स्वामी चिदानंद ने यूसीसी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत किया, कहा- 'महिलाओं के अधिकारों का हनन अन्याय है'
सारांश
Key Takeaways
- महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण आवश्यक है।
- यूसीसी का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून प्रदान करना है।
- समाज में समानता और न्याय की स्थापना के लिए जागरूकता जरूरी है।
- स्वामी चिदानंद के विचार महत्वपूर्ण हैं।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक सकारात्मक कदम है।
ऋषिकेश, ११ (राष्ट्र प्रेस)। स्वामी चिदानंद सरस्वती ने 'समान नागरिक संहिता' (यूसीसी) पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई महत्वपूर्ण टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा है कि महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करना उनके जीवन की गुणवत्ता से वंचित करना है।
समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से बातचीत में स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मैं न्यायाधीशों की बहुत इज्जत करता हूँ। इस निर्णय के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को समान विरासत के अधिकार की दिशा में एक ऐतिहासिक संदेश दिया है। यह केवल न्याय का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज को पुरानी परंपराओं से मुक्त होने की एक सशक्त अपील भी है।"
उन्होंने आगे कहा, "यह एक नई शुरुआत और नया अध्याय है। हमें अपने भीतर की चेतना को जागृत करने की आवश्यकता है और महिला शक्ति को समान अधिकार देने का मार्ग अपनाना चाहिए। हमें अपनी आवाज को उठाना होगा। यह केवल यूसीसी के लागू होने से ही संभव है, इसके बिना नहीं। यूसीसी केवल कानून का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज के नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वास्थ्य का प्रतीक है। हमें पुराने भ्रमों को दूर कर नारी का सम्मान करना चाहिए और अपने विचारों की शक्ति को मान्यता देनी चाहिए। समाज में समानता, न्याय और बराबरी का आदर्श स्थापित करना चाहिए।
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने यह भी कहा कि महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करना उन्हें उनके जीवन की उच्चता से वंचित करना है। समाज के हर नागरिक, परिवार और धर्म के अनुयायियों को इस न्यायपूर्ण परिवर्तन में भाग लेना चाहिए।
उन्होंने अपने बयान में कहा, "महिला है तो निस्संदेह नवीनता है। यूसीसी केवल कानूनी परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक है। हमें एक ऐसा संदेश देना चाहिए जो समाज को झकझोर दे और भविष्य को न्याय और समानता के मार्ग पर अग्रसर करे। हमें इसकी दिशा में काम करना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत होना चाहिए।"