बड़ा फैसला: डीजीसीए अधिकारी देवुला और भरत माथुर को 6 मई तक न्यायिक हिरासत, ड्रोन इम्पोर्ट में 2.5 लाख की रिश्वत
सारांश
Key Takeaways
- राऊज एवेन्यू कोर्ट ने 24 अप्रैल 2025 को दोनों आरोपियों को 6 मई 2025 तक न्यायिक हिरासत में भेजा।
- सीबीआई ने 18 अप्रैल 2025 को मुदावत देवुला और भरत माथुर को रंगे हाथ गिरफ्तार किया था।
- ड्रोन आयात की अनुमति के बदले 2.5 लाख रुपए की रिश्वत लेने का आरोप है।
- छापेमारी में 37 लाख रुपए नकद, सोने-चांदी के सिक्के और डिजिटल डिवाइस बरामद हुए।
- मुदावत देवुला डीजीसीए के एयरवर्थनेस डायरेक्टरेट में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर थे।
- भरत माथुर ने डीजीसीए अधिकारी और निजी एयरोस्पेस कंपनी के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाई।
नई दिल्ली: दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने 24 अप्रैल 2025 को ड्रोन आयात से जुड़े रिश्वतखोरी मामले में डीजीसीए के वरिष्ठ अधिकारी मुदावत देवुला और निजी कंपनी के अधिकारी भरत माथुर को 6 मई 2025 तक न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने 18 अप्रैल को दोनों को रंगे हाथ गिरफ्तार किया था और मौके से 2.5 लाख रुपए नकद बरामद किए गए थे।
मामले का पूरा घटनाक्रम
सीबीआई की हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद दोनों आरोपियों को राऊज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया गया। अदालत ने सुनवाई के दौरान दोनों को 6 मई 2025 तक न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश दिया।
इससे पहले अदालत ने दोनों की सीबीआई हिरासत दो दिन के लिए बढ़ाई थी, जिससे जांच एजेंसी को पूछताछ का अतिरिक्त समय मिला। अब न्यायिक हिरासत के दौरान मामले की आगे की सुनवाई जारी रहेगी।
आरोप और बरामदगी का विवरण
मुदावत देवुला पर आरोप है कि उन्होंने डीजीसीए में अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एक निजी एयरोस्पेस कंपनी के ड्रोन आयात से जुड़े आवेदनों पर मंजूरी दिलाने के बदले 2.5 लाख रुपए की रिश्वत ली।
सीबीआई ने जब दोनों आरोपियों के घरों और दफ्तरों पर छापे मारे तो वहां से 37 लाख रुपए नकद, सोने-चांदी के सिक्के और अनेक डिजिटल डिवाइस बरामद हुए। यह बरामदगी मामले की गंभीरता को और अधिक उजागर करती है।
भरत माथुर, जो एक बड़े कॉर्पोरेट ग्रुप में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत हैं और एक एयरोस्पेस कंपनी से भी संबद्ध हैं, ने डीजीसीए अधिकारी और निजी कंपनी के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाई।
आरोपियों की पृष्ठभूमि और पद
मुदावत देवुला डीजीसीए के एयरवर्थनेस डायरेक्टरेट में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर कार्यरत थे। उनकी जिम्मेदारी यह तय करना थी कि कोई विमान या ड्रोन उड़ान के लिए सुरक्षित है या नहीं — यानी वे एक अत्यंत संवेदनशील और जिम्मेदार पद पर थे।
इस पद पर बैठे अधिकारी का भ्रष्टाचार में लिप्त होना न केवल नागरिक उड्डयन क्षेत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि देश की विमानन सुरक्षा के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
व्यापक संदर्भ और विश्लेषण
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारत सरकार ड्रोन नीति को उदार बनाने और ड्रोन उद्योग को बढ़ावा देने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही है। पीएलआई स्कीम के तहत ड्रोन निर्माण और आयात को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। ऐसे में नियामक संस्था के भीतर भ्रष्टाचार पूरी नीति की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
गौरतलब है कि डीजीसीए में यह पहला भ्रष्टाचार का मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में नागरिक उड्डयन क्षेत्र में अनियमितताओं की कई शिकायतें सामने आई हैं। सीबीआई की यह कार्रवाई एक स्पष्ट संकेत है कि नियामक संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत है।
आलोचकों का कहना है कि ड्रोन आयात की अनुमति प्रक्रिया लंबे समय से जटिल और अपारदर्शी रही है, जिससे भ्रष्टाचार के लिए अनुकूल वातावरण बना। यदि प्रक्रियाएं सरल और डिजिटल होतीं, तो ऐसे बिचौलियों की भूमिका स्वतः सीमित हो जाती।
आगे क्या होगा
6 मई 2025 को दोनों आरोपियों को पुनः अदालत में पेश किया जाएगा, जहां मामले की अगली सुनवाई होगी। सीबीआई बरामद डिजिटल डिवाइस और दस्तावेजों की जांच कर रही है, जिससे मामले में और अधिक खुलासे होने की संभावना है।
यह भी देखना होगा कि क्या जांच एजेंसी इस मामले में अन्य संभावित आरोपियों तक पहुंचती है और क्या डीजीसीए की आंतरिक जांच शुरू होती है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय की प्रतिक्रिया और संभावित नीतिगत सुधार भी आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण होंगे।