गंगोत्री में प्रदूषण की चेतावनी: उद्गम स्थल से एक दिन में निकले 100 बोरे कपड़े और कचरा
सारांश
Key Takeaways
- 24 अप्रैल को गंगोत्री धाम में एक दिन के स्वच्छता अभियान में लगभग 100 बोरे वस्त्र और कचरा गंगा की धारा से निकाला गया।
- गंगा विचार मंच पिछले 12 वर्षों से जनजागरण अभियान चला रहा है, फिर भी स्थिति में सुधार नहीं।
- श्रद्धालु स्नान के बाद साड़ियां, धोती, कंघी, शीशा, पूजा सामग्री सीधे गंगा में प्रवाहित करते हैं।
- उत्तरकाशी जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने ईटीपी प्लांट और एसएजी रिप्रॉसेसिंग की योजना की जानकारी दी।
- मुद्दे को नमामि गंगे, जल शक्ति मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचाया गया है।
- अभियान में नगर पंचायत गंगोत्री, वन विभाग, गंगोत्री नेशनल पार्क और साधु-संत शामिल हुए।
उत्तरकाशी, 24 अप्रैल। गंगोत्री धाम में प्रदूषण की स्थिति खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है — मां गंगा के पवित्र उद्गम स्थल पर गुरुवार को चलाए गए एक संयुक्त स्वच्छता अभियान में मात्र एक दिन में लगभग 100 बोरे वस्त्र, साड़ियां, पूजा सामग्री और अन्य कचरा गंगा की धारा से निकाला गया। गंगा विचार मंच के नेतृत्व में चले इस अभियान ने उस गंभीर संकट को उजागर किया है, जो हर तीर्थ सीजन में उद्गम स्थल की निर्मलता को नष्ट कर रहा है।
क्या है पूरा मामला
देशभर से लाखों श्रद्धालु हर वर्ष गंगोत्री धाम पहुंचते हैं और स्नान के बाद वस्त्र, धोती, साड़ियां, कंघी, शीशा, शृंगार सामग्री और पुराने कपड़े सीधे गंगा की धारा में प्रवाहित कर देते हैं। यह परंपरा अब पर्यावरणीय संकट का रूप ले चुकी है। स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हर सीजन में यही दृश्य दोहराया जाता है, लेकिन तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ समस्या और विकराल होती जा रही है।
स्वच्छता अभियान में क्या हुआ
गंगा विचार मंच के नेतृत्व में नगर पंचायत गंगोत्री, वन विभाग, गंगोत्री नेशनल पार्क के अधिकारी-कर्मचारी, साधु-संत और स्थानीय लोगों ने मिलकर यह संयुक्त अभियान चलाया। घाटों, किनारों और जलधारा में फंसे कपड़ों और सामग्री को निकालने में कार्यकर्ताओं को घंटों की कड़ी मेहनत करनी पड़ी।
अभियान में नगर पंचायत गंगोत्री के अधिशासी अधिकारी जयानंद सेमवाल, रेंजर प्रदीप बिष्ट, राजबीर रावत, ब्रिज रमोला, दीपक सिंह, खेमराज राणा, महादेव प्रसाद, गोविंद सिंह, विक्रम सिंह, वीरबल राजवार, सतबीर, जयबीर, कुश राणा, श्रीदेव रावत, रेंजर जसवंत चौहान और स्वामी बृजनंद सहित अनेक लोगों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।
गंगा विचार मंच की अपील और चेतावनी
गंगा विचार मंच के प्रदेश संयोजक लोकेंद्र सिंह बिष्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि श्रद्धालु मां गंगा को वस्त्र या अन्य सामग्री अर्पित करना चाहते हैं तो उसे गंगोत्री मंदिर में चढ़ाएं या जरूरतमंद लोगों को दान करें। उन्होंने कहा कि गंगा की धारा में कपड़े और सामग्री बहाने से केवल प्रदूषण फैलता है, मां गंगा इससे प्रसन्न नहीं होतीं।
बिष्ट ने यह भी कहा कि श्रद्धा का अर्थ प्रकृति को नुकसान पहुंचाना नहीं हो सकता। जो लोग जरूरतमंदों को वस्त्र दान करें, मंदिर में चढ़ावा दें या सेवा कार्य करें — वही सच्चा पुण्य है।
मंच पिछले 12 वर्षों से लगातार जनजागरण अभियान चला रहा है। पिछले और इस वर्ष गंगोत्री में कई स्थानों पर बैनर, वाल पेंटिंग और जागरूकता संदेश लगाए गए हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से गंगा में सामग्री न डालने की अपील की गई है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरानी आदत नहीं छोड़ रहे।
प्रशासन की योजना और राष्ट्रीय स्तर पर उठाई गई मांग
उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने कहा कि भविष्य में ईटीपी प्लांट लगाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे परंपरा के अनुसार श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए वस्त्रों को संरक्षित रखा जा सके और साड़ी व शृंगार सामग्री को एसएजी के माध्यम से रिप्रॉसेस किया जा सके।
इस मुद्दे को नमामि गंगे, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, जल शक्ति मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय तक भी पहुंचाया गया है। गंगा विचार मंच ने गंगोत्री मंदिर समिति से भी अपील की है कि मंदिर परिसर और घाटों पर लगातार घोषणाएं कर श्रद्धालुओं को जागरूक किया जाए।
विश्लेषण: आस्था और पर्यावरण के बीच का संकट
यह मामला केवल गंगोत्री तक सीमित नहीं है। हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी जैसे तमाम तीर्थ स्थलों पर यही स्थिति देखी जाती है, जहां धार्मिक आस्था के नाम पर नदियों में कचरा प्रवाहित किया जाता है। गौरतलब है कि नमामि गंगे परियोजना पर केंद्र सरकार अब तक हजारों करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, लेकिन जब तक उद्गम स्थल पर ही प्रदूषण नियंत्रण नहीं होगा, तब तक नीचे की धारा को निर्मल रखने के प्रयास अधूरे रहेंगे। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक प्रशासनिक सख्ती और व्यापक जनजागरूकता साथ-साथ नहीं चलेगी, स्थिति में सुधार कठिन है।
आने वाले दिनों में चारधाम यात्रा के चरम सीजन में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ेगी। ऐसे में प्रशासन, मंदिर समिति और सामाजिक संगठनों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।