8 अक्टूबर 2026
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जलवायु परिवर्तन: आजीविका, लैंगिक न्याय और सत्ता का संकट — विशेषज्ञों ने नई दिल्ली में उठाई आवाज़

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जलवायु परिवर्तन: आजीविका, लैंगिक न्याय और सत्ता का संकट — विशेषज्ञों ने नई दिल्ली में उठाई आवाज़

सारांश

जलवायु परिवर्तन सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं — यह महिलाओं की आजीविका, भूमि और सत्ता का संकट भी है। नई दिल्ली में CRF की पुस्तक-चर्चा में विशेषज्ञों ने माँग की कि जेंडर दृष्टिकोण को जलवायु नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया जाए, न कि महज एक पूरक विषय।

मुख्य बातें

चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) ने 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में 'जेंडरिंग क्लाइमेट फ्यूचर्स' पुस्तक का विमोचन किया।
पुस्तक कल्याणी शुक्ला और सैंड्रा कुरियन द्वारा संपादित है; दक्षिण एशिया और भारत पर केंद्रित।
CRF अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने कहा — जलवायु परिवर्तन का प्रभाव महिलाओं पर अनुपातहीन रूप से अधिक; भूमि स्वामित्व ऋण और निवेश तक पहुँच की कुंजी।
विशेषज्ञों ने जेंडर को जलवायु नीति का केंद्रीय तत्व बनाने और जेंडर-आधारित डेटा बढ़ाने की माँग की।
संस्थागत बाधाएँ और विभागों के बीच समन्वय की कमी प्रमुख चुनौती के रूप में चिह्नित।
पैनल में आरती आहूजा (पूर्व श्रम सचिव), डॉ.
मिनी गोविंदन (TERI), डॉ.
अदिति कपूर सहित कई विशेषज्ञ शामिल।

जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय संकट मानना अधूरा है — यह आजीविका, संसाधनों तक पहुँच, प्रतिनिधित्व और शक्ति-संतुलन से जुड़ा एक गहरा सामाजिक-आर्थिक संकट भी है। नई दिल्ली में 8 अक्टूबर 2026 को आयोजित एक विशेष चर्चा में विशेषज्ञों ने एकमत होकर कहा कि जलवायु नीतियों और विकास कार्यक्रमों में जेंडर दृष्टिकोण को केंद्रीय स्थान दिया जाना अनिवार्य है।

पुस्तक विमोचन और चर्चा का संदर्भ

चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) ने राष्ट्रीय राजधानी में 'जेंडरिंग क्लाइमेट फ्यूचर्स: गर्म होती दुनिया में सत्ता, वित्त और न्याय' शीर्षक से एक नई पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक कल्याणी शुक्ला और सैंड्रा कुरियन द्वारा संपादित है और दक्षिण एशिया तथा भारत पर विशेष ध्यान केंद्रित करती है।

पुस्तक में संवेदनशीलता, संसाधनों तक पहुँच, निर्णय-निर्माण की क्षमता, जलवायु वित्त और न्यायपूर्ण संक्रमण जैसे अहम मुद्दों को शामिल किया गया है। इसमें नीति विश्लेषण, केस स्टडी, फेमिनिस्ट पॉलिटिकल इकोलॉजी, जमीनी अनुभव और मात्रात्मक शोध — सभी को एकीकृत दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।

महिलाओं पर अनुपातहीन प्रभाव

CRF के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का बोझ महिलाओं पर अनुपातहीन रूप से अधिक पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका और शिक्षा दोनों प्रभावित होती हैं। उन्होंने भूमि-स्वामित्व के महत्व पर विशेष ज़ोर दिया — उनके अनुसार, भूमि पर महिलाओं का अधिकार उन्हें ऋण, वित्तीय सहायता और जलवायु-अनुकूल निवेश तक पहुँचने में सक्षम बनाता है।

प्रियदर्शी ने यह भी रेखांकित किया कि जलवायु नीति में जेंडर को पूरक विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक केंद्रीय तत्व के रूप में देखा जाना चाहिए — तभी संवेदनशीलता, अनुकूलन और न्याय के मुद्दों को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकेगा।

संस्थागत बाधाएँ और डेटा की कमी

विशेषज्ञों ने बताया कि जलवायु और रोज़गार नीतियों में जेंडर दृष्टिकोण को मुख्यधारा में लाने के सामने गंभीर संस्थागत बाधाएँ हैं। विभिन्न विभागों और हितधारकों के बीच समन्वय की कमी को एक प्रमुख चुनौती के रूप में चिह्नित किया गया।

