अंबाजी मंदिर के मोहनथाल प्रसाद को जीआई टैग, गुजरात की धार्मिक विरासत को मिली कानूनी पहचान
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर के पारंपरिक मोहनथाल प्रसाद को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। 1 अक्टूबर 2026 को यह प्रमाणपत्र जारी किया गया और नवरात्रि के पहले दिन अंबाजी के चाचर चौक पर आयोजित एक विशेष समारोह में श्री अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को यह सर्टिफिकेट औपचारिक रूप से सौंपा गया। इस मान्यता से मोहनथाल के नाम को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इसकी पारंपरिक निर्माण विधि व सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
समारोह का आयोजन और मुख्य उपस्थिति
इस ऐतिहासिक समारोह की अध्यक्षता पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क के कंट्रोलर जनरल तथा ज्योग्राफिकल इंडिकेशन्स के रजिस्ट्रार प्रो. डॉ. उन्नत पंडित ने की। बनासकांठा जिले के कलेक्टर मिहिर पटेल, अंबाजी मंदिर के प्रशासक एवं अतिरिक्त कलेक्टर कौशिक मोदी, कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) की गुजरात इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी टास्क फोर्स के अधिकारी, मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और श्रद्धालु भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।
मंदिर प्रशासक कौशिक मोदी ने समारोह को संबोधित करते हुए जीआई टैग के महत्व और इस मान्यता को हासिल करने के लिए ट्रस्ट द्वारा की गई कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी साझा की।
जीआई टैग का महत्व और कानूनी सुरक्षा
प्रो. डॉ. उन्नत पंडित ने कार्यक्रम में पारंपरिक उत्पादों की प्रामाणिकता बनाए रखने की अनिवार्यता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, 'जीआई टैग से यह पक्का करने में मदद मिलेगी कि अंबाजी आने वाले भक्तों को असली मोहनथाल प्रसाद मिले।' उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि यह टैग मोहनथाल के नाम के अनधिकृत उपयोग और नकल के विरुद्ध कानूनी ढाल का काम करेगा और प्रसाद को पारंपरिक विधि से तैयार करने की प्रक्रिया को अक्षुण्ण बनाए रखेगा।
गौरतलब है कि जीआई टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति से जोड़ता है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल उसी क्षेत्र में, उसी परंपरागत विधि से बना उत्पाद उस नाम का उपयोग कर सके।
EDII की भूमिका और जीआई स्टोर
समारोह में अहमदाबाद स्थित एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (EDII) की भूमिका की भी विशेष सराहना की गई। EDII ने जीआई-टैग प्राप्त उत्पादों को बढ़ावा देने और उनकी बिक्री के लिए एक समर्पित जीआई स्टोर शुरू किया है, जिसमें देशभर के विविध पारंपरिक उत्पाद उपलब्ध हैं। यह पहल न केवल उत्पादों की प्रामाणिकता बनाए रखती है, बल्कि उनकी व्यावसायिक पहुँच का विस्तार करने में भी सहायक है।
धार्मिक प्रसादों की जीआई श्रृंखला में नया अध्याय
इस मान्यता के साथ अंबाजी का मोहनथाल उन प्रतिष्ठित भारतीय धार्मिक प्रसादों की सूची में शामिल हो गया है जिन्हें जीआई टैग प्राप्त है — जैसे तिरुपति लड्डू और पलानी पंचामृतम। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पारंपरिक खाद्य उत्पादों की बौद्धिक संपदा की सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।
प्रो. डॉ. पंडित ने इसे केवल व्यावसायिक सुरक्षा से परे बताते हुए कहा कि इस सम्मान से न सिर्फ मोहनथाल की विशिष्ट पहचान को मान्यता मिली है, बल्कि माँ जगदंबा में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और इस क्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत का भी सम्मान हुआ है। आने वाले समय में इस मान्यता से प्रसाद की गुणवत्ता नियंत्रण और ब्रांड की विश्वसनीयता और अधिक सुदृढ़ होने की उम्मीद है।