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गया के जनार्दन मंदिर में जीवित लोग करते हैं खुद का पिंडदान, हज़ारों वर्ष पुरानी अनूठी परंपरा

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गया के जनार्दन मंदिर में जीवित लोग करते हैं खुद का पिंडदान, हज़ारों वर्ष पुरानी अनूठी परंपरा

सारांश

बिहार के गयाजी में जनार्दन मंदिर एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ जीवित व्यक्ति अपना खुद का पिंडदान करते हैं। संतानहीन या संन्यासी लोग यहाँ तीन दिन के आत्मश्राद्ध अनुष्ठान से पितृ दोष मुक्ति और मोक्ष की कामना करते हैं — हज़ारों वर्ष पुरानी यह परंपरा आज भी जीवंत है।

मुख्य बातें

गया के भस्मकूट पर्वत स्थित जनार्दन मंदिर विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ जीवित व्यक्ति अपना आत्मश्राद्ध करते हैं।
यह परंपरा मुख्यतः उन लोगों के लिए है जिनकी कोई संतान नहीं है या जिन्होंने संन्यास ग्रहण किया हो।
अनुष्ठान तीन दिन में पूरा होता है — संकल्प, पूजा-जाप और दही-चावल के 3 पिंड अर्पित किए जाते हैं; तिल का उपयोग नहीं होता।
मान्यता है कि जीवित पिंडदान से पितृ दोष समाप्त होते हैं और मृत्यु के बाद परिजनों को पुनः श्राद्ध नहीं करना पड़ता।
गयाजी में 54 पिंडदेवी और 53 पवित्र स्थल हैं, किंतु जनार्दन मंदिर वेदी इनमें सर्वाधिक अनूठी है।

बिहार के गयाजी स्थित जनार्दन मंदिर में एक ऐसी दुर्लभ परंपरा सदियों से जीवित है, जो पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती — यहाँ जीवित व्यक्ति अपना स्वयं का पिंडदान करते हैं। पितृ पक्ष के दौरान इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जो आत्मश्राद्ध के इस विलक्षण अनुष्ठान को पूरी आस्था के साथ संपन्न करते हैं।

जनार्दन मंदिर और उसका महत्त्व

जनार्दन मंदिर गया के भस्मकूट पर्वत पर स्थित है और माँ मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में अवस्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु जनार्दन स्वरूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने पर स्वयं भगवान विष्णु पिंड ग्रहण करते हैं और आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है। गयाजी में करीब 54 पिंडदेवी और 53 पवित्र स्थल हैं, किंतु जनार्दन मंदिर की वेदी संसार में एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ जीवित व्यक्ति अपना स्वयं का श्राद्ध करते हैं।

कौन करते हैं जीवित पिंडदान और क्यों

हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति का पिंडदान और तर्पण नहीं होता, तो उसकी आत्मा भटकती रहती है और उसे शांति नहीं मिलती। जिन लोगों की कोई संतान नहीं है या परिवार में पिंडदान करने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं है, वे अपने जीवनकाल में ही यह अनुष्ठान संपन्न करने यहाँ आते हैं। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति परिवार होते हुए भी वैराग्य या संन्यास ग्रहण कर लेते हैं, वे भी इस मंदिर में आत्मश्राद्ध करते हैं।

गयाजी में यह भी प्रचलित मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति जीवित रहते अपना श्राद्ध और पिंडदान कर देता है, तो मृत्यु के पश्चात उसके परिजनों को यह अनुष्ठान दोबारा नहीं करना पड़ता। साथ ही, ऐसा करने से व्यक्ति के सभी पितृ दोष समाप्त हो जाते हैं और मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक या अन्य लोकों में कष्ट नहीं भोगना पड़ता।

तीन दिन में पूरा होता है आत्मश्राद्ध का अनुष्ठान

जनार्दन मंदिर में आत्मश्राद्ध का यह अनुष्ठान तीन दिन में सम्पन्न होता है। पहले दिन गयाजी तीर्थ में आने पर वैष्णव सिद्धि का संकल्प लिया जाता है और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। इसके बाद भगवान जनार्दन स्वामी के मंदिर में पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और जाप होता है।

अनुष्ठान के अंतर्गत दही और चावल से बने 3 पिंड भगवान को अर्पित किए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि इस अनुष्ठान में तिल का प्रयोग नहीं होता, जबकि मृत व्यक्ति के श्राद्ध में तिल को अनिवार्य माना जाता है — यही इस आत्मश्राद्ध को सामान्य श्राद्ध से अलग करता है।

पिंड अर्पण की विशेष प्रार्थना

पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि वे जीवित रहते हुए अपने लिए स्वयं यह पिंड अर्पित कर रहे हैं, और जब उनकी आत्मा इस शरीर को त्यागे तो भगवान के आशीर्वाद से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो। यह प्रार्थना इस अनुष्ठान के आध्यात्मिक सार को व्यक्त करती है।

पितृ पक्ष में उमड़ती है विशेष भीड़

पितृ पक्ष के दौरान जनार्दन मंदिर में देशभर से श्रद्धालु आत्मश्राद्ध के लिए पहुँचते हैं। यह परंपरा हज़ारों वर्ष पुरानी बताई जाती है और आज भी उतनी ही श्रद्धा एवं आस्था के साथ जीवित है। गयाजी वैसे भी पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूरे भारत में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों में गिना जाता है, और जनार्दन मंदिर उसकी इस विशिष्टता को और भी अद्वितीय बनाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि बढ़ रही है। मुख्यधारा की कवरेज इसे अक्सर 'अजीब परंपरा' के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि यह वास्तव में एक गहरी आध्यात्मिक और सामाजिक सुरक्षा-व्यवस्था है जो सदियों से हाशिये पर रहे व्यक्तियों को मृत्यु-पश्चात की शांति का आश्वासन देती आई है।
RashtraPress
25 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जनार्दन मंदिर गया में जीवित पिंडदान की परंपरा क्या है?
गया के भस्मकूट पर्वत स्थित जनार्दन मंदिर में जीवित व्यक्ति अपना स्वयं का पिंडदान और श्राद्ध करते हैं, जिसे 'आत्मश्राद्ध' कहा जाता है। यह तीन दिन का अनुष्ठान है जिसमें दही-चावल के 3 पिंड भगवान जनार्दन को अर्पित किए जाते हैं।
जीवित पिंडदान कौन लोग करते हैं?
मुख्यतः वे लोग जनार्दन मंदिर में आत्मश्राद्ध करते हैं जिनकी कोई संतान नहीं है या परिवार में पिंडदान करने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं है। इसके अलावा जो व्यक्ति वैराग्य या संन्यास ग्रहण कर लेते हैं, वे भी यह अनुष्ठान करते हैं।
जीवित पिंडदान का क्या लाभ माना जाता है?
मान्यता है कि जीवित पिंडदान से व्यक्ति के सभी पितृ दोष समाप्त हो जाते हैं और मृत्यु के बाद आत्मा को कष्ट नहीं भोगना पड़ता। साथ ही मृत्यु के पश्चात परिजनों को यह अनुष्ठान दोबारा नहीं करना पड़ता और आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
आत्मश्राद्ध अनुष्ठान में तिल का उपयोग क