पैनलिस्टों ने जेंडर-आधारित आंकड़ों की उपलब्धता बढ़ाने की ज़रूरत पर भी बल दिया। उनका कहना था कि इससे जलवायु परिवर्तन के आर्थिक व सामाजिक प्रभावों को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा और प्रभावी नीतियाँ बनाने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों की सिफारिशें

चर्चा में एकमत राय यह रही कि जलवायु और विकास कार्यक्रमों के प्रारंभिक डिज़ाइन चरण से ही जेंडर पहलुओं को शामिल किया जाए — बाद में जोड़ने की बजाय योजना का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए। विशेषज्ञों ने महिलाओं की भूमि, वित्त, तकनीक, डेटा और सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच मज़बूत करने की भी पुरज़ोर वकालत की।

यह भी सुझाया गया कि जटिल शोध और आंकड़ों को नीति-निर्माताओं तथा आम जनता के लिए सरल, प्रासंगिक और उपयोगी संदेशों में बदलने के लिए संवाद और संचार रणनीतियों को और सशक्त किया जाए।

पैनल में कौन थे

चर्चा का संचालन TERI की वरिष्ठ फेलो डॉ. मिनी गोविंदन ने किया। पैनल में आरती आहूजा (पूर्व श्रम एवं रोज़गार सचिव), डॉ. निखिल राज, पिंकी प्रधान और डॉ. अदिति कपूर सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल रहे।

गौरतलब है कि यह चर्चा ऐसे समय में हुई है जब भारत COP प्रतिबद्धताओं और राष्ट्रीय जलवायु कार्ययोजनाओं में जेंडर समावेश को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव में है। विशेषज्ञों की यह राय नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि जलवायु कार्रवाई को सामाजिक न्याय के लेंस से अलग नहीं देखा जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

परंतु डेटा संग्रह की जिम्मेदारी और उपयोग का ढाँचा अभी तक स्पष्ट नहीं है। जब तक इन सिफारिशों को मापने योग्य नीतिगत लक्ष्यों से नहीं जोड़ा जाता, ये विमर्श अकादमिक दायरे से बाहर निकलकर ज़मीन पर असर नहीं छोड़ पाएगा।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जलवायु परिवर्तन और जेंडर असमानता का क्या संबंध है?
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव महिलाओं पर अनुपातहीन रूप से अधिक पड़ता है क्योंकि वे कृषि, जल संग्रह और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक निर्भर होती हैं। भूमि-स्वामित्व, वित्त और तकनीक तक उनकी सीमित पहुँच उनकी अनुकूलन क्षमता को और कमज़ोर बनाती है।
'जेंडरिंग क्लाइमेट फ्यूचर्स' पुस्तक किस बारे में है?
यह पुस्तक कल्याणी शुक्ला और सैंड्रा कुरियन द्वारा संपादित है और दक्षिण एशिया एवं भारत में जेंडर व जलवायु परिवर्तन के अंतर्संबंधों का अध्ययन करती है। इसमें जलवायु वित्त, न्यायपूर्ण संक्रमण, निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी और नीति विश्लेषण सहित कई पहलुओं को शामिल किया गया है।
जलवायु नीति में जेंडर दृष्टिकोण को शामिल करने में क्या बाधाएँ हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार, संस्थागत बाधाएँ और सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। इसके साथ ही जेंडर-आधारित डेटा की अपर्याप्त उपलब्धता भी प्रभावी नीति-निर्माण में रुकावट बनती है।
महिलाओं के भूमि स्वामित्व का जलवायु अनुकूलन से क्या संबंध है?
CRF अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी के अनुसार, भूमि पर स्वामित्व महिलाओं को ऋण, वित्तीय सहायता और जलवायु-अनुकूल निवेश तक पहुँचने में सक्षम बनाता है। भूमि अधिकार के बिना महिलाएँ जलवायु परिवर्तन के आर्थिक झटकों से खुद को बचाने में असमर्थ रहती हैं।
इस चर्चा में विशेषज्ञों ने क्या मुख्य सिफारिशें दीं?
विशेषज्ञों ने सिफारिश की कि जलवायु और विकास कार्यक्रमों के प्रारंभिक डिज़ाइन चरण से ही जेंडर पहलुओं को शामिल किया जाए। इसके अलावा जेंडर-आधारित डेटा संग्रह को बढ़ाना, महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा व तकनीक तक पहुँच मज़बूत करना और शोध को नीति-निर्माताओं के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करना भी ज़रूरी बताया गया।
राष्ट्र प्रेस
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