क्या गंगा सागर मेले को भी राष्ट्रीय मान्यता मिलनी चाहिए?
सारांश
Key Takeaways
- गंगा सागर मेले को राष्ट्रीय मान्यता की आवश्यकता है।
- गंगा सागर पुल का निर्माण आवश्यक है।
- राजनीतिक विवादों के बीच विकास की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
- मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में अनियमितताएं हैं।
- स्थानीय विकास के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा।
कोलकाता, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने कहा कि कुंभ मेले की भांति गंगा सागर मेले का आयोजन भी किया जाता है, लेकिन यह बहुत ही दुखद है कि केंद्र सरकार की तरफ से इसे कोई भी राष्ट्रीय मान्यता नहीं दी गई है और न ही इसके आयोजन में कोई मदद मिलती है।
सोमवार को राष्ट्र प्रेस से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुंभ मेले में भक्तों को जाने के लिए कोई भी जलमार्ग निर्धारित नहीं है। इसी कारण लोग हवाई या सड़क मार्ग का सहारा लेते हैं। वहीं, गंगा सागर मेले में लोग जलमार्ग का उपयोग करते हैं, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी किसी ने यह नहीं सोचा कि गंगा सागर पर एक पुल होना चाहिए। हालांकि, सीएम ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के सहयोग के बिना इस दिशा में कदम उठाने का निर्णय लिया है, जिसका हम सभी स्वागत करते हैं।
कुणाल घोष ने गंगा सागर पुल के निर्माण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इससे आर्थिक विकास की गति तेज होगी और पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी। इससे पूरे राज्य में विकास की रफ्तार को बल मिलेगा, लेकिन यह दुखद है कि आज तक किसी ने इस दिशा में ध्यान नहीं दिया था। सीएम ममता बनर्जी ने इस संबंध में अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना को लागू करने का निर्णय लिया, जिससे कई लोगों को लाभ होगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि सुवेंदु अधिकारी इस मामले में क्यों कमी निकाल रहे हैं। आखिर उन्होंने इतने वर्षों में गंगा सागर पुल के लिए क्या किया है? क्या वह इस मामले में कोई योजना नहीं बना सके? यह उनके लिए शोभा नहीं देता।
कुणाल घोष ने कहा कि जब सीएम ममता बनर्जी यह कदम उठा रही हैं, तो कुछ लोग राजनीतिक दुर्भावना से ग्रस्त होकर राज्य में नकारात्मकता फैलाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सीएम ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में अनियमितताओं का उल्लेख किया है, लेकिन सुवेंदु अधिकारी इस मामले में इस तरह व्यवहार कर रहे हैं जैसे वे चुनाव आयोग के प्रवक्ता हों।
उन्होंने बताया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए अलग नियम हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में अलग। क्या हम इस स्थिति को स्वीकार कर सकते हैं?
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की आड़ में वैध मतदाताओं को परेशान करने का प्रयास किया जा रहा है। बड़ी संख्या में लोग इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से शिकायत कर रहे हैं। जनता अब समझ रही है कि किस तरह से एसआईआर की आड़ में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का मजाक बनाया जा रहा है।