क्या साल 2026 में चिकित्सा विज्ञान में नई संभावनाएं देखने को मिलेंगी?
Key Takeaways
- चिकित्सा विज्ञान में कैंसर के लिए नई दवाओं का विकास तेजी से हो रहा है।
- एमआरएनए तकनीक कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग मेडिकल डायग्नोसिस में बढ़ रहा है।
- भारत किफायती दवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
- 2026 में मोटापे की दवा सस्ती होने की संभावना है।
नई दिल्ली, 1 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्ष 2026 तक चिकित्सा विज्ञान एक ऐसे चरण में प्रवेश कर चुका है जहां उपचार केवल प्रयोगशालाओं की दीवारों तक सीमित नहीं रह गया है। जीन, डेटा और तकनीक के संगम से नई संभावनाएं उत्पन्न हो रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में महामारी, कैंसर और पुरानी बीमारियों ने वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों की परीक्षा ली, जिसके बाद कई देशों ने मेडिकल रिसर्च को प्राथमिकता दी। इसका प्रभाव 2026 में भी नजर आएगा।
कैंसर उपचार के क्षेत्र में सबसे तेजी से प्रगति हो रही है। अमेरिका इस दौड़ में सबसे आगे है। 2024 और 2025 में अमेरिकी एफडीए ने कई सीएआर-टी (काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर-टी) सेल थेरेपी और लक्षित दवाओं को मंजूरी दी, जिनका विस्तार 2026 में अपेक्षित है। विशेष रूप से केआरएएस जीन को लक्षित करने वाली दवाएं, जिन पर पहले काम असंभव माना जाता था, अब अंतिम नैदानिक चरणों में हैं। ये दवाएं मुख्यतः अमेरिका और जर्मनी की फार्मा कंपनियों द्वारा विकसित की गई हैं और फेफड़े व कोलोरेक्टल कैंसर के इलाज में नई उम्मीद जगा रही हैं।
'एमआरएनए' तकनीक दूसरा बड़ा क्षेत्र है, जहां चिकित्सा विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव की संभावना है। 2020 में कोविड वैक्सीन के माध्यम से चर्चा में आई यह तकनीक अब कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के इलाज की दिशा में बढ़ रही है। जर्मनी की बायोटेक कंपनियां 2024 से एमआरएनए आधारित व्यक्तिगत कैंसर वैक्सीन पर परीक्षण कर रही हैं, जिनके 2026 तक प्रारंभिक परिणाम सामने आने की उम्मीद है। अमेरिका और जापान भी इस तकनीक का उपयोग कैंसर की पुनरावृत्ति रोकने और कुछ ऑटोइम्यून रोगों के इलाज में कर रहे हैं।
रूस ने 'एंटरोमिक्स' नामक 'एमआरएनए-आधारित कैंसर' वैक्सीन विकसित करने का दावा 2025 में किया था। यह कोलन कैंसर जैसे कुछ कैंसर के लिए है, और सितंबर 2025 के आसपास क्लिनिकल ट्रायल्स के बाद 2026 तक लॉन्च करने की योजना है। इसे रूसी नागरिकों को मुफ्त में उपलब्ध कराने का वादा किया गया था, लेकिन यह एक व्यक्तिगत और लक्षित इलाज है जो इम्यून सिस्टम को कैंसर कोशिकाओं पर हमला करना सिखाता है; वैश्विक चिकित्सा समुदाय इसकी प्रतीक्षा कर रहा है।
तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल मेडिसिन' का है। 2023 के बाद से अमेरिका, ब्रिटेन और चीन में एआई-आधारित डायग्नोसिस टूल्स को अस्पतालों में अपनाया गया है। 2025–2026 में इनका उपयोग यह तय करने में होगा कि किस मरीज पर कौन-सी दवा अधिक प्रभावी होगी। चीन विशेष रूप से एआई-ड्रिवन रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी सॉफ्टवेयर में आगे बढ़ा है, जो कैंसर और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की पहचान को तेज और सटीक बना रहे हैं।
'लिक्विड बायोप्सी' भी चिकित्सा विज्ञान का उभरता क्षेत्र है। 2024 के बाद अमेरिका और दक्षिण कोरिया में ऐसे रक्त-आधारित परीक्षण विकसित हुए हैं, जो बिना सर्जरी के कैंसर की पहचान और निगरानी में मदद करते हैं। 2026 तक इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की संभावना है, विशेषकर उन देशों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं।
दवाओं के विकास में भारत की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। भारत 2023 के बाद से बायोसिमिलर और किफायती कैंसर दवाओं का बड़ा केंद्र बन चुका है। भारतीय फार्मा कंपनियां अमेरिका और यूरोप में विकसित महंगी दवाओं के किफायती विकल्प तैयार कर रही हैं, जिससे 2026 तक विकासशील देशों में इलाज की पहुंच बढ़ने की संभावना है।
जापान और स्विट्जरलैंड न्यूरोलॉजिकल और दुर्लभ रोगों की दवाओं में अग्रणी बने हुए हैं। 2024–2025 में अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी बीमारियों पर केंद्रित नई दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल शुरू हुए, जिनके नतीजे 2026 के बाद सामने आने की संभावना है।
2026 में मोटापे की दवा सस्ती हो जाएगी। डब्ल्यूएचओ के अनुसार ग्लैप-1 थेरेपी की उत्पादन क्षमता अधिकतम 10 करोड़ है। दुनिया भर में जितने लोग मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं, उनके मुकाबले यह संख्या केवल 10 प्रतिशत है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार वर्तमान में वजन कम करने वाली थेरेपी यानी 'ग्लैप-1 थेरेपी' संस्थान की नई गाइडलाइन में विभिन्न देशों और फार्मा कंपनियों से अपील की गई है कि वे स्वैच्छिक लाइसेंसिंग जैसी रणनीतियों से इन दवाओं की पहुंच बढ़ाएं। लाइसेंसिंग से कोई भी दवा कंपनी दूसरों को अपना पेटेंट दे सकती है, जिससे दवा नॉन-ब्रांडेड संस्करण में बनाने की अनुमति मिल जाएगी। नोवो नॉर्डिस्क की एक महत्वपूर्ण दवा का पेटेंट कई देशों में 2026 में समाप्त हो रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत, कनाडा, चीन, और तुर्की जैसे देशों में जल्द ही इसके सस्ते जेनेरिक संस्करण बनाकर बेचे जा सकेंगे। इसलिए मोटापे की सस्ती दवाओं को लेकर भी संभावनाएं बढ़ गई हैं।
कुल मिलाकर, चिकित्सा विज्ञान में सबसे अधिक प्रगति की संभावना कैंसर, जीन-आधारित थेरेपी, एमआरएनए तकनीक और एआई-सपोर्टेड मेडिसिन में देखने को मिल रही है। अमेरिका, जर्मनी, चीन, जापान और भारत जैसे देश अपनी-अपनी विशेषज्ञता के साथ इस बदलाव का नेतृत्व कर रहे हैं। 2026 को इसीलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह वह समय है जब कई वर्षों की रिसर्च प्रयोगशालाओं से निकलकर आम मरीजों तक पहुंचने की कगार पर है।