क्या कागज पर बराबरी है लेकिन जमीन पर भेदभाव है: कानूनों की टकराहट में बेटियों का हक क्यों दबा?

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क्या कागज पर बराबरी है लेकिन जमीन पर भेदभाव है: कानूनों की टकराहट में बेटियों का हक क्यों दबा?

सारांश

लखनऊ विश्वविद्यालय के अध्ययन ने उत्तराधिकार कानूनों की सच्चाई को उजागर किया है। जहां बेटियों को समान अधिकार दिये जाते हैं, वहीं जमीनी हकीकत में भेदभाव की स्थिति आज भी बनी हुई है। जानें कैसे केंद्र और राज्य के कानूनों में विरोधाभास बेटियों के अधिकारों को प्रभावित कर रहा है।

Key Takeaways

  • बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार होना चाहिए।
  • कानूनों में विरोधाभास बेटियों के अधिकारों को प्रभावित कर रहा है।
  • सरकार को कानूनों में सुधार करने की आवश्यकता है।
  • सर्वे में 90 प्रतिशत बेटियों को संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला।
  • बेटियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है।

लखनऊ, 13 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक हालिया अनुसंधान ने उत्तराधिकार कानूनों की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। यह स्पष्ट है कि जहां बेटियों को समान अधिकार देने की संवैधानिक बातें की जाती हैं, वहीं जमीनी हकीकत में भेदभाव आज भी व्याप्त है। रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्र और राज्य के कानूनों में विरोधाभास की वजह से बेटियां कृषि एवं पैतृक संपत्ति से वंचित रह जाती हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की रिसर्च एवं डेवलपमेंट योजना 2021-22 के अंतर्गत लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय द्वारा किए गए इस अध्ययन ने बेटियों के उत्तराधिकार अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। शोध में पाया गया है कि समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी और न्यायालयों के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बेटियों को संपत्ति में हिस्सेदारी से वंचित रखा जा रहा है।

प्रोफेसर राकेश कुमार सिंह, जो इस शोध परियोजना के प्रधान अन्वेषक हैं, ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का निर्धारण उत्तर प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 2006 के तहत होता है। इस संहिता में केवल अविवाहित पुत्रियों को पिता की कृषि भूमि पर अधिकार दिया गया है, जबकि विवाहित पुत्रियों को इस अधिकार से बाहर मान लिया गया है।

रिपोर्ट इसे समानता के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए कहती है कि यह व्यवस्था बेटियों को विवाह और अधिकार के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करती है। अध्ययन में यह भी दर्शाया गया है कि केंद्र का हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय 'विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा' भी इस अधिकार को मजबूती से स्थापित करता है। फिर भी, राज्य के भू-राजस्व कानून और केंद्र के उत्तराधिकार कानून के बीच मौजूदा विरोधाभास असमानता और विवाद को जन्म दे रहा है।

रिपोर्ट में लखनऊ जिले की बक्शी का तालाब तहसील में कराए गए सर्वे के निष्कर्ष बेहद चिंताजनक हैं। सर्वे के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला, और अधिकांश बेटियां अपने कानूनी अधिकारों से अनजान पाई गईं। शोध में सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं, जैसे कि विवाह के समय ही विवाहिता पुत्री की संपत्ति में वास्तविक हिस्सेदारी की स्थापना करना, पति के परिवार में महिलाओं को समान अधिकार देना, बेटियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाना, और पारिवारिक संपत्ति विवादों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष न्यायालयों का गठन करना।

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि सामाजिक दबाव, पारंपरिक सोच और वसीयत जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से बेटियों को योजनाबद्ध तरीके से संपत्ति से दूर रखा जा रहा है। इस संदर्भ में, अध्ययन ने सरकार से कानूनों में आवश्यक संशोधन कर बेटियों को उत्तराधिकार में वास्तविक न्याय और समान अधिकार सुनिश्चित करने की सख्त मांग की है।

Point of View

NationPress
09/03/2026

Frequently Asked Questions

क्या बेटियों को संपत्ति में अधिकार नहीं है?
हालांकि कानून बेटियों को संपत्ति में अधिकार देता है, जमीनी हकीकत में कई बेटियां इन अधिकारों से वंचित हैं।
उत्तर प्रदेश में बेटियों के अधिकारों की स्थिति क्या है?
उत्तर प्रदेश में बेटियों के लिए संपत्ति के अधिकारों में भेदभाव की स्थिति है।
केंद्र का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम क्या है?
यह अधिनियम बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करता है।
क्या सर्वे में बेटियों की स्थिति पर सवाल उठाए गए हैं?
जी हां, सर्वे में पाया गया कि लगभग 90 प्रतिशत बेटियों को संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला है।
सरकार को क्या सुझाव दिए गए हैं?
सरकार को कानूनों में सुधार कर बेटियों को समान अधिकार सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
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