हिमालय संरक्षण पर पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का जोर, 2047 तक पारिस्थितिक-विकास संतुलन का लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने 15 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2047 तक भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए एक व्यापक नीतिगत ढाँचा तैयार किया जा रहा है, जो पारिस्थितिक सुरक्षा और सतत सामाजिक-आर्थिक विकास के बीच ठोस संतुलन स्थापित करे। यह बात उन्होंने 'जी.बी. पंत सोसायटी ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट' की 27वीं वार्षिक बैठक की अध्यक्षता करते हुए कही।
बैठक में उठाए गए मुख्य बिंदु
मंत्री यादव ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में स्थानीय आजीविका को सुदृढ़ करने के लिए 'एक्सेस एंड बेनिफिट-शेयरिंग' (ABS) अधिकारों और 'पीपल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर्स' (PBR) के महत्व को रेखांकित किया। उनका तर्क था कि स्थानीय समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भागीदार बनाए बिना दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुरक्षा संभव नहीं है।
बैठक के दौरान संस्थान द्वारा किए गए शोध पर आधारित चार प्रकाशन भी जारी किए गए, जो हिमालयी पर्यावरण के ज्ञान-भंडार को और समृद्ध करते हैं। ये प्रकाशन हैं — 'भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन के लिए जैव विविधता और संरक्षण के तरीके', 'गंगोत्री ग्लेशिएटेड सिस्टम', 'भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए ई-पीबीआर गवर्नेंस', और 'भारतीय हिमालयी क्षेत्र की रामसर आर्द्रभूमि'।
वन प्रशासन की समीक्षा
इससे एक दिन पहले, बुधवार 14 अक्टूबर को, यादव ने 11 क्षेत्रीय वन कार्यालयों के वैज्ञानिकों और अधिकारियों के साथ एक विस्तृत समीक्षा बैठक आयोजित की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वन संरक्षण, वन भूमि के वैकल्पिक उपयोग (डायवर्जन) की स्वीकृति, कार्य योजनाओं को मंजूरी देने और विभिन्न कानूनों के तहत निगरानी एवं मूल्यांकन में क्षेत्रीय कार्यालयों की केंद्रीय भूमिका है।
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर अपनी पोस्ट में यादव ने लिखा, 'आर्थिक आकांक्षाओं और पारिस्थितिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाकर सतत विकास के लिए वन प्रशासन को आगे बढ़ाने में 'संपूर्ण सरकार के दृष्टिकोण' पर जोर दिया गया।'
पराली प्रबंधन पर अंतर-मंत्रालयी चर्चा
13 अक्टूबर 2026 को यादव ने केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ कृषि भवन में राज्यों के कृषि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पराली प्रबंधन पर विचार-विमर्श किया। यह बैठक ऐसे समय में आई है जब उत्तर भारत में सर्दियों की शुरुआत के साथ पराली जलाने की घटनाओं से वायु प्रदूषण की समस्या फिर गंभीर होने की आशंका है।
यादव ने एक्स पर लिखा, 'हम अपने किसान भाइयों को पराली जलाने के बजाय बेहतर और टिकाऊ विकल्प उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, ताकि उनकी आय बढ़े और मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहे।' उन्होंने यह भी कहा कि कृषि मशीनों की उपलब्धता, उनके प्रभावी उपयोग और जन जागरूकता पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
आम जनता और पर्यावरण पर असर
हिमालयी क्षेत्र भारत की प्रमुख नदी प्रणालियों — गंगा, यमुना, सिंधु — का उद्गम स्थल है और देश की जल सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ रही है, जिससे लाखों लोगों की पेयजल आपूर्ति और कृषि प्रभावित हो सकती है।
रामसर आर्द्रभूमियों पर जारी शोध प्रकाशन और PBR प्रणाली का विस्तार स्थानीय समुदायों को संरक्षण का प्रत्यक्ष हितभागी बनाने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे हिमालयी राज्यों में पारिस्थितिकी-पर्यटन और जैव संसाधन-आधारित आजीविका को बढ़ावा मिल सकता है।
आगे की राह
मंत्रालय का ध्यान अब 2047 के विकसित भारत लक्ष्य के साथ हिमालयी नीति को एकीकृत करने पर है। पराली प्रबंधन से लेकर ग्लेशियर संरक्षण तक, यह बहु-आयामी दृष्टिकोण केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की माँग करता है, जो आने वाले महीनों में नीतिगत गतिविधियों का केंद्र बिंदु बनने की संभावना है।