क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारत की पहचान को समझाया?

Click to start listening
क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारत की पहचान को समझाया?

सारांश

शब्दोत्सव 2026 में डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारत के राष्ट्र और पश्चिम के नेशन की तुलना की। जानें, उनके विचारों में क्या खास है!

Key Takeaways

  • भारत का राष्ट्र और पश्चिम का नेशन अलग हैं।
  • अध्यात्म हमारी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • शिक्षा में डीकॉलोनाइजेशन की आवश्यकता है।
  • भारत एक उद्योग प्रधान देश था।
  • स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य ने 'शब्दोत्सव 2026' कार्यक्रम में डीकॉलोनाइजेशन पर अपने विचार साझा किए।

डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा, "शब्दों के अर्थ को समझना अत्यंत आवश्यक है। दो शब्द 'रिलीजन' और 'धर्म' हैं। ये समानार्थी नहीं हैं। इन्हें समानार्थी समझने से भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। 'रिलीजन' एक उपासना पद्धति है, जबकि 'धर्म' का कॉन्सेप्ट भारत के बाहर कहीं नहीं मिलता।"

उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने 1893 के शिकागो भाषण में गर्व से कहा था कि संस्कृत में अंग्रेजी 'एक्सक्लूजन' (बहिष्कार) का कोई समानार्थी शब्द नहीं है, क्योंकि हम किसी का बहिष्कार करते ही नहीं हैं। इसी प्रकार, भारत का राष्ट्र और पश्चिम का नेशन अलग हैं। पश्चिम का नेशन 16वीं शताब्दी का उपज है, जो चर्च के थियोक्रेटिक स्टेट की प्रतिक्रिया में वहां के स्टेट आधारित नेशनलिज्म का परिणाम है। जबकि, भारत में राष्ट्र का उल्लेख ऋग्वेद काल से है, जो राज्य आधारित नहीं है। अंग्रेजों के पहले भारत में एक शासक नहीं था; अनेक राजा थे, लेकिन समाज एक था। समाज को जोड़ने वाला तत्व भारत का दृष्टिकोण था, जिसका आधार अध्यात्म था।

उन्होंने कहा, "हम दक्षिणपंथी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विचार के हैं। राष्ट्र और भारत की अवधारणा अध्यात्म पर आधारित है, जबकि वामपंथी इसे नहीं मानते। उनका इतिहास भी बहुत आधुनिक है। भारत का समाज और राष्ट्र जीवन बहुत प्राचीन है। हम अपनी शब्दावली का उपयोग करते हुए अपनी बात कहने का प्रयास करेंगे, ताकि भारत का सामान्य आदमी जल्दी समझ सके। शिक्षा में डीकॉलोनाइजेशन की शुरुआत होनी चाहिए। शिक्षा के उद्देश्यों और सामग्री में बदलाव आवश्यक है। डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1948 में एक हायर एजुकेशन कमीशन नियुक्त हुआ था, जिसमें अच्छे सुझाव दिए गए थे, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया गया। उन्होंने आध्यात्मिक बातें कही हैं, जिन्हें पढ़ना चाहिए। जिन सरकारों ने कोठारी कमीशन की नियुक्ति की, उन्होंने राधाकृष्णन के कमीशन को लागू नहीं किया। उन्होंने कहा कि भारत की वैचारिक जगत का ग्रेविटेशन सेंटर यूरोप है, जिसे भारत में आना चाहिए।"

वैद्य ने कहा कि वर्तमान में इजरायल और हमास के बीच युद्ध चल रहा है, जिसे पूरी दुनिया मिडिल ईस्ट क्राइसिस कह रही है। वर्षों से हम यही कहते आ रहे हैं, जिसका मतलब है कि यह कहने वाला इंग्लैंड में बैठा है। भारत संप्रभु देश है, तो उनकी भाषा क्यों उपयोग करें? भारत के विदेश विभाग ने इसे वेस्ट एशिया क्राइसिस कहना शुरू किया है। हम भारत हैं। हमारे लिए इंग्लैंड पश्चिम और जापान पूर्व है। यहीं से बदलाव शुरू होना चाहिए। हमें भारतीय दंड संहिता को भारतीय न्याय संहिता में परिवर्तित करना होगा। इसी तरह शिक्षा में भी बदलाव की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि आज की शिक्षा नौकरी मांगने पर आधारित है, लेकिन अंग्रेजों से पहले भारत में कोई जॉब नहीं करता था। भारत एक उद्योग प्रधान देश था। हमें सिखाया गया कि भारत कुर्सी प्रधान है। खेती अच्छी थी, और यह उद्योग प्रधान भी था। हमने कभी अनाज बेचा नहीं, केवल खाया है और खिलाया है।

—राष्ट्र प्रेस

एससीएच/एबीएम

Point of View

NationPress
05/01/2026

Frequently Asked Questions

शब्दोत्सव 2026 में डॉ. मनमोहन वैद्य ने क्या कहा?
डॉ. मनमोहन वैद्य ने शब्दों के अर्थ और भारत की पहचान पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
डीकॉलोनाइजेशन का क्या महत्व है?
डीकॉलोनाइजेशन का मतलब है अपने विचारों और भाषाओं को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करना।
Nation Press