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क्या फल्गुनी और दशरथ की कहानी हमें हिम्मत नहीं देती?

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क्या फल्गुनी और दशरथ की कहानी हमें हिम्मत नहीं देती?

सारांश

दशरथ मांझी की प्रेरणादायक कहानी एक सच्ची गाथा है, जो हमें यह सिखाती है कि दृढ़ संकल्प और मेहनत से असंभव को संभव बनाया जा सकता है। उनकी संघर्ष और साहस की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

मुख्य बातें

संघर्ष और संकल्प से असंभव को संभव बनाया जा सकता है।
दशरथ मांझी की कहानी प्रेरणा का स्रोत है।
महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी।
समाज में समानता का संदेश फैलाया।
एक व्यक्ति की कड़ी मेहनत से बदलाव संभव है।

नई दिल्ली, 13 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। ‘भगवान के भरोसे मत बैठिए, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो!’ यह केवल एक संवाद नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की जीवन दृष्टि का परिचायक है, जिसने हमें सिखाया कि यदि इंसान ठान ले, तो वह पत्थर को भी चीरकर रास्ता बना सकता है। हम बात कर रहे हैं ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की।

बिहार के गया जिले की तपती भूमि और गेहलौर की पथरीली पहाड़ियों के बीच यह कहानी एक लोककथा जैसी लगती है, लेकिन यह सच में पसीने से लिखी गई एक ऐसी इबारत है, जिसे समय कभी नहीं मिटा सकेगा।

इस कहानी की शुरुआत किसी युद्ध से नहीं, बल्कि एक गहरी टीस और अधूरे प्रेम से होती है। 1959 की एक गर्म दोपहर, गेहलौर की दुर्गम पहाड़ियों पर दशरथ मांझी मिट्टी खोद रहे थे। उनकी पत्नी, फल्गुनी देवी, उनके लिए दोपहर का खाना लेकर आ रही थीं। तपती धूप और नुकीली चट्टानों के बीच फल्गुनी का पैर फिसल गया और वह गहरी खाई में गिर गईं।

वजीरगंज का अस्पताल गाँव से केवल 15 किलोमीटर की दूरी पर था, लेकिन बीच में खड़े अभेद्य पहाड़ के कारण यह दूरी 70 किलोमीटर में तब्दील हो गई थी। जब तक दशरथ उन्हें अस्पताल ले जाने की कोशिश करते, फल्गुनी ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। उसी दिन, उसी क्षण, एक भूमिहीन मजदूर ने उस विशाल पहाड़ को चुनौती दी, “जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।”

1960 में जब दशरथ ने पहली बार पहाड़ पर हथौड़ा चलाया, तो लोगों ने उन्हें ‘पागल’ कहा। गाँव वालों को लगा कि पत्नी के वियोग में इस व्यक्ति ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। क्वार्टजाइट की वे कठोर चट्टानें, जो 1.6 बिलियन साल पुरानी थीं, एक साधारण छेनी और हथौड़े से टूटने वाली नहीं थीं।

लेकिन दशरथ का अनुशासन फौलादी था। वे सुबह जल्दी उठते, दिनभर खेतों में काम करते ताकि घर का चूल्हा जल सके, और फिर दोपहर से देर रात तक उस पहाड़ को तराशते। जब चट्टानें बहुत सख्त होतीं, तो वह उन पर सूखी लकड़ी जलाते और फिर अचानक पानी डाल देते। ऊष्मीय तनाव से चट्टानें चटकतीं और वह फिर से प्रहार करते। उनके हाथ छिलते रहे, पैर जख्मी हुए, लेकिन उनका संकल्प चट्टान से भी भारी था।

22 साल बीत गए। 1982 तक उन्होंने अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊँचा रास्ता बना दिया। वह पहाड़ जो कभी मौत का कारण बना था, अब जीवन की राह दे रहा था। अत्री और वजीरगंज की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर केवल 15 किलोमीटर रह गई।

दशरथ मांझी जिस ‘मुसहर’ समुदाय से आते थे, उसे समाज के सबसे निचले पायदान पर रखा गया था। उनके इस ‘पागलपन’ ने पूरे इलाके की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बदल दिया। अब बच्चों के लिए स्कूल और बीमारों के लिए अस्पताल निकट थे।

हैरानी की बात यह है कि जिस पहाड़ को उन्होंने 22 साल में काटा, उसे पक्की सड़क में तब्दील करने में सरकार को दशकों लग गए। 2011 में, उनकी मृत्यु के 4 साल बाद जाकर उस मार्ग पर डामर बिछाया गया। उन्हें ‘बिहार रत्न’ से सम्मानित किया गया और उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी हुआ। दशरथ मांझी की मृत्यु 17 अगस्त 2007 को हुई थी।

दशरथ मांझी की इस अद्वितीय गाथा को 2015 में निर्देशक केतन मेहता ने फिल्म ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ के माध्यम से वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने पर्दे पर दशरथ के किरदार को जिस जीवंतता से निभाया, उसने दर्शकों को झकझोर दिया।

आज के समय में, गेहलौर की वह घाटी एक तीर्थ स्थल जैसी है। वहाँ दशरथ मांझी का भव्य स्मारक और प्रतिमा स्थापित है। एसबीआई फाउंडेशन जैसे संस्थान ‘सम्मान’ कार्यक्रम के जरिए गाँव में शिक्षा और एम्बुलेंस सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल है।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दशरथ मांझी ने कितने साल तक पहाड़ को काटा?
दशरथ मांझी ने 22 वर्षों तक पहाड़ को काटकर रास्ता बनाया।
उनकी कहानी पर कौन सी फिल्म बनी?
दशरथ मांझी की कहानी पर फिल्म 'मांझी: द माउंटेन मैन' बनी है, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मुख्य भूमिका निभाई है।
दशरथ मांझी को किस सम्मान से नवाजा गया?
उन्हें 'बिहार रत्न' से सम्मानित किया गया और उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी हुआ।
दशरथ मांझी की मृत्यु कब हुई?
दशरथ मांझी की मृत्यु 17 अगस्त 2007 को हुई थी।
राष्ट्र प्रेस
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