अंकिता भंडारी हत्याकांड: ADG मुरुगेशन बोले — 88 दिन में चार्जशीट, तीनों दोषियों को आजीवन कारावास
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अपराध एवं कानून-व्यवस्था) डॉ. वी. मुरुगेशन ने 15 अक्टूबर 2026 को देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अंकिता भंडारी हत्याकांड की जाँच और न्यायिक कार्यवाही की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड सरकार ने इस संवेदनशील मामले में प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने और न्यायिक प्रक्रिया को गति देने के लिए हर आवश्यक कदम उठाया।
घटना और तत्काल कार्रवाई
ऋषिकेश के निकट स्थित वनंतरा रिसॉर्ट में कार्यरत अंकिता भंडारी के साथ हुई इस दुखद घटना के सामने आते ही उत्तराखंड पुलिस ने तत्परता दिखाई। डॉ. मुरुगेशन ने बताया कि पुलिस टीमों ने समन्वित प्रयासों से घटना उजागर होने के 24 घंटे के भीतर ही तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था।
मामले की गंभीरता और सार्वजनिक संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर तत्काल एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया गया। जाँच की निष्पक्षता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए DIG रैंक की एक महिला आईपीएस अधिकारी को SIT का नेतृत्व सौंपा गया।
जाँच की कार्यप्रणाली
SIT ने डिजिटल, तकनीकी, फोरेंसिक और भौतिक — चारों श्रेणियों के साक्ष्य अत्यंत सूक्ष्मता से जुटाए। आरोपियों से विस्तृत पूछताछ, फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण किया गया।
डॉ. मुरुगेशन ने बताया कि SIT ने 88 दिनों के भीतर जाँच पूर्ण कर अदालत में लगभग 500 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की। यह उत्तराखंड पुलिस के लिए किसी हाई-प्रोफाइल मामले में असाधारण रूप से त्वरित जाँच-समापन माना जा रहा है।
अदालत का फैसला
SIT द्वारा प्रस्तुत ठोस साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की प्रभावी दलीलों के आधार पर कोटद्वार की अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने 30 मई 2025 को तीनों आरोपियों — पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता — को दोषी करार दिया।
अदालत ने तीनों को आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई। डॉ. मुरुगेशन ने पुष्टि की कि तीनों दोषी फिलहाल जेल में अपनी सजा काट रहे हैं।
सरकार और पुलिस की भूमिका
गौरतलब है कि यह मामला सामने आने के बाद उत्तराखंड में व्यापक जन-आक्रोश देखा गया था। राज्य सरकार पर त्वरित न्याय सुनिश्चित करने का दबाव था। ADG ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि पूरी जाँच और अभियोजन प्रक्रिया को एक महिला अधिकारी की निगरानी में संचालित किया गया, जो संवेदनशीलता और जवाबदेही दोनों का प्रतीक है।
आगे की स्थिति
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में न्यायिक विलंब को लेकर चिंताएँ लगातार उठती रही हैं। इस मामले में 88 दिन में चार्जशीट और 30 मई 2025 को सजा का फैसला, तेज़ न्यायिक प्रक्रिया के एक उदाहरण के रूप में उत्तराखंड पुलिस के लिए संदर्भ बिंदु बन सकता है। दोषियों की संभावित अपील की स्थिति अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।