सखी मंडल के ₹1 लाख के लोन ने बदली ज़िंदगी: बनासकांठा की गीताबेन आज 10 महिलाओं को दे रहीं रोज़गार
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के बनासकांठा जिले के डीसा में रहने वाली गीताबेन माली की कहानी उन हज़ारों महिलाओं की प्रेरणा बन चुकी है, जो आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। कभी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करने वाली गीताबेन आज सीएससी (कॉमन सर्विस सेंटर) संचालित कर रही हैं, ऑनलाइन व्यवसाय चला रही हैं, और 10 महिलाओं के साथ मिलकर सखी मंडल के ज़रिए अन्य महिलाओं को सशक्त बना रही हैं।
संकट से सफलता तक का सफर
गीताबेन माली के अनुसार, कुछ वर्ष पहले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी नाज़ुक थी कि कई बार घर में खाने-पीने तक के लाले पड़ जाते थे। उन्होंने बताया, 'पहले हमारी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, कई बार दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता था।' इसी कठिन दौर में उन्होंने सखी मंडल से जुड़ने का फैसला किया, जिसने उनकी ज़िंदगी को नई राह दिखाई।
सखी मंडल से जुड़ने के बाद गीताबेन को ₹1 लाख का ब्याज-मुक्त ऋण मिला। उन्होंने इस राशि का सदुपयोग करते हुए एक कंप्यूटर और अन्य ज़रूरी संसाधन खरीदे और घर से ही ऑनलाइन सेवाएं देनी शुरू कीं।
सीएससी सेंटर और ऑनलाइन कारोबार
ऑनलाइन काम की शुरुआत के बाद गीताबेन ने सीएससी सेंटर की स्थापना की, जहाँ वे सरकारी योजनाओं से संबंधित दस्तावेज़ीकरण, आवेदन और अन्य डिजिटल सेवाएं प्रदान करती हैं। इसके साथ ही वे 'हॉर्स ऑनलाइन' का कार्य भी कर रही हैं। गीताबेन ने कहा, 'सखी मंडल से जुड़ने के बाद मुझे बिना ब्याज के लोन मिला। उस पैसे से मैंने अपना काम शुरू किया और आज मुझे अच्छी आमदनी हो रही है।'
यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के प्रयास तेज़ हुए हैं। गौरतलब है कि डिजिटल सेवाओं की पहुँच बढ़ने से छोटे शहरों में सीएससी केंद्रों की माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
दूसरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम
गीताबेन अब सिर्फ अपने परिवार की ज़िम्मेदारी नहीं उठा रहीं, बल्कि वे 10 महिलाओं के सखी मंडल समूह का नेतृत्व भी कर रही हैं। उनके माध्यम से कई महिलाओं ने विधवा सहायता योजना और पीएम विश्वकर्मा योजना का लाभ उठाया है। उन्होंने बताया कि पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत ₹1 लाख तक का ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिससे महिलाएं स्वरोज़गार की ओर कदम बढ़ा सकती हैं।
गीताबेन के अनुसार, 'अब मेरा घर अच्छे से चल रहा है और मुझे घर के खर्च के लिए किसी से पैसे लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैं अपना खर्च खुद उठा रही हूं।' उनकी यह बात सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता की उस नींव को रेखांकित करती है, जो स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बन रही है।
सरकारी योजनाओं का असर
गीताबेन ने बताया कि सखी मंडल और सरकारी योजनाओं से उनके जैसी कई महिलाओं की तस्वीर बदली है। उनका मानना है कि पीएम विश्वकर्मा योजना, विधवा सहायता योजना और सखी मंडल जैसी पहलें महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में प्रभावी रही हैं।
आँकड़ों के अनुसार, गुजरात में सखी मंडलों के ज़रिए लाखों महिलाओं को सूक्ष्म ऋण और व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया है। गीताबेन जैसे उदाहरण दर्शाते हैं कि ज़मीनी स्तर पर ये योजनाएं सकारात्मक परिवर्तन ला रही हैं।
आगे की राह
गीताबेन माली की यह यात्रा यहीं नहीं रुकती। वे आगे और अधिक महिलाओं को डिजिटल साक्षरता और सरकारी योजनाओं से जोड़ने की दिशा में काम करने की योजना रखती हैं। उनकी कहानी बनासकांठा जैसे अर्ध-शहरी इलाकों में महिला सशक्तिकरण की नई संभावनाओं को सामने लाती है, जहाँ सही समय पर सही सहयोग ने एक महिला को आर्थिक संकट से निकालकर सामाजिक नेतृत्व की भूमिका में ला खड़ा किया है।