मरुथु पांडियार बंधुओं की 223वीं पुण्यतिथि पर CM विजय ने अर्पित की श्रद्धांजलि, जंबूद्वीप घोषणापत्र को किया याद
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 24 अक्टूबर 2026 को मरुथु पांडियार बंधुओं की 223वीं पुण्यतिथि पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। विजय ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में पेरिया मरुथु और चिन्ना मरुथु के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध असाधारण साहस, बलिदान और अग्रणी योगदान को रेखांकित किया। 24 अक्टूबर 1801 को तिरुपथुर किले में फाँसी चढ़े इन दोनों स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत तमिलनाडु के इतिहास में एक अमर अध्याय है।
मुख्यमंत्री की श्रद्धांजलि और संदेश
मुख्यमंत्री विजय ने अपनी पोस्ट में कहा कि शिवगंगा पर शासन करने वाले और अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देने वाले इन बंधुओं को उनकी वीरता और समर्पण के लिए स्थायी सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया कि इन भाइयों का प्रतिरोध 1857 के विद्रोह से भी पहले हुआ था, जिसे व्यापक रूप से भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है।
विजय ने कहा कि अपनी राज्य की सीमाओं से परे औपनिवेशिक प्रभुत्व के विरुद्ध जनता को एकजुट करने के उनके प्रयासों में एक व्यापक दूरदर्शिता झलकती थी। उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु की धरती पर स्वतंत्रता की भावना का बीज बोने वाले इन बंधुओं की वीरतापूर्ण विरासत पीढ़ियों तक कायम रहेगी।
जंबूद्वीप घोषणापत्र का ऐतिहासिक महत्त्व
मुख्यमंत्री ने जंबूद्वीप घोषणापत्र का विशेष उल्लेख किया, जो जून 1801 में जारी किया गया था। इस घोषणापत्र में सामाजिक और धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर समस्त जनता से यूरोपीय औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में एकजुट होने की अपील की गई थी।
गौरतलब है कि इस घोषणापत्र का महत्त्व इसलिए भी अद्वितीय है क्योंकि इसने प्रतिरोध को केवल एक शासक या राज्य के अधिकार पर विवाद के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक सामूहिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। यह उस युग की एक असाधारण राजनीतिक सोच थी जब 'राष्ट्रवाद' की अवधारणा भारत में अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पाई थी।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सशस्त्र संघर्ष
पेरिया मरुथु और चिन्ना मरुथु, जिन्हें मरुथु पांडियार बंधु भी कहा जाता है, दक्षिण भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सबसे दुर्जेय विरोधियों में से एक थे। शिवगंगा की रानी वेलू नाचियार से संबद्ध ये दोनों भाई कंपनी के विस्तारवादी इरादों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध के प्रमुख नेता बने।
जून 1801 में चले अभियान के दौरान विद्रोही बलों ने तिरुप्पाचेथी और परमाकुडी के आसपास कंपनी की टुकड़ियों पर बार-बार हमले किए और विभिन्न दिशाओं से आक्रमण करके ब्रिटिश सैनिकों को पीछे हटने पर विवश किया। स्थानीय भूभाग की गहरी जानकारी का उपयोग करते हुए उन्होंने ब्रिटिश ठिकानों और काफिलों पर भी हमले किए।
बलिदान और अमर विरासत
अपने दृढ़ प्रतिरोध के बावजूद दोनों भाई अंततः पकड़े गए। अंग्रेजों ने 24 अक्टूबर 1801 को तिरुपथुर किले में उन्हें फाँसी दे दी, जिससे उनके सशस्त्र संघर्ष का क्रूर अंत हुआ। यह शहादत तमिलनाडु के औपनिवेशिक-विरोधी इतिहास का एक अमिट हिस्सा बन गई।
मुख्यमंत्री विजय की श्रद्धांजलि में उनके युद्धक्षेत्र के शौर्य के साथ-साथ उस व्यापक राजनीतिक संदेश को भी याद किया गया कि विदेशी शासन से मुक्ति के लिए जनता की एकता ही सबसे बड़ा हथियार है। उनकी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।