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राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025: बिहार की पुष्पा प्रसाद और MP के शैलेंद्र प्रताप सिंह सम्मानित, 5 सितंबर को राष्ट्रपति मुर्मु करेंगी पुरस्कृत

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राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025: बिहार की पुष्पा प्रसाद और MP के शैलेंद्र प्रताप सिंह सम्मानित, 5 सितंबर को राष्ट्रपति मुर्मु करेंगी पुरस्कृत

सारांश

बिहार के कुचायकोट में जहाँ शिक्षा की लौ तक नहीं थी, वहाँ ब्लैकबोर्ड बनाकर पढ़ाने वाली पुष्पा प्रसाद और MP के सीधी में ₹5 लाख जन-सहयोग से स्कूल बदलने वाले शैलेंद्र प्रताप सिंह — दोनों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार। 5 सितंबर को राष्ट्रपति मुर्मु करेंगी सम्मानित।

मुख्य बातें

पुष्पा प्रसाद (बिहार, गोपालगंज) और शैलेंद्र प्रताप सिंह (मध्य प्रदेश, सीधी) को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 के लिए चयनित किया गया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु दोनों को 5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस पर सम्मानित करेंगी।
पुष्पा प्रसाद ने वंचित बस्तियों में ब्लैकबोर्ड निर्माण कर उन परिवारों तक शिक्षा पहुँचाई जहाँ पीढ़ियों से पढ़ाई नहीं हुई थी।
शैलेंद्र प्रताप सिंह ने जन-सहयोग से ₹5 लाख एकत्र कर स्कूल का जीर्णोद्धार कराया; नामांकन 69 से बढ़कर 202 हुआ, जिनमें 107 बालिकाएँ ।
शैलेंद्र के विद्यालय से बच्चों का चयन सैनिक स्कूल और नवोदय विद्यालय में भी हुआ।

बिहार के गोपालगंज जिले के कुचायकोट की शिक्षिका पुष्पा प्रसाद और मध्य प्रदेश के सीधी जिले के शिक्षक शैलेंद्र प्रताप सिंह को प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु इन्हें 5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर सम्मानित करेंगी। अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की लौ जलाने वाले इन दोनों शिक्षकों की कहानी समर्पण और संघर्ष की मिसाल है।

पुष्पा प्रसाद: जहाँ शिक्षा की लौ नहीं थी, वहाँ रोशनी की

राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, कुचायकोट में कार्यरत पुष्पा प्रसाद ने उन परिवारों तक शिक्षा पहुँचाई जहाँ पीढ़ियों से पढ़ाई का कोई चलन नहीं था। विद्यालय के प्रधानाध्यापक वाल्मीकि प्रसाद ने कहा, 'इन्होंने विद्यालय के लिए एक शिक्षिका के रूप में नहीं बल्कि बच्चों के अभिभावक और माँ की तरह पठन-पाठन, ड्रेस और उनकी गतिविधियों में पूर्ण रूप से योगदान दिया है।'

उन्होंने आगे बताया कि स्कूल के अधिकांश बच्चे अति पिछड़े क्षेत्र से आते हैं। आर्थिक तंगी के चलते बच्चे कॉपी-पेंसिल तक नहीं खरीद पाते थे, इसलिए पुष्पा प्रसाद ने वंचित बस्तियों में जाकर ब्लैकबोर्ड का निर्माण कराया, जिससे बच्चे वहीं पढ़ सकें। इस प्रयास में बच्चों की माताओं और अभिभावकों ने भी भरपूर सहयोग दिया।

पुरस्कार की सूचना मिलने पर पुष्पा प्रसाद ने कहा, 'सच बताऊं तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। जब लोगों की बधाइयों का सिलसिला शुरू हुआ, तब मुझे विश्वास हुआ कि ये सम्मान मुझे ही मिला है। सपने साकार हुए, एक स्वर्णिम पल है।' उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति से साक्षात मिलने का सपना उन्होंने खुली आँखों से देखा था।

ग्रामीण चुनौतियों से जूझकर बनाई राह

पुष्पा प्रसाद ने स्वीकार किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाने की राह आसान नहीं थी। उन्होंने कहा, 'मैंने असफलताओं को साथ लेकर ही सफलता का मार्ग तय किया है।' उनकी रणनीति अनूठी थी — बच्चों से पहले उनके अभिभावकों को शिक्षा का महत्व समझाना और उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करना। इस सामुदायिक जुड़ाव ने उन्हें उल्लेखनीय सफलता दिलाई।

शैलेंद्र प्रताप सिंह: ₹5 लाख के जन-सहयोग से बदली स्कूल की तस्वीर

मध्य प्रदेश के सीधी जिले के शिक्षक शैलेंद्र प्रताप सिंह ने जब अपने विद्यालय में 13 अगस्त को कार्यभार संभाला, तब छात्रों की कुल संख्या मात्र 69 थी। 15 अगस्त को ध्वजारोहण के अवसर पर उन्होंने अभिभावकों से संवाद किया और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का संकल्प लिया।

इस संकल्प का परिणाम यह रहा कि जन-सहयोग के माध्यम से लगभग ₹5 लाख एकत्र किए गए और विद्यालय भवन का जीर्णोद्धार कराया गया। आज उसी विद्यालय में छात्रों का नामांकन 202 हो चुका है, जिनमें 107 बालिकाएँ शामिल हैं — यानी छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक है। इतना ही नहीं, उनके विद्यालय से बच्चों का चयन सैनिक स्कूल और नवोदय विद्यालय में भी हुआ है।

शैलेंद्र प्रताप सिंह ने कहा, 'ये केवल मेरा नहीं, पूरे सीधी जिले के शिक्षकों का सम्मान है। साथ ही यहाँ के बच्चों और अभिभावकों का भी सम्मान है।'

विद्यालय परिवार में उत्साह का माहौल

पुष्पा प्रसाद के चयन से राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, कुचायकोट में खुशी की लहर है। प्रधानाध्यापक वाल्मीकि प्रसाद ने कहा कि विद्यालय परिवार के सभी शिक्षक और छात्रों के अभिभावक 'बहुत ही गौरवान्वित' महसूस कर रहे हैं। यह सम्मान उस क्षेत्र के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहाँ अनेक परिवारों में पहली बार शिक्षा की अलख जगी है।

आगे क्या

5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु देशभर के चयनित शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से नवाज़ेंगी। पुष्पा प्रसाद और शैलेंद्र प्रताप सिंह का यह सफर उन अनगिनत शिक्षकों के लिए प्रेरणा है जो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में चुपचाप शिक्षा की नींव रख रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक सामुदायिक बैठक से। लेकिन यह सवाल भी उठता है कि ऐसे शिक्षकों को पुरस्कार तो मिलता है, पर उनके विद्यालयों को कॉपी-पेंसिल जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए शिक्षक की जेब पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रेरणा का उत्सव है, लेकिन जब तक ग्रामीण विद्यालयों की संरचनात्मक खामियाँ दूर नहीं होतीं, ये पुरस्कार व्यवस्था की विफलता को ढकने का माध्यम भी बन सकते हैं।
RashtraPress
22 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 के लिए किन्हें चुना गया है?
बिहार के गोपालगंज जिले के कुचायकोट की शिक्षिका पुष्पा प्रसाद और मध्य प्रदेश के सीधी जिले के शिक्षक शैलेंद्र प्रताप सिंह को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 के लिए चयनित किया गया है। दोनों को 5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सम्मानित करेंगी।
पुष्पा प्रसाद को यह पुरस्कार क्यों मिला?
पुष्पा प्रसाद ने बिहार के अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र में उन परिवारों तक शिक्षा पहुँचाई जहाँ पीढ़ियों से पढ़ाई का कोई चलन नहीं था। उन्होंने वंचित बस्तियों में ब्लैकबोर्ड बनाए, अभिभावकों को जागरूक किया और बच्चों के लिए माँ जैसी भूमिका निभाई।
शैलेंद्र प्रताप सिंह ने अपने स्कूल में क्या बदलाव लाए?
शैलेंद्र प्रताप सिंह ने सीधी के अपने विद्यालय में जन-सहयोग से ₹5 लाख एकत्र कर स्कूल भवन का जीर्णोद्धार कराया। उनके प्रयासों से छात्र नामांकन 69 से बढ़कर 202 हो गया, जिनमें 107 बालिकाएँ शामिल हैं, और कई बच्चों का चयन सैनिक स्कूल व नवोदय विद्यालय में भी हुआ।
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार समारोह कब और कहाँ होगा?
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार समारोह 5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित होगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु देशभर के चयनित शिक्षकों को इस अवसर पर सम्मानित करेंगी।
पुष्पा प्रसाद ने पुरस्कार मिलने पर क्या कहा?
पुष्पा प्रसाद ने कहा कि शुरू में उन्हें विश्वास नहीं हुआ और जब बधाइयों का सिलसिला शुरू हुआ तब यकीन आया। उन्होंने इसे 'सपने साकार होने का स्वर्णिम पल' बताया और कहा कि राष्ट्रपति से साक्षात मिलना उनका पुराना सपना था।
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