क्या कैप्टन सलारिया ने कांगो की लड़ाई में 40 विद्रोहियों को ढेर किया?
सारांश
Key Takeaways
- वीरता: कैप्टन सलारिया ने अद्वितीय साहस का प्रदर्शन किया।
- बलिदान: उन्होंने अपने जीवन की परवाह किए बिना देश की रक्षा की।
- प्रेरणा: उनकी कहानी हर भारतीय के लिए प्रेरणा स्रोत है।
- शांति: उन्होंने यूएन के तहत शांति बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- सैन्य शिक्षा: शानदार सैन्य शिक्षा ने उन्हें तैयार किया।
नई दिल्ली, 28 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। 1960 का साल था, जब बेल्जियम से मुक्त हुआ अफ्रीकी राष्ट्र कांगो गृहयुद्ध की चपेट में था। इसी समय की आवश्यकता थी संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की शांति सेना की। कांगो में यूएन की शांति सेना की उपस्थिति का अर्थ था भारत का सक्रिय भागीदारी, जिसके चलते तीन हजार भारतीय सैनिकों को कांगो में शांति बहाली के मिशन पर भेजा गया। इनमें से एक थे कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया.
कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया ने विदेश में जाकर ऐसा शौर्य और साहस
उनका जन्म 29 नवंबर 1935 को शकरगढ़ (जो पहले यूनाइटेड पंजाब का हिस्सा था) के पास स्थित जमवाल गांव में हुआ। बाद में उनका परिवार पंजाब के गुरदासपुर जिले के जांगल गांव में बस गया। उनकी वीरता के किस्से सुनते-सुनते वह बड़े हुए, क्योंकि उनके पिता मुंशीराम ब्रिटिश भारतीय सेना के सदस्य थे। उनका सैन्य सफर मिलिट्री एजुकेशन से शुरू हुआ.
उन्होंने 1946 में बैंगलोर के किंग जॉर्ज रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज में अपनी पढ़ाई और मिलिट्री ट्रेनिंग शुरू की, और बाद में जालंधर के किंग जॉर्ज रॉयल मिलिट्री कॉलेज (अब राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल चैल, हिमाचल प्रदेश) चले गए। इन वर्षों ने उनके चरित्र को बनाया और उन्हें आगे की चुनौतियों के लिए तैयार किया.
इसके बाद, वे खड़कवासला में नेशनल डिफेंस एकेडमी के 9वें बैच में शामिल हुए और फिर इंडियन मिलिट्री एकेडमी में गए। 1957 में, उन्हें 1 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला, जो एक इन्फेंट्री रेजिमेंट थी जो अपने बहादुर सैनिकों और युद्ध के कारनामों के लिए मशहूर थी.
जुलाई 1960 से जून 1964 तक कांगो में यूएन का ऑपरेशन चला, जिसमें कैप्टन सलारिया को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका मिला। बेल्जियम की सेना के वापस लौटने के बाद कांगो में स्थिति बिगड़ चुकी थी, जहां विद्रोही गुटों ने सरकार के खिलाफ हमले तेज कर दिए थे.
मार्च 1961 में, भारत ने 99 इन्फैंट्री ब्रिगेड को ऑपरेशन के लिए भेजा और कैप्टन सलारिया अपनी यूनिट, 3/1 गोरखा राइफल्स के साथ इस टुकड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा बने.
नवंबर 1961 में, सिक्योरिटी काउंसिल ने कांगो में कटंगा के सैनिकों की दुश्मनी पर रोक लगाने का निर्णय लिया। इससे कटंगा के अलगाववादी नेता शोम्बे बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने यूएन के खिलाफ अपना अभियान तेज कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप यूएन के लोगों के खिलाफ हिंसा बढ़ गई.
5 दिसंबर 1961 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया, जब कैप्टन सलारिया को एक चुनौतीपूर्ण मिशन मिला.
उनका पहला टास्क कटंगा प्रांत में एलिजाबेथ विले एयरफील्ड के पास विद्रोहियों द्वारा लगाए गए रोडब्लॉक को हटाना था। 16 सैनिकोंकैप्टन सलारिया ने दुश्मनों का सामना किया. विद्रोहियों की टुकड़ी, जो भारी हथियारों से लैस थी, एक बड़ा खतरा बन गई थी.
कैप्टन सलारिया ने हिम्मत न हारते हुए विद्रोहियों का सीधा सामना करने का निर्णय लिया। इसी की बदौलत विद्रोहियों के रोडब्लॉक को तोड़ दिया गया और गोरखाओं ने वहां यूएन का रोडब्लॉक स्थापित किया.
जब कैप्टन सलारिया ने अपने गोरखा कंपनी के साथ मिलकर रोडब्लॉक को मजबूत करने का प्रयास किया, तो उन्हें पुराने एयरफील्ड क्षेत्र में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा. दुश्मनों ने उनकी सेना पर भारी ऑटोमैटिक और छोटे हथियारों से हमला किया. लेकिन कैप्टन सलारिया उनकी ताकत और फायर पावर से नहीं डरे.
गोरखाओं ने दुश्मनों पर संगीनों, खुखरी और हैंड ग्रेनेड से हमला किया। गोरखाओं के नारे, 'जय महाकाली, आयो गोरखाली' के साथ जवानों ने जवाब दिया. अपनी रेजिमेंट के नारे 'काफर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो' (कायर बनने से मरना बेहतर है) को अपनाते हुए, उन्होंने अद्वितीय साहस के साथ अपने जवानों का नेतृत्व किया.
जबरदस्त लड़ाई में कैप्टन सलारिया और उनके जवानों ने 40 दुश्मनों को मार गिराया और दो बख्तरबंद गाड़ियों को नष्ट कर दिया। इससे दुश्मन का मनोबल पूरी तरह टूट गया. इस वीरता का प्रभाव यह था कि विद्रोही, कैप्टन सलारिया और उनकी टीम के सामने आने में असफल रहे.
हालांकि, इस लड़ाई में कैप्टन सलारिया दुश्मन के ऑटोमैटिक फायर से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने चोट को नजरअंदाज करते हुए लड़ाई जारी रखी. अंततः उन्हें वीरगति प्राप्त हुई.
राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कैप्टन सलारिया को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया.