांक्षाएँ टकराती हैं और साथी नेता अलग-अलग रास्ते चुन लेते हैं, लेकिन इन दोनों नेताओं की पाँच-छह दशकों की यात्रा में आपसी विश्वास और सम्मान अटल बिहारी के जीवन के अंतिम समय तक बना रहा।
मोदी के अनुसार 1967 में आडवाणी दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष बने और स्वर्गीय विजय कुमार मल्होत्रा के साथ मिलकर काम किया। 1970 के दशक से संसद में उनकी सक्रिय भूमिका रही और आपातकाल के दौर में 1976 में वे गुजरात से राज्यसभा सदस्य बने।
गांधीनगर: आडवाणी के लिए 'घर वापसी'
1991 के लोकसभा चुनाव का स्मरण करते हुए मोदी ने लिखा कि आडवाणी दो सीटों से चुनाव लड़े थे, जिनमें से एक गांधीनगर की सीट थी। मोदी ने बताया कि विभाजन के बाद आडवाणी के पिता कच्छ में बसे थे और गुजरात से उनका पुराना नाता रहा है। इसी कारण प्रधानमंत्री ने गांधीनगर से आडवाणी के चुनाव को 'एक तरह से घर वापसी' की संज्ञा दी। यह पंक्ति लेख की सबसे भावुक और चर्चित अभिव्यक्ति बनकर उभरी है।
गौरतलब है कि 2024 में आडवाणी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। उनके 99वें जन्मदिन पर पीएम मोदी का यह विस्तृत लेख BJP के वैचारिक इतिहास और पार्टी के संस्थापक नेताओं के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा रहा है।