छत्रपति शिवाजी: वीरता और दूरदर्शिता के प्रतीक, मराठा साम्राज्य के संस्थापक
सारांश
Key Takeaways
- छत्रपति शिवाजी महाराज: सशक्त शासक और कुशल रणनीतिकार।
- हिंदवी स्वराज्य: उनकी प्रमुख उपलब्धि।
- सैन्य में छापामार युद्ध नीति का विकास।
- अष्टप्रधान परिषद: प्रशासनिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा।
- धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक न्याय का समर्थन।
नई दिल्ली, 2 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। हर वर्ष 3 अप्रैल को छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती का आयोजन किया जाता है। यह दिन उस अदम्य साहस, दूरदर्शिता और स्वाभिमान का प्रतीक है जिसने भारत की भूमि पर हिंदवी स्वराज्य का सपना साकार किया। मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज उन महान राजाओं में गिने जाते हैं, जिनकी युद्ध प्रणालियाँ आज भी अनुसरण की जाती हैं और जिनकी वीरता सदियों बाद भी प्रेरणादायक बनी हुई है।
शिवाजी महाराज की जन्मतिथि को लेकर अनेक मत हैं, लेकिन सामान्यतः उनका जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी किले में माना जाता है। वे शाहजी भोसले और माता जीजाबाई के पुत्र थे। उनकी माता जीजाबाई जाधवराव कुल की एक असाधारण प्रतिभाशाली महिला थीं। शिवाजी के व्यक्तित्व और चरित्र पर उनका गहरा प्रभाव रहा। जीजाबाई ने उन्हें रामायण और महाभारत की कथाओं के माध्यम से न्याय, धर्म और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया। उनका बचपन पूना में माता और कुशल ब्राह्मण दादाजी कोंडा-देव के संरक्षण में बीता, जिन्होंने उन्हें एक सक्षम सैनिक और प्रशासक बनने की दिशा में मार्गदर्शन किया। गुरु रामदास का आध्यात्मिक प्रभाव भी उनके भीतर मातृभूमि के प्रति गर्व और समर्पण की भावना को प्रबल करता है।
बचपन से ही बुद्धिमान और वीर शिवाजी ने युवावस्था में स्वामिभक्त साथियों का समूह बनाया और 16 वर्षहिंदवी स्वराज्य की स्थापना का संकल्प लिया। इसके बाद उन्होंने मुगलों, आदिलशाही, कुतुबशाही और अन्य शक्तियों से संघर्ष करते हुए एक स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की नींव रखी।
शिवाजी महाराज की सैन्य रणनीतियाँ उनकी सबसे बड़ी ताकत थीं। उन्होंने पारंपरिक युद्ध पद्धतियों से हटकर छापामार युद्ध नीति अपनाई। इस नीति के तहत वे अचानक हमला करते और सुरक्षित स्थान पर लौट जाते थे। 1664 में सूरत पर आक्रमण कर उन्होंने मुगलों की आर्थिक शक्ति को कमजोर किया। औरंगजेब ने उन्हें नियंत्रित करने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन शिवाजी अपनी चतुराई और रणनीति से हर बार बच निकलते थे। 1666 में आगरा में बंदी बनाए जाने के बाद भी उन्होंने एक अद्भुत योजना बनाकर वहां से पलायन किया।
दक्षिण में उनकी बढ़ती शक्ति से चिंतित होकर औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खां को दक्कन का सूबेदार बनाकर भेजा। शाइस्ता खां ने पूना सहित कई क्षेत्रों में अत्याचार किए और मावल में लूटपाट मचाई। लेकिन एक रात शिवाजी ने अपने मावलों के साथ उस पर अचानक हमला किया। इस हमले में शाइस्ता खां किसी तरह बच निकला, लेकिन उसकी कई उंगलियां कट गईं, जबकि उसके पुत्र अबुल फतह सहित अनेक सैनिक मारे गए। इस घटना के बाद शिवाजी की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ गई और औरंगजेब को शाइस्ता खाँ को बंगाल भेजना पड़ा।
शिवाजी महाराज ने केवल युद्ध नहीं लड़ा, बल्कि एक सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था भी स्थापित की। 1674 में रायगढ़ किले में उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ और वे छत्रपति बने। उन्होंने शासन संचालन के लिए अष्टप्रधान परिषद का गठन किया, जिसमें पेशवा, अमात्य, मंत्री, सचिव, सुमन्त, सेनापति, पण्डितराव और न्यायाधीश जैसे पद शामिल थे। कर प्रणाली में सुधार कर किसानों पर अन्यायपूर्ण कर हटाए गए और न्याय व्यवस्था को मजबूत किया गया। वे निरंकुश शासक अवश्य थे, लेकिन उनकी प्रशासनिक दक्षता और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व उन्हें एक आदर्श शासक बनाता है।
समुद्री सुरक्षा के महत्व को समझते हुए शिवाजी महाराज ने एक सशक्त नौसेना की स्थापना की और समुद्री किलों का निर्माण कराया, जिससे विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा सुनिश्चित की जा सके। उनके शासन में धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक न्याय को विशेष महत्व दिया गया। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे और जाति-पाति से ऊपर उठकर सभी को समान अवसर प्रदान करते थे। उनके राज्य में सभी वर्गों को सुरक्षा और न्याय मिला। शिवाजी का व्यक्तित्व केवल एक योद्धा तक सीमित नहीं था। वे एक दूरदर्शी, कुशल कूटनीतिज्ञ और प्रबुद्ध सम्राट भी थे।
शुक्राचार्य और कौटिल्य के सिद्धांतों को अपनाते हुए कई बार उन्होंने कूटनीति का सहारा लिया। उनके जीवन में माता-पिता के संस्कार, गुरु का मार्गदर्शन और अपने युग की परिस्थितियों की गहरी समझ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
1680 में विष दिए जाने के बाद 3 अप्रैल को उनका निधन हो गया। उस समय उनके उत्तराधिकारी उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी बने। शिवाजी के दूसरे पुत्र का नाम राजाराम था। उनके जाने के बाद भी उनकी वीरता, स्वाभिमान और स्वराज्य की भावना अमर हो गई।
छत्रपति शिवाजी महाराज के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वे कहते थे, 'सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता, फिर परमेश्वर।' उनका यह विश्वास कि 'जब हौसले बुलंद हों, तो पहाड़ भी एक मिट्टी का ढेर लगता है' आज भी हर संघर्षरत व्यक्ति को नई ऊर्जा देता है। स्वतंत्रता को उन्होंने एक ऐसा वरदान माना, जिसका अधिकारी हर व्यक्ति है।