सीजेपी प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती: 'देश को टकराव नहीं, विवेक और संवाद चाहिए'
सारांश
मुख्य बातें
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने 12 अक्टूबर 2026 को ऋषिकेश से दिल्ली में सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के विरोध-प्रदर्शन के संदर्भ में राष्ट्रहित, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपनी मांगें उठाने का अधिकार है, किंतु यह अधिकार मर्यादा और संविधान की सीमाओं के भीतर ही अर्थपूर्ण है। उनके अनुसार, इस समय देश को टकराव और आक्रोश नहीं, बल्कि विवेक, आत्मसंयम और समाधान की आवश्यकता है।
राष्ट्र प्रथम, संविधान सर्वोपरि
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि राष्ट्र है, तभी हम हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा, 'संविधान ही समाधान है और संवाद ही समाधान है।' किसी भी मुद्दे पर आगे बढ़ते समय इस मूल भावना को ध्यान में रखना अनिवार्य है। उनका यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब दिल्ली में सीजेपी का प्रदर्शन चर्चा में है और उसे लेकर देशभर में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।
सौहार्द और एकता पर बल
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति आपसी विश्वास और सौहार्द में निहित है, न कि टकराव में। उन्होंने महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को आज किसी नए संघर्ष की नहीं, बल्कि महान भारत की यात्रा को आगे बढ़ाने की दरकार है। समाज में सभी की आवाज़ का सम्मान होना चाहिए, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी आंदोलन के दौरान संविधान की मर्यादा और सामाजिक एकता को ठेस न पहुँचे। उन्होंने आरोप लगाने के बजाय समाधान खोजने और आक्रोश के स्थान पर आत्मसंयम अपनाने की पुरज़ोर अपील की।
पुलिस की भूमिका और आपसी संवेदनशीलता
पुलिस की भूमिका पर बोलते हुए स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, 'पुलिस की वर्दी के भीतर भी एक इंसान होता है, जिसका अपना परिवार, उम्मीदें और जिम्मेदारियाँ होती हैं।' उनके अनुसार, पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी — दोनों ही उसी समाज और राष्ट्र परिवार के हिस्से हैं, इसलिए दोनों पक्षों के बीच आदर और संवेदनशीलता कायम रहनी चाहिए।
समाधान का मार्ग: संवाद और संयम
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि लोग अपनी माँगें अवश्य उठाएँ, परंतु ऐसा कोई कदम न उठाया जाए जिससे राष्ट्र की गरिमा आहत हो या समाज की एकता कमज़ोर पड़े। उनके मतानुसार, समाधान वही होना चाहिए जिसमें न किसी का अपमान हो, न किसी के अधिकारों का हनन, और न ही पुलिस तथा जनता आमने-सामने आएँ। संवाद और आपसी समझ के ज़रिए समस्याओं का निराकरण ही संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने का एकमात्र मार्ग है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सार्वजनिक असहमति के तरीकों को लेकर बहस जारी है। आगे यह देखना अहम होगा कि संबंधित पक्ष इस अपील को किस रूप में स्वीकार करते हैं और क्या संवाद की राह खुलती है।