अक्षय तृतीया: विशेष आयोजन और धार्मिक महत्व
सारांश
Key Takeaways
- अक्षय तृतीया का धार्मिक महत्व
- विशेष पूजा और आयोजन
- दान और पुण्य का फल
- सोने और अन्य वस्तुओं की खरीदारी
- त्योहार का सांस्कृतिक महत्व
नई दिल्ली, 16 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। सनातन धर्म में अक्षय तृतीया को अत्यंत पवित्र और शुभ तिथि माना जाता है। बैसाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि नारायण को समर्पित है। संस्कृत में ‘अक्षय’ का अर्थ ‘जो कभी समाप्त न हो’ होता है, इसलिए इस दिन किए गए दान, पुण्य, नए कार्यों का आरंभ और घर-मंदिर का निर्माण सदैव फलदायी माना जाता है। इस दिन पूरे 24 घंटे शुभ होते हैं, जिससे किसी भी शुभ कार्य के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
ज्योतिषियों के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन नए व्यापार, निवेश, विवाह और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत के लिए अत्यधिक अनुकूल होता है। इस पावन अवसर पर कई मंदिरों में विशेष उत्सव और कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
अक्षय तृतीया तिथि से चार धाम यात्रा का शुभारंभ होता है। गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिर के कपाट इसी दिन खुलते हैं। केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर भी इस शुभ मुहूर्त पर खुलते हैं। मान्यता है कि इन महीनों में देवता स्वयं भगवान शिव और विष्णु की पूजा करते हैं।
पुरी में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा की तैयारी भी अक्षय तृतीया से प्रारंभ होती है। पुरी में बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ के तीनों रथों का निर्माण इसी दिन शुरू होता है। मंदिर के पुजारी भगवान को माला पहनाकर निर्माण कार्य का आरंभ करते हैं।
आंध्र प्रदेश के सिंहाचलम मंदिर में अक्षय तृतीया के दिन चंदन लेप हटाकर भगवान वराह नरसिंह का निज रूप दर्शन कराए जाते हैं। पूरे साल चंदन की परत से ढकी रहने वाली मूर्ति केवल अक्षय तृतीया के दिन ही भक्तों को अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देती है। वहीं, तमिलनाडु के कुंभकोणम में कई विष्णु मंदिरों में गरुड़ वाहन पर देवताओं की शोभा यात्रा निकाली जाती है। ओडिशा के रेमुना मंदिर में भगवान क्षीरचोरा गोपीनाथ पर चंदन का लेप लगाकर ग्रीष्म ऋतु से इसी दिन राहत दी जाती है।
अक्षय तृतीया के दिन वृंदावन में कई मंदिरों में फूल सजाए जाते हैं और चंदन अलंकरण का उत्सव मनाया जाता है। साथ ही वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में भगवान के पूरे साल ढके रहने वाले चरण कमल के दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही भक्तों को होते हैं। वृंदावन के गरुड़ गोविंद मंदिर में भगवान के विशेष दर्शन के लिए कपाट खुलता है। वहीं, वृंदावन के गरुड़ गोविंद मंदिर में भगवान विष्णु की 12 भुजाओं वाली मूर्ति भी अक्षय तृतीया के दिन दर्शन देती है।
इसके अलावा, अक्षय तृतीया की शुभता कई ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाओं से जुड़ी हुई है। त्रेता युग की शुरुआत इसी दिन हुई थी। गंगा नदी इसी दिन पृथ्वी पर अवतरित हुई। महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना भी इसी दिन की थी। भगवान परशुराम का अवतार, पांडवों को अक्षय पात्र की प्राप्ति, माता अन्नपूर्णा का प्रकट होना और कुबेर का धन का देवता बनना—ये सभी घटनाएं अक्षय तृतीया के दिन घटीं।
अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु की पूजा, दान-पुण्य और सत्कर्म करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही सोना, हल्दी की गांठ, रूई, पीली सरसों, और कौड़ी खरीदने से बरकत होती है, और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।