लालकृष्ण आडवाणी: जन्मदिन पर जानें BJP के 'भीष्म पितामह' की 6 दशकों की राजनीतिक यात्रा
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) को उसकी वर्तमान राष्ट्रीय पहचान देने में जिस नेता का योगदान सर्वाधिक निर्णायक रहा, वे हैं लालकृष्ण आडवाणी — जिन्हें पार्टी कार्यकर्ता स्नेह और सम्मान से 'भीष्म पितामह' कहते हैं। 8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) में जन्मे आडवाणी की राजनीतिक यात्रा जनसंघ के शुरुआती दिनों से शुरू होकर भारत रत्न तक पहुँची — यह यात्रा किसी एक नेता की नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के एक पूरे वैचारिक युग की कहानी है।
विभाजन की पीड़ा और राष्ट्र-समर्पण का संकल्प
आडवाणी का बचपन सिंध में बीता, लेकिन 1947 में भारत विभाजन ने उनकी जड़ें उखाड़ दीं। स्वतंत्रता की खुशी मनाने का मौका भी नहीं मिला — आजादी के महज कुछ घंटों बाद ही उन्हें अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ा। इस विस्थापन ने शायद उनके भीतर राष्ट्र-सेवा की उस अदम्य भावना को जन्म दिया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी। महज 14 वर्ष की आयु में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़कर अपना जीवन देश के नाम समर्पित कर दिया।
जनसंघ से BJP तक: संगठनकर्ता की भूमिका
आडवाणी ने जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। जब अटल बिहारी वाजपेयी ने चार वर्ष की अध्यक्षता के बाद किसी और को अवसर देने की सोची, तो उन्होंने आडवाणी को पार्टी की कमान सौंपने का प्रस्ताव रखा। आडवाणी ने संकोच किया — उनका मानना था कि वे वाजपेयी जैसे प्रखर वक्ता नहीं हैं और सार्वजनिक सभाओं में घबराहट महसूस करते हैं। अटल के बार-बार समझाने पर दिसंबर 1972 में वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने।
1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद आडवाणी उस पार्टी में सबसे अधिक समय तक अध्यक्ष पद पर बने रहने वाले नेता बने। 1984 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को केवल 2 सीटें मिली थीं, लेकिन 1990 में आडवाणी की ऐतिहासिक राम रथयात्रा ने उन्हें एक जननेता के रूप में स्थापित किया और पार्टी को नया जनाधार दिया। इसका सीधा परिणाम 1989 के चुनावों में 86 सीटों के रूप में सामने आया।
चुनावी उभार और राजनीतिक शिखर
पार्टी का यह विस्तार अपनी गति से बढ़ता रहा। 1992 में 121 सीटें और 1996 में 161 सीटें हासिल कर भाजपा लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी बन गई — आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। उस ऐतिहासिक क्षण पर आडवाणी ने कहा था, 'प्रकृति हमारे सामने खुशहाली और उनके मायने सामने लाकर रख देती है ताकि हम खुद उनमें से चुन सकें, लेकिन मुझे भारी मात्रा में दोनों प्राप्त हुए हैं।'
तीन दशकों की संसदीय पारी के बाद आडवाणी पहले गृह मंत्री बने और फिर 1999 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में देश के उप प्रधानमंत्री रहे। 10 दिसंबर 2007 को भाजपा के संसदीय बोर्ड ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि 2009 के आम चुनावों में आडवाणी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। हालाँकि, उस चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मनमोहन सिंह पुनः प्रधानमंत्री बने और आडवाणी ने 15वीं लोकसभा में सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष बनाया।
वैचारिक विरासत और राष्ट्रीय सम्मान
आडवाणी को उनके दौर के सबसे बुद्धिजीवी, सक्षम और दृढ़ नेताओं में गिना जाता रहा है। आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध सख्त नीति के लिए वे विशेष रूप से जाने गए। संसद में उनके भाषण तथ्यपरक, तार्किक और राष्ट्रहित से प्रेरित रहे। वाजपेयी उनके बारे में बताते थे कि आडवाणी ने कभी राष्ट्रवाद के मूलभूत विचार को नहीं त्यागा।
देश ने उनके योगदान को मान्यता दी। 2015 में उन्हें पद्म विभूषण से और 2024 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। गौरतलब है कि छह दशकों से अधिक की राजनीतिक यात्रा में उन्होंने सिद्धांत, संगठन क्षमता और लोकतंत्र के प्रति अटूट आस्था का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह भारतीय राजनीति में विरले ही देखने को मिलता है।
आडवाणी की विरासत: भविष्य के लिए सबक
यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब भारतीय राजनीति में संगठन बनाम व्यक्तित्व की बहस तेज है। आडवाणी ने दिखाया कि एक विचारधारा-केंद्रित संगठन, यदि सही नेतृत्व पाए, तो कैसे दो सीटों से देश की सबसे बड़ी पार्टी बन सकता है। उनकी जीवन-यात्रा भारतीय राजनीति के उन अध्यायों में दर्ज है, जिन्हें समझे बिना आज की राजनीति को समझना अधूरा रहेगा।