उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा — अहिंसा विचार, वचन और कर्म तीनों में हिंसा का अभाव है
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 4 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित महापर्व क्षमापना समारोह-2026 को संबोधित करते हुए कहा कि अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि विचार, वचन और कर्म — तीनों स्तरों पर हिंसा का पूर्ण अभाव है। यह समारोह भगवान महावीर स्मारक समिति और जैन महासभा दिल्ली द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था, जिसमें पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
क्षमापना का आध्यात्मिक महत्त्व
उपराष्ट्रपति ने कहा कि जैन परंपरा ने जिस गहराई के साथ क्षमा को एक आध्यात्मिक अनुशासन में रूपांतरित किया है, वह आज के भारत और समूची मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने रेखांकित किया कि क्षमापान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव हृदय के आंतरिक परिवर्तन का सुअवसर है।
राधाकृष्णन ने कहा कि क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना या सत्य से समझौता करना नहीं है। उनके शब्दों में — 'क्षमा का अर्थ है बदले की जगह सुधार, घृणा के बजाय बातचीत और शत्रुता के स्थान पर सुलह को चुनना।' उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिक्रमण की भावना व्यक्तियों और परिवारों को गलतियाँ स्वीकार करने और संघर्षों को सुलझाने में सहायक हो सकती है।
भगवान महावीर की शिक्षाएँ और वैश्विक शांति
उपराष्ट्रपति ने कहा कि संघर्ष और हिंसा की साक्षी बनी आज की दुनिया में भगवान महावीर की शिक्षाएँ शांति, संवाद, सह-अस्तित्व और करुणा का मार्ग प्रशस्त करती हैं। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने मानवता को आंतरिक विजय का पथ दिखाया और स्मरण कराया कि सच्ची शक्ति क्रोध, असहिष्णुता तथा प्रतिशोध पर नियंत्रण पाने में निहित है।
राधाकृष्णन ने जोड़ा कि सभी जीवित प्राणियों के प्रति मित्रता और किसी के प्रति शत्रुता न रखने की जैन शिक्षा 'वसुधैव कुटुम्बकम' के भारत के सभ्यतागत मूल्य से गहराई से जुड़ती है।
तमिलनाडु और जैन धर्म का ऐतिहासिक सेतु
तमिलनाडु से आने वाले राधाकृष्णन ने तमिल संस्कृति और जैन धर्म के बीच ऐतिहासिक संबंध को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने शास्त्रीय तमिल साहित्य में जैन विद्वानों और भिक्षुओं के योगदान को याद किया तथा पूरे तमिलनाडु में प्राचीन जैन मंदिरों और शिक्षा केंद्रों की समृद्ध उपस्थिति का उल्लेख किया। गौरतलब है कि यह ऐतिहासिक संदर्भ जैन दर्शन की भारतीय बहुलवादी परंपरा में गहरी जड़ों को दर्शाता है।
विकसित भारत और नैतिक आधार
उपराष्ट्रपति ने विकसित भारत के दृष्टिकोण को इन सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ते हुए कहा कि विकास को केवल आर्थिक समृद्धि, आधुनिक बुनियादी ढाँचे और तकनीकी प्रगति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक वास्तविक रूप से विकसित भारत में नागरिकों के बीच विश्वास, परिवारों में मूल्य, युवाओं में चरित्र और समाज में करुणा का होना अनिवार्य है — यही 'विकास भी, विरासत भी' की भावना है।
उन्होंने उपस्थित जनसमूह से विनम्रता, सेवा, एकता और जिम्मेदारी के मूल्यों का पोषण करने का आह्वान किया। समारोह में उपराष्ट्रपति ने केसी जैन को प्रतिष्ठित जैन समाज रत्न पुरस्कार से भी सम्मानित किया।
आगे की राह
यह समारोह ऐसे समय में आयोजित हुआ जब वैश्विक स्तर पर सांप्रदायिक तनाव और संघर्ष की घटनाएँ बढ़ रही हैं। उपराष्ट्रपति के संबोधन ने जैन दर्शन को समकालीन सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों से जोड़ते हुए इसे एक व्यावहारिक नैतिक मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया। आने वाले समय में इस तरह के सांस्कृतिक संवाद मंच भारत की 'सॉफ्ट पावर' को और मज़बूत करने में भूमिका निभा सकते हैं।