12 अक्टूबर 2026
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अंबाजी मंदिर के मोहनथाल प्रसाद को जीआई टैग, गुजरात की धार्मिक विरासत को मिली कानूनी पहचान

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अंबाजी मंदिर के मोहनथाल प्रसाद को जीआई टैग, गुजरात की धार्मिक विरासत को मिली कानूनी पहचान

सारांश

अंबाजी मंदिर का मोहनथाल प्रसाद अब तिरुपति लड्डू और पलानी पंचामृतम की श्रेणी में — जीआई टैग के साथ इसे कानूनी पहचान और नकल से सुरक्षा मिली। नवरात्रि पर यह घोषणा धार्मिक विरासत संरक्षण की दिशा में एक सार्थक कदम है।

मुख्य बातें

अंबाजी मंदिर के पारंपरिक मोहनथाल प्रसाद को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया।
प्रमाणपत्र 1 अक्टूबर 2026 को जारी हुआ; नवरात्रि के पहले दिन चाचर चौक पर श्री अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को सौंपा गया।
समारोह की अध्यक्षता प्रो.
उन्नत पंडित (कंट्रोलर जनरल, पेटेंट, डिजाइन एवं ट्रेडमार्क) ने की।
जीआई टैग नाम के अनधिकृत उपयोग के विरुद्ध कानूनी सुरक्षा देगा और पारंपरिक निर्माण विधि को बनाए रखेगा।
मोहनथाल अब तिरुपति लड्डू और पलानी पंचामृतम जैसे जीआई-प्राप्त धार्मिक प्रसादों की सूची में शामिल।
EDII अहमदाबाद के विशेष जीआई स्टोर के माध्यम से प्रसाद की व्यावसायिक पहुँच बढ़ाने की योजना।

गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर के पारंपरिक मोहनथाल प्रसाद को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। 1 अक्टूबर 2026 को यह प्रमाणपत्र जारी किया गया और नवरात्रि के पहले दिन अंबाजी के चाचर चौक पर आयोजित एक विशेष समारोह में श्री अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को यह सर्टिफिकेट औपचारिक रूप से सौंपा गया। इस मान्यता से मोहनथाल के नाम को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इसकी पारंपरिक निर्माण विधि व सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सकेगा।

समारोह का आयोजन और मुख्य उपस्थिति

इस ऐतिहासिक समारोह की अध्यक्षता पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क के कंट्रोलर जनरल तथा ज्योग्राफिकल इंडिकेशन्स के रजिस्ट्रार प्रो. डॉ. उन्नत पंडित ने की। बनासकांठा जिले के कलेक्टर मिहिर पटेल, अंबाजी मंदिर के प्रशासक एवं अतिरिक्त कलेक्टर कौशिक मोदी, कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) की गुजरात इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी टास्क फोर्स के अधिकारी, मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और श्रद्धालु भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

मंदिर प्रशासक कौशिक मोदी ने समारोह को संबोधित करते हुए जीआई टैग के महत्व और इस मान्यता को हासिल करने के लिए ट्रस्ट द्वारा की गई कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी साझा की।

जीआई टैग का महत्व और कानूनी सुरक्षा

प्रो. डॉ. उन्नत पंडित ने कार्यक्रम में पारंपरिक उत्पादों की प्रामाणिकता बनाए रखने की अनिवार्यता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, 'जीआई टैग से यह पक्का करने में मदद मिलेगी कि अंबाजी आने वाले भक्तों को असली मोहनथाल प्रसाद मिले।' उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि यह टैग मोहनथाल के नाम के अनधिकृत उपयोग और नकल के विरुद्ध कानूनी ढाल का काम करेगा और प्रसाद को पारंपरिक विधि से तैयार करने की प्रक्रिया को अक्षुण्ण बनाए रखेगा।

गौरतलब है कि जीआई टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति से जोड़ता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल उसी क्षेत्र में, उसी परंपरागत विधि से बना उत्पाद उस नाम का उपयोग कर सके।

EDII की भूमिका और जीआई स्टोर

समारोह में अहमदाबाद स्थित एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (EDII) की भूमिका की भी विशेष सराहना की गई। EDII ने जीआई-टैग प्राप्त उत्पादों को बढ़ावा देने और उनकी बिक्री के लिए एक समर्पित जीआई स्टोर शुरू किया है, जिसमें देशभर के विविध पारंपरिक उत्पाद उपलब्ध हैं। यह पहल न केवल उत्पादों की प्रामाणिकता बनाए रखती है, बल्कि उनकी व्यावसायिक पहुँच का विस्तार करने में भी सहायक है।

धार्मिक प्रसादों की जीआई श्रृंखला में नया अध्याय

इस मान्यता के साथ अंबाजी का मोहनथाल उन प्रतिष्ठित भारतीय धार्मिक प्रसादों की सूची में शामिल हो गया है जिन्हें जीआई टैग प्राप्त है — जैसे तिरुपति लड्डू और पलानी पंचामृतम। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पारंपरिक खाद्य उत्पादों की बौद्धिक संपदा की सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।

प्रो. डॉ. पंडित ने इसे केवल व्यावसायिक सुरक्षा से परे बताते हुए कहा कि इस सम्मान से न सिर्फ मोहनथाल की विशिष्ट पहचान को मान्यता मिली है, बल्कि माँ जगदंबा में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और इस क्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत का भी सम्मान हुआ है। आने वाले समय में इस मान्यता से प्रसाद की गुणवत्ता नियंत्रण और ब्रांड की विश्वसनीयता और अधिक सुदृढ़ होने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि धार्मिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक बौद्धिक संपदा के बीच बढ़ते संबंध का प्रतीक है। तिरुपति लड्डू विवाद जैसी घटनाओं के बाद मंदिर प्रसादों की प्रामाणिकता एक राष्ट्रीय चिंता बन चुकी है, और यह टैग उसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण हो जाता है। हालाँकि असली परीक्षा इस बात की होगी कि ट्रस्ट इस कानूनी ढाँचे को जमीन पर कितनी सख्ती से लागू कर पाता है — क्योंकि जीआई टैग तभी अर्थपूर्ण है जब उल्लंघन पर सक्रिय निगरानी हो।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अंबाजी मंदिर के मोहनथाल प्रसाद को जीआई टैग क्या है?
जीआई टैग एक कानूनी मान्यता है जो अंबाजी के पारंपरिक मोहनथाल प्रसाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति और परंपरागत निर्माण विधि से जोड़ती है। यह प्रमाणपत्र 1 अक्टूबर 2026 को जारी हुआ और श्री अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को सौंपा गया।
जीआई टैग से मोहनथाल प्रसाद को क्या फायदा होगा?
जीआई टैग मोहनथाल के नाम के अनधिकृत उपयोग और नकल के विरुद्ध कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा। साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि भक्तों को पारंपरिक विधि से बना प्रामाणिक प्रसाद ही मिले।
अंबाजी मोहनथाल का जीआई सर्टिफिकेट किसे सौंपा गया?
यह सर्टिफिकेट श्री अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को नवरात्रि के पहले दिन चाचर चौक पर आयोजित समारोह में सौंपा गया। समारोह की अध्यक्षता प्रो. डॉ. उन्नत पंडित ने की।
भारत में और कौन-से धार्मिक प्रसादों को जीआई टैग मिला है?
अंबाजी के मोहनथाल से पहले तिरुपति लड्डू और पलानी पंचामृतम जैसे प्रसिद्ध धार्मिक प्रसाद जीआई टैग प्राप्त कर चुके हैं। मोहनथाल इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल होने वाला नवीनतम प्रसाद है।
EDII का जीआई स्टोर मोहनथाल के लिए कैसे उपयोगी होगा?
अहमदाबाद स्थित एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (EDII) का जीआई स्टोर देशभर के जीआई-प्रमाणित उत्पादों को एक मंच पर बेचने और उनकी पहुँच बढ़ाने में मदद करता है। इससे मोहनथाल की पारंपरिक पहचान बनाए रखते हुए उसकी बिक्री को व्यापक बाज़ार मिलेगा।
राष्ट्र प्रेस
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