अरशद वारसी की संघर्ष की कहानी: अनाथ होकर भी न हारने वाली हिम्मत, आज हैं बॉलीवुड के कॉमेडी किंग
सारांश
Key Takeaways
- जिंदगी में संघर्ष से कभी हार नहीं मानना चाहिए।
- परिवार का महत्व और समर्थन जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
- कड़ी मेहनत और समर्पण से सफलता पाई जा सकती है।
- बचपन के अनुभव हमें मजबूत बनाते हैं।
- कॉमेडी में अरशद वारसी की अदाकारी अद्वितीय है।
मुंबई, 18 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। 'मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.' में सर्किट का किरदार हो या 'गोलमाल' श्रृंखला के माधव, कॉमेडी के क्षेत्र में अरशद वारसी को मात देना बेहद कठिन है।
इन दोनों ही पात्रों ने अरशद की जिंदगी में महत्वपूर्ण मोड़ लाया, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने सब कुछ खो दिया था और उनकी दुनिया पूरी तरह से बदल गई थी।
19 अप्रैल को मुंबई में जन्मे अरशद वारसी के लिए हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे अभिनय की दुनिया में कदम रखेंगे, लेकिन कहते हैं कि भाग्य में जो लिखा होता है, वह खुद ही आपके लिए दरवाजे खोलता है। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। माता-पिता की बीमारी और उनकी असमय मृत्यु के कारण अरशद ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया।
अरशद ने खुलासा किया था कि उनके पिता एक सफल बिजनेसमैन नहीं थे और उन्होंने पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया था। अभिनेता के पिता ने सारा धन अपने बिजनेस में लगा दिया और बोन कैंसर के शिकार हो गए, जबकि मां किडनी की बीमारी से जूझ रही थीं। हर हफ्ते मां का डायलिसिस होता था और घर में बचत का नामोनिशान नहीं था। उन्होंने कहा, "उस वक्त मैं कोरियोग्राफर था। गानों की कोरियोग्राफी करता था और नाटक करता था। मेरी सारी कमाई मां के डायलिसिस पर खर्च होती थी। यह प्रक्रिया हर हफ्ते दोहराई जाती थी। उस समय लगा कि जिंदगी कितनी कठिन है, एक छोटे से घर में जीना।"
माता-पिता के निधन ने उन्हें तोड़ दिया था, क्योंकि कोई भी आस-पास नहीं था, जो मदद कर सके। उस पल ने अरशद को एक रात में बड़ा बना दिया। अरशद ने बचपन में माता-पिता के साथ गहरा संबंध नहीं महसूस किया क्योंकि वे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहे थे। अभिनेता अकेलापन महसूस करते थे और अपने दोस्तों को चिट्ठियां लिखा करते थे।
एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वे उन लोगों को समझ नहीं पाते जो अपने माता-पिता के बिना नहीं रह सकते। कभी-कभी उनके माता-पिता उनकी छुट्टियों को भूल जाते थे, जिसकी वजह से उन्हें स्कूल में छोड़ दिया जाता था जबकि अन्य बच्चे घर चले जाते थे। वे साल में सिर्फ दो बार ही घर जाते थे।
इतनी सारी कठिनाइयों का सामना करने के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और जया बच्चन के माध्यम से फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उनकी पहली फिल्म थी 'तेरे मेरे सपने', जो अमिताभ बच्चन की कंपनी एबीसीएल के बैनर तले बनी थी। इसके बाद उन्होंने 'बेताबी,' 'मेरे दो अनमोल रत्न,' और 'हीरो हिंदुस्तानी' जैसी फिल्मों में काम किया, लेकिन सर्किट के किरदार ने उन्हें सिनेमा में एक नई पहचान दी।