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हिमालयी क्षेत्र बनेगा भारत की अगली आर्थिक छलांग का आधार: डॉ. जितेंद्र सिंह

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हिमालयी क्षेत्र बनेगा भारत की अगली आर्थिक छलांग का आधार: डॉ. जितेंद्र सिंह

सारांश

केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह का दावा — हिमालयी जैव संसाधन, अरोमा मिशन और फ्लोरीकल्चर मिशन मिलकर भारत के उस अगले आर्थिक चरण की नींव बन रहे हैं, जो दशकों से अनछुए पड़े पहाड़ी क्षेत्रों से उभरेगा और विकसित भारत 2047 की परिकल्पना को ज़मीन पर उतारेगा।

मुख्य बातें

जितेंद्र सिंह ने 28 मई 2025 को पालमपुर के सीएसआईआर-आईएचबीटी में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर हिमालयी क्षेत्र को भारत के अगले आर्थिक विकास का केंद्र बताया।
अरोमा मिशन और फ्लोरीकल्चर मिशन के ज़रिए हिमालयी राज्यों में किसानों, महिलाओं, युवाओं और स्टार्टअप्स के लिए आजीविका के अवसर बन रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश सुगंधित जंगली गेंदे के तेल का देश का अग्रणी उत्पादक बनकर उभरा है।
सीएसआईआर-आईएचबीटी का ट्यूलिप फूल अयोध्या प्राण प्रतिष्ठा के दौरान PM मोदी की भेंट का हिस्सा था।
संस्थान का कार्यक्षेत्र फाइटोफार्मास्यूटिकल्स , किण्वन प्रौद्योगिकी , पोषण विज्ञान और कृषि-जैव प्रौद्योगिकी सहित कई क्षेत्रों में फैला है।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 28 मई 2025 को कहा कि भारत के आर्थिक विकास का अगला चरण उन संसाधनों और भूभागों से निकलेगा जो दशकों तक उपेक्षित रहे — और इसका केंद्र हिमालयी क्षेत्र होगा। उन्होंने यह बात पालमपुर स्थित सीएसआईआर-हिमालयन जैव संसाधन प्रौद्योगिकी संस्थान (सीएसआईआर-आईएचबीटी) में आयोजित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही।

हिमालयी अर्थव्यवस्था और विकसित भारत 2047

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि जैसे-जैसे देश विकसित भारत 2047 की परिकल्पना की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हिमालयी अर्थव्यवस्था भारत के भावी आर्थिक विकास में एक प्रमुख योगदानकर्ता बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह क्षेत्र अब केवल पर्यटन या कृषि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जैव प्रौद्योगिकी, फाइटोफार्मास्यूटिकल्स और सुगंध उद्योग में भी अपनी पहचान बनाएगा।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अरोमा मिशन और फ्लोरीकल्चर मिशन जैसी पहलों के माध्यम से हिमालयी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में वैज्ञानिक हस्तक्षेप को अभूतपूर्व गति मिली है। इन मिशनों से किसानों, महिलाओं, युवाओं, स्टार्टअप्स और उद्यमियों के लिए आजीविका के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।

सीएसआईआर-आईएचबीटी की भूमिका और उपलब्धियाँ

मंत्री ने सीएसआईआर-आईएचबीटी को हिमालयी जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान और वाणिज्यिक नवाचार के कई आयामों को एकीकृत करने वाली एक अनूठी वैज्ञानिक संस्था बताया। उन्होंने कहा कि यह संस्थान हिमालयी जैव संसाधनों के सतत उपयोग के लिए देश के अग्रणी केंद्रों में से एक के रूप में उभरा है।

संस्थान का कार्य कृषि प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, पर्यावरण विज्ञान, पोषण प्रौद्योगिकी, फाइटोफार्मास्यूटिकल्स और किण्वन प्रौद्योगिकी सहित विविध क्षेत्रों में फैला हुआ है। यह संस्थान हिमालयी जैव संसाधनों को चिकित्सा, स्वास्थ्य, पोषण, सौंदर्य प्रसाधन, पुष्पकृषि और कृषि-जैव प्रौद्योगिकी से जुड़े व्यावसायिक उत्पादों और प्रौद्योगिकियों में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

डॉ. सिंह ने यह भी उल्लेख किया कि इसी संस्थान का ट्यूलिप फूल अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा की प्रार्थना के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अर्पित की गई भेंट का हिस्सा था — जो संस्थान की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर महत्ता को रेखांकित करता है।

अरोमा मिशन की सफलता

अरोमा मिशन की सफलता का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि हिमाचल प्रदेश सुगंधित जंगली गेंदे के तेल के देश के अग्रणी उत्पादक के रूप में उभरा है। इस मिशन से स्थानीय किसानों और उद्यमियों के लिए उल्लेखनीय आय के स्रोत बने हैं। यह ऐसे समय में आया है जब पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और रोज़गार सृजन की माँग लगातार बढ़ रही है।

वैज्ञानिक संस्थान बने बदलाव के वाहक

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वैज्ञानिक संस्थान अब ग्रामीण विकास और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ विज्ञान, नवाचार और उद्यमिता को एकीकृत करते हुए जमीनी स्तर पर परिवर्तन के प्रमुख वाहक बन रहे हैं। उन्होंने संस्थान की विभिन्न सुविधाओं का दौरा किया और सीएसआईआर-आईएचबीटी के हिमालयी प्रौद्योगिकी मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों, नवोन्मेषकों, किसानों, स्टार्टअप्स और उद्यमियों के साथ सीधी बातचीत की। आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र से और अधिक वैज्ञानिक-वाणिज्यिक साझेदारियाँ उभरने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह है कि अरोमा मिशन जैसी पहलों के लाभ कितने किसानों तक वास्तव में पहुँचे हैं और उनकी आय में मापनीय वृद्धि हुई है या नहीं। हिमालयी राज्यों से पलायन की दर अभी भी चिंताजनक है, जो बताती है कि वैज्ञानिक हस्तक्षेप अभी तक पर्याप्त रोज़गार धारण-क्षमता नहीं बना पाए हैं। सीएसआईआर-आईएचबीटी की उपलब्धियाँ सराहनीय हैं, परंतु 'विकसित भारत 2047' की परिकल्पना को साकार करने के लिए संस्थागत नवाचार और बाज़ार-संपर्क के बीच की खाई को पाटना अभी बाकी है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. जितेंद्र सिंह ने हिमालयी क्षेत्र को भारत के आर्थिक विकास का केंद्र क्यों बताया?
डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में जैव संसाधन, सुगंध उद्योग और पुष्पकृषि जैसे क्षेत्र दशकों से अनछुए रहे हैं और अब वैज्ञानिक हस्तक्षेप से इनका व्यावसायिक दोहन संभव हो रहा है। यह क्षेत्र विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में प्रमुख योगदानकर्ता बन सकता है।
सीएसआईआर-आईएचबीटी पालमपुर क्या काम करता है?
सीएसआईआर-आईएचबीटी पालमपुर हिमालयी जैव संसाधनों को चिकित्सा, स्वास्थ्य, पोषण, सौंदर्य प्रसाधन, पुष्पकृषि और कृषि-जैव प्रौद्योगिकी से जुड़े व्यावसायिक उत्पादों में रूपांतरित करता है। इसका कार्यक्षेत्र फाइटोफार्मास्यूटिकल्स, किण्वन प्रौद्योगिकी और पर्यावरण विज्ञान तक भी फैला है।
अरोमा मिशन से हिमाचल प्रदेश के किसानों को क्या फायदा हुआ?
अरोमा मिशन के तहत हिमाचल प्रदेश सुगंधित जंगली गेंदे के तेल का देश का अग्रणी उत्पादक बनकर उभरा है। इससे स्थानीय किसानों और उद्यमियों के लिए उल्लेखनीय आय के नए स्रोत बने हैं।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस कार्यक्रम में और क्या हुआ?
डॉ. जितेंद्र सिंह ने सीएसआईआर-आईएचबीटी की विभिन्न सुविधाओं का दौरा किया और हिमालयी प्रौद्योगिकी मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों, नवोन्मेषकों, किसानों, स्टार्टअप्स और उद्यमियों के साथ सीधी बातचीत की। उन्होंने संस्थान को हिमालयी जैव विविधता और वाणिज्यिक नवाचार को एकीकृत करने वाली अनूठी संस्था बताया।
सीएसआईआर-आईएचबीटी के ट्यूलिप फूल का अयोध्या से क्या संबंध है?
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि सीएसआईआर-आईएचबीटी का ट्यूलिप फूल अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा की प्रार्थना के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अर्पित की गई भेंट का हिस्सा था, जो संस्थान की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर प्रासंगिकता को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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