महिलाओं के अधिकारों पर पर्सनल लॉ का प्रभाव: यूसीसी की आवश्यकता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
- पर्सनल लॉ का महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव।
- यूसीसी पर विचार करने की आवश्यकता।
- महिलाओं को समानता और न्याय दिलाने के लिए कानून में सुधार।
- जनहित याचिका द्वारा महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की मांग।
नई दिल्ली, 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। महिलाओं के अधिकारों से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किया कि यदि पर्सनल लॉ महिलाओं को संविधान के अंतर्गत मिलने वाले उनके मूल अधिकारों से वंचित करते हैं, तो इस स्थिति में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) पर विचार करना अनिवार्य हो जाता है।
अदालत ने कहा कि सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने हेतु एक समान कानूनी ढांचे की आवश्यकता हो सकती है।
वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के एक समूह द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट, 1937 में संशोधन की मांग की गई है, ताकि मुस्लिम महिलाओं को विरासत और उत्तराधिकार में समान अधिकार मिल सकें। याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान में मुस्लिम महिलाओं को अपने माता-पिता की संपत्ति में बहुत कम हिस्सा मिलता है, जिससे बदलाव की आवश्यकता है।
मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता में पीठ ने इस दौरान कई महत्वपूर्ण बातें रखीं। अदालत ने कहा कि यदि 1937 का यह कानून पूरी तरह समाप्त कर दिया जाता है, तो इससे एक कानूनी खामी उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थिति में महिलाओं को वे अधिकार भी नहीं मिल पाएंगे, जो उन्हें इस कानून के तहत प्राप्त हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाला बागची ने भी अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि यदि अदालत इस क्षेत्र में सीधा हस्तक्षेप करती है, तो इसका असर अन्य व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) में उत्तराधिकार से संबंधित नियमों पर भी इसका प्रभाव हो सकता है।
जस्टिस बागची ने यह भी सुझाव दिया कि इस प्रकार के व्यापक कानून से जुड़े निर्णय सरकार को सौंप दिए जाएं, क्योंकि अदालत स्वयं कानून नहीं बना सकती।
यह जनहित याचिका पोलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद द्वारा दायर की गई है। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को याचिका में आवश्यक संशोधन करने और इसे पुनः दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
इसके साथ ही अदालत ने यह सुझाव भी दिया कि याचिका में इस बात पर ध्यान दिया जाए कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने के लिए क्या व्यावहारिक उपाय किए जा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि कोशिश यह होनी चाहिए कि 1937 के शरीयत एक्ट में सीधे हस्तक्षेप किए बिना मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार कैसे प्रदान किए जा सकते हैं।