भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्मश्री सम्मान, 25 मई को दिल्ली में होंगे पुरस्कृत
सारांश
मुख्य बातें
अलवर के प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। 25 मई को नई दिल्ली में आयोजित समारोह में उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया जाएगा। 25 जनवरी को भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों की घोषणा की थी, जिसमें गफरुद्दीन का नाम शामिल होते ही अलवर के लोक कलाकारों में उत्साह की लहर दौड़ गई।
जिंदगी भर के संघर्ष का फल
गफरुद्दीन मेवाती जोगी ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से इतने वर्षों बाद यह पुरस्कार मिल रहा है, जिससे उन्हें काफी खुशी हो रही है। उन्होंने कहा, 'यह पुरस्कार मुझे 20-25 साल पहले मिल जाना चाहिए था।' उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया।
बचपन में गफरुद्दीन अपने पिता के साथ घर-घर जाकर भगवान शिव के भजन और महाभारत काल के दोहे गाते थे और उसी से मिले आटे से परिवार का पेट भरता था। आटा मांगकर जीवन यापन करने से लेकर 60 से अधिक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन करने तक का उनका सफर अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा है।
भपंग की विरासत और वैश्विक पहचान
भगवान शिव के डमरू से प्रेरित वाद्य यंत्र भपंग को गफरुद्दीन मेवाती पुश्तैनी परंपरा से बजाते आ रहे हैं। वह वर्ष 1992 में पहली बार विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करने गए थे और तब से अब तक लगभग 60 देशों में भपंग की धुन गूँजा चुके हैं। मूल रूप से भरतपुर जिले के निवासी गफरुद्दीन वर्ष 1978 में अलवर आए थे।
उनके बेटे शाहरुख मेवाती जोगी इस परंपरा की आठवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। शाहरुख ने मेवात संस्कृति पर पीएचडी की है और परिवार के अन्य बच्चे भी भपंग वादन में दक्ष हैं। भपंग के साथ महाभारत की कथाओं को मेवात क्षेत्र में 'पांडव कड़े' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
सरकारी योजनाओं के प्रचार में योगदान
68 वर्षीय गफरुद्दीन ने बताया कि वह भपंग वादन के माध्यम से केंद्र और राजस्थान सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का गाँव-गाँव प्रचार करते हैं। राजस्थान सरकार की ग्राम रथ योजना के तहत वह लोगों को तलैया खुदवाने, तारबंदी, पशु टीकाकरण और जीवन बीमा जैसी योजनाओं की जानकारी देते हैं।
कला को संरक्षण की दरकार
गफरुद्दीन ने कहा कि उन्होंने संस्कृति को बचाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन कार्यक्रम काफी कम मिलते हैं जिससे गुजारा मुश्किल होता है। उन्होंने सरकार से इस लोक कला को और अधिक बढ़ावा देने और कलाकारों को नियमित रोज़गार दिलाने की माँग की। उन्हें अब तक प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, जिला, राज्य और केंद्र स्तर पर अनेक सम्मान मिल चुके हैं, साथ ही कला अकादमी भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है।
68 वर्षीय गफरुद्दीन का घर भले ही साधारण हो, लेकिन पद्मश्री की घोषणा के बाद बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। यह सम्मान न केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मेवात की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की राष्ट्रीय स्वीकृति भी है।