क्या केंद्र सरकार ने भारत में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए 24 चिप डिजाइन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी?
सारांश
Key Takeaways
- केंद्र सरकार द्वारा 24 चिप डिजाइन प्रोजेक्ट्स की मंजूरी।
- डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम का महत्व।
- चिप डिजाइन में भारतीय इंजीनियरों की भूमिका।
नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार ने डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (डीएलआई) के अंतर्गत भारतीय सेमीकंडक्टर या चिप निर्माण क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए 24 नए चिप डिजाइन प्रोजेक्ट्स को स्वीकृति दी है। ये प्रोजेक्ट्स वीडियो निगरानी, ड्रोन का पता लगाने, एनर्जी मीटर, माइक्रोप्रोसेसर, सैटेलाइट संचार, ब्रॉडबैंड और आईओटी सिस्टम-ऑन-चिप्स (एसओसी) जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। रविवार को इस संबंध में एक आधिकारिक बयान जारी किया गया।
बयान में बताया गया है कि इसके अतिरिक्त, 95 कंपनियों को उद्योग स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (ईडीए) टूल्स तक पहुंच प्रदान की गई है, जिससे चिप डिजाइन स्टार्टअप्स का खर्च कम होगा और उन्हें उत्कृष्ट उपकरण उपलब्ध होंगे।
चिप डिजाइन वह प्रक्रिया है जिसमें सबसे अधिक मूल्य जोड़ा जाता है। यह आपूर्ति श्रृंखला के 50 प्रतिशत और फैबलेस सेगमेंट के माध्यम से वैश्विक सेमीकंडक्टर बिक्री में 30-35 प्रतिशत का योगदान करता है।
बयान में आगे कहा गया है कि डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (डीएलआई) के तहत योजनाएं तेजी से प्रगति कर रही हैं। अब तक इस योजना के अंतर्गत 16 टेप-आउट, 6 एएसआईसी चिप्स, 10 पेटेंट और 1,000 से अधिक इंजीनियर शामिल हो चुके हैं। साथ ही, निजी निवेश में भी तीन गुना वृद्धि हुई है।
डीएलआई स्कीम का संचालन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है और इसका बजट 76,000 करोड़ रुपए है। यह योजना सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले निर्माण के साथ-साथ चिप डिजाइन सिस्टम को भी समर्थन देती है।
डीएलआई स्कीम स्टार्टअप्स और एमएसएमई को डिजाइन से लेकर उत्पाद निर्माण तक सम्पूर्ण सहायता प्रदान करती है। इसका उद्देश्य भारत के घरेलू सेमीकंडक्टर डिजाइन उद्योग में विद्यमान कमियों को दूर करना है, जिससे भारतीय सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
इसके अलावा, चिप्स टू स्टार्टअप (सी2एस) प्रोग्राम के तहत देशभर की शिक्षण संस्थाओं में 85,000 इंजीनियर, मास्टर्स और पीएचडी स्तर के छात्र तैयार किए जा रहे हैं, जो चिप डिजाइन में विशेषज्ञता हासिल करेंगे।
बयान में उल्लेख किया गया है कि मजबूत फैबलेस क्षमता के बिना देश विदेशी तकनीक पर निर्भर रहता है। इस स्कीम के माध्यम से भारत अपने तकनीकी ज्ञान और उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकेगा, जिससे आयात में कमी आएगी और भविष्य में तकनीकी नेतृत्व प्राप्त होगा।