गया के जनार्दन मंदिर में जीवित लोग करते हैं खुद का पिंडदान, हज़ारों वर्ष पुरानी अनूठी परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के गयाजी स्थित जनार्दन मंदिर में एक ऐसी दुर्लभ परंपरा सदियों से जीवित है, जो पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती — यहाँ जीवित व्यक्ति अपना स्वयं का पिंडदान करते हैं। पितृ पक्ष के दौरान इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जो आत्मश्राद्ध के इस विलक्षण अनुष्ठान को पूरी आस्था के साथ संपन्न करते हैं।
जनार्दन मंदिर और उसका महत्त्व
जनार्दन मंदिर गया के भस्मकूट पर्वत पर स्थित है और माँ मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में अवस्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु जनार्दन स्वरूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने पर स्वयं भगवान विष्णु पिंड ग्रहण करते हैं और आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है। गयाजी में करीब 54 पिंडदेवी और 53 पवित्र स्थल हैं, किंतु जनार्दन मंदिर की वेदी संसार में एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ जीवित व्यक्ति अपना स्वयं का श्राद्ध करते हैं।
कौन करते हैं जीवित पिंडदान और क्यों
हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति का पिंडदान और तर्पण नहीं होता, तो उसकी आत्मा भटकती रहती है और उसे शांति नहीं मिलती। जिन लोगों की कोई संतान नहीं है या परिवार में पिंडदान करने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं है, वे अपने जीवनकाल में ही यह अनुष्ठान संपन्न करने यहाँ आते हैं। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति परिवार होते हुए भी वैराग्य या संन्यास ग्रहण कर लेते हैं, वे भी इस मंदिर में आत्मश्राद्ध करते हैं।
गयाजी में यह भी प्रचलित मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति जीवित रहते अपना श्राद्ध और पिंडदान कर देता है, तो मृत्यु के पश्चात उसके परिजनों को यह अनुष्ठान दोबारा नहीं करना पड़ता। साथ ही, ऐसा करने से व्यक्ति के सभी पितृ दोष समाप्त हो जाते हैं और मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक या अन्य लोकों में कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
तीन दिन में पूरा होता है आत्मश्राद्ध का अनुष्ठान
जनार्दन मंदिर में आत्मश्राद्ध का यह अनुष्ठान तीन दिन में सम्पन्न होता है। पहले दिन गयाजी तीर्थ में आने पर वैष्णव सिद्धि का संकल्प लिया जाता है और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। इसके बाद भगवान जनार्दन स्वामी के मंदिर में पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और जाप होता है।
अनुष्ठान के अंतर्गत दही और चावल से बने 3 पिंड भगवान को अर्पित किए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि इस अनुष्ठान में तिल का प्रयोग नहीं होता, जबकि मृत व्यक्ति के श्राद्ध में तिल को अनिवार्य माना जाता है — यही इस आत्मश्राद्ध को सामान्य श्राद्ध से अलग करता है।
पिंड अर्पण की विशेष प्रार्थना
पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि वे जीवित रहते हुए अपने लिए स्वयं यह पिंड अर्पित कर रहे हैं, और जब उनकी आत्मा इस शरीर को त्यागे तो भगवान के आशीर्वाद से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो। यह प्रार्थना इस अनुष्ठान के आध्यात्मिक सार को व्यक्त करती है।
पितृ पक्ष में उमड़ती है विशेष भीड़
पितृ पक्ष के दौरान जनार्दन मंदिर में देशभर से श्रद्धालु आत्मश्राद्ध के लिए पहुँचते हैं। यह परंपरा हज़ारों वर्ष पुरानी बताई जाती है और आज भी उतनी ही श्रद्धा एवं आस्था के साथ जीवित है। गयाजी वैसे भी पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूरे भारत में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों में गिना जाता है, और जनार्दन मंदिर उसकी इस विशिष्टता को और भी अद्वितीय बनाता है।