डॉ. राजेंद्र प्रसाद: स्वतंत्रता संग्राम से लेकर राष्ट्रपति भवन तक की सादगी की कहानी
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नई दिल्ली, 27 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत की धरती वीर सपूतों, स्वतंत्रता सेनानियों और ऐसे राजनेताओं से भरी हुई है जिन्होंने अपने जीवन को केवल देश की सेवा में समर्पित किया। इनमें से एक प्रसिद्ध व्यक्तित्व हैं देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद। बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में जन्मे इस महान आत्मा की आज पुण्यतिथि है। उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के ज्ञाता थे।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सादगी का यह आलम था कि उन्होंने 12 वर्षों तक देश के सर्वोच्च पद (राष्ट्रपति) पर रहते हुए भी अपनी जीवनशैली को एक सामान्य व्यक्ति के समान बनाए रखा। उन्होंने अपनी साधारणता में वह सरलता बनाए रखी, जिससे समाज का सबसे गरीब व्यक्ति भी उनसे जुड़ाव महसूस कर सके। उनके निश्छल व्यक्तित्व में हर किसी के लिए नजदीकी थी।
उनकी नैतिकता और सादगी की अद्भुत मिसाल तब देखने को मिली, जब राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी उन्होंने अपने स्वास्थ्य के बिगड़ने के बावजूद किसी भी सरकारी सुविधा को स्वीकार नहीं किया। सुख-सुविधाओं का मोह छोड़कर वे पटना के उस जर्जर खपरैल मकान में लौटे, जहां से उनका राजनीतिक सफर आरंभ हुआ था। उन्होंने कहा था, 'मैं वहीं लौटूंगा, जहां से आया हूं।'
डॉ. राजेंद्र प्रसाद उन गिनती के राष्ट्रपतियों में से थे, जिन्होंने पद के वैभव के बजाय जनसेवा और मितव्ययिता को प्राथमिकता दी। उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति का मासिक वेतन 10,000 रुपये था, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से केवल 5,000 रुपये स्वीकार किए। उनके आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता ऐसी थी कि बाद के वर्षों में उन्होंने अपने वेतन का केवल 25 प्रतिशत (2,500 रुपये) ही लिया।
वे अपने अधिकांश व्यक्तिगत कार्य स्वयं करने के इच्छुक थे। उन्होंने कभी भी विलासिता की सरकारी सुख-सुविधाओं का उपयोग नहीं किया और केवल एक सहायक रखा। इसके अलावा, सार्वजनिक जीवन में शुचिता बनाए रखने के लिए उन्होंने किसी भी प्रकार के उपहार स्वीकार नहीं किए।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद बचपन से ही मेधावी रहे। मात्र पांच वर्ष की आयु में उन्होंने फारसी की शिक्षा प्रारंभ की। प्रारंभिक शिक्षा छपरा जिला स्कूल से प्राप्त करने के बाद उन्होंने कलकत्ता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। 1902 में इंटरमीडिएट परीक्षा पहले स्थान से उत्तीर्ण होने पर उन्हें रॉबर्ट फैलोशिप से सम्मानित किया गया। आगे चलकर उन्होंने अर्थशास्त्र में एमए तथा 1915 में विधि स्नातक (एलएलबी) में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ लॉ की उपाधि पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे।
वकालत में अपार सफलता के बावजूद उनका मन राष्ट्रसेवा की ओर आकर्षित हुआ। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अपनी सफल वकालत छोड़ दी और पूरी तरह से देश की आजादी के लिए समर्पित हो गए। चंपारण सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन तथा व्यक्तिगत सत्याग्रह जैसे आंदोलनों में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जेल यात्राओं और कठिनाईयों के बावजूद वे कभी विचलित नहीं हुए।
डॉ. प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष कई बार चुने गए। उनकी संगठन क्षमता, शांत स्वभाव और निष्पक्ष दृष्टिकोण ने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व के शीर्ष पर स्थापित किया। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंतिम रूप देने में उन्होंने अध्यक्ष के रूप में कुशलता से संचालन किया।
26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। वे एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्हें लगातार दो कार्यकाल के लिए चुना गया। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उन्होंने एक साधारण जीवन जिया, खादी के वस्त्र, शाकाहारी भोजन और नियमित प्रार्थना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थे। राष्ट्रपति पद के अलावा, उन्होंने भारत के पहले मंत्रिमंडल में 1946 और 1947 में कृषि और खाद्य मंत्री का पद भी संभाला। 1962 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रपति पद से अवकाश लेने के बाद वे 14 मई 1962 को पटना लौट आए और सदाकत आश्रम में रहने लगे। 28 फरवरी 1963 को बिहार विद्यापीठ परिसर में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। जिस कक्ष में उन्होंने जीवन का अंतिम समय बिताया, उसे संग्रहालय का रूप दे दिया गया, जहां आज भी उनकी स्मृतियां जीवित हैं।
'देशरत्न' के नाम से विख्यात डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन त्याग, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर गणतंत्र भारत के निर्माण तक उनका योगदान अविस्मरणीय है। आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा राष्ट्र कृतज्ञता के साथ उन्हें याद कर रहा है, और उनकी जीवनगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।