क्या भारत में अल्जाइमर से लड़ने के लिए राष्ट्रीय डिमेंशिया रणनीति की आवश्यकता है?
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नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि देश में अल्जाइमर रोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए, भारत को वृद्धावस्था और मानसिक स्वास्थ्य पर एक राष्ट्रीय रणनीति की आवश्यकता है।
इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक संपादकीय के अनुसार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के विशेषज्ञों ने, हिमाचल प्रदेश के एम.एम. मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के सहयोग से, विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक ढांचे के अनुरूप एक व्यापक राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना को लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
लेखकों में से एक, डॉ. के. मदन गोपाल ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट में कहा, "भारत को अल्जाइमर को केवल एक नैदानिक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि वृद्धावस्था और मानसिक स्वास्थ्य पर एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में देखना चाहिए। प्राइमरी केयर में कोग्नेटिव हेल्थ स्क्रीनिंग को शामिल करना, दीर्घकालिक देखभाल मॉडल में निवेश करना, और केयरगिवर सपोर्ट सिस्टम का निर्माण करना आवश्यक है।"
उन्होंने कहा, "हमें समय पर कार्रवाई करनी चाहिए, समझदारी से निवेश करना चाहिए और मानवता के लिए योजना बनानी चाहिए। अल्जाइमर देखभाल को हमारी व्यापक स्वास्थ्य प्रणालियों का हिस्सा बनाना चाहिए, जिससे हर वृद्ध भारतीय के लिए सम्मान, समावेश और सहायता सुनिश्चित हो सके।"
वर्तमान में, अनुमानित 53 लाख भारतीय डिमेंशिया से प्रभावित हैं, और यह संख्या 2050 तक लगभग तीन गुना बढ़ सकते हैं, जो कि बुजुर्गों की बढ़ती जनसंख्या का परिणाम है।
विशेषज्ञों ने आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के साथ अल्जाइमर देखभाल को एकीकृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
संपादकीय में कहा गया है, "आयुष्मान आरोग्य मंदिर (विस्तारित स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र) सामुदायिक स्तर पर डिमेंशिया की जांच, परामर्श और रेफरल को एकीकृत करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करते हैं।"
विशेषज्ञों ने मेमोरी क्लीनिक और ई-संजीवनी जैसे टेलीमेडिसिन प्लेटफार्मों की क्षमता का उल्लेख किया।
उन्होंने एचपीवी टीकाकरण पायलटों से लेकर मिशन-मोड पोषण अभियानों और कोविड-19 टीकाकरण अभियान तक के बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों की सफलताओं से सीखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विशेषज्ञों ने एक 'राष्ट्रीय मनोभ्रंश रणनीति' का आह्वान किया, "जिसमें जन जागरूकता अभियानों को सक्रिय सामुदायिक भागीदारी के साथ जोड़ा जाए ताकि इसे लेकर भ्रम को कम किया जा सके।"
उन्होंने आगे कहा, "इस तरह का साझा दृष्टिकोण भारत में डिमेंशिया देखभाल के लिए एक व्यापक और समावेशी ढांचे के निर्माण में तेजी ला सकता है।"