क्या आरिफ मोहम्मद खान ने पद की लालसा छोड़कर हमेशा अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी?
सारांश
Key Takeaways
- आरिफ मोहम्मद खान का जन्म 1951 में हुआ।
- उन्होंने सिद्धांतों के लिए मंत्री पद छोड़ा।
- शाह बानो केस में उन्होंने महिला अधिकारों का समर्थन किया।
- उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़कर जनता दल में शामिल हुए।
- उनकी पहचान उनके साहसिक फैसलों से बनी है।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। जब देश की राजनीति में अधिकतर रास्ते सत्ता, समझौते और चुप्पियों के पक्ष में होते हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो विचारधारा के साथ चलते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कितनी भी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। ऐसे व्यक्ति, जो जी हूजूरी करने के बजाय सवाल उठाते हैं, अपनी पद की लालसा को मन से निकालकर यह साबित कर देते हैं कि वे गलत को गलत कहने की क्षमता रखते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें पद छोड़ना पड़े। सत्ता के शोर में भी आंतरिक आवाज सुनना ही उन्हें भारतीय राजनीति में अलग बनाता है।
18 जनवरी 1951 को जन्मे आरिफ मोहम्मद खान ऐसे ही विरले व्यक्तित्व हैं, जिनकी पहचान किसी पद से नहीं, बल्कि उनके साहसिक फैसलों और स्पष्ट विचारधारा से बनी है।
बिहार के वर्तमान राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी अपनी आंतरिक आवाज को दबने नहीं दिया। समय आने पर उन्होंने उस सरकार से भी सवाल उठाया, जो उस समय सर्वशक्तिमान थी।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जन्मे आरिफ मोहम्मद खान का पारिवारिक संबंध बाराबंकी से रहा है। उनकी शुरुआती शिक्षा दिल्ली के जामिया मिल्लिया स्कूल में हुई, उसके बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) की पढ़ाई की और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। छात्र जीवन से ही वे सक्रिय राजनीति में शामिल हुए। 1972-73 में एएमयू स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव और 1973-74 में अध्यक्ष चुने गए।
राजनीतिक सफर की शुरुआत में उन्होंने भारतीय क्रांति दल के टिकट पर बुलंदशहर की सियाना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, हालांकि पहली बार में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1977 में महज 26 वर्ष की आयु में वे विधायक बने। इसके बाद कांग्रेस में शामिल होकर उन्होंने 1980 में कानपुर और 1984 में बहराइच से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। इसी दौरान वे केंद्र सरकार में सूचना एवं प्रसारण के उप मंत्री और विभिन्न मंत्रालयों में राज्य मंत्री बने।
आरिफ मोहम्मद का नाम भारतीय राजनीति में हमेशा शाह बानो केस के संदर्भ में विशेष रूप से याद किया जाएगा। 1985 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शाह बानो के पक्ष में दिए गए फैसले के दौरान, जब पूरा देश तीन तलाक और मुस्लिम महिला अधिकारों को लेकर दो ध्रुवों में बंटा हुआ था, तब राजीव गांधी सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने संविधान और महिला अधिकारों के पक्ष में खुलकर आवाज उठाई। 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया गया उनका भाषण आज भी साहसिक संसदीय वक्तव्यों में गिना जाता है।
जब मुस्लिम समाज के दबाव में आकर राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ से संबंधित कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया, तो आरिफ मोहम्मद खान ने सत्ता से समझौता करने के बजाय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। आरिफ मोहम्मद खान ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया। यह निर्णय भारतीय राजनीति में नैतिक साहस की एक दुर्लभ मिसाल बना, जहां किसी नेता ने कुर्सी के बजाय अपने सिद्धांतों को प्राथमिकता दी।
कांग्रेस छोड़ने के बाद वे जनता दल में शामिल हुए और 1989 में फिर से सांसद बने। जनता दल की सरकार में उन्होंने नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा और 1998 में बसपा के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। 2004 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन की, हालांकि 2007 में पार्टी में अपेक्षित भूमिका न मिलने के कारण वे अलग हो गए। इसके बावजूद 2014 के बाद तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने की प्रक्रिया में उनकी वैचारिक भूमिका महत्वपूर्ण रही।
आरिफ मोहम्मद खान ने अपने राजनीतिक जीवन में कृषि, ऊर्जा, उद्योग और गृह मामलों जैसे अहम विभागों में राज्य मंत्री और ऊर्जा व नागरिक उड्डयन जैसे मंत्रालयों में कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं, लेकिन उनकी असली पहचान मंत्रालयों की सूची नहीं है, बल्कि वह निरंतर संघर्ष है जिसमें उन्होंने धर्म, राजनीति और संविधान के बीच संतुलन बनाते हुए प्रगतिशील सोच को आगे बढ़ाया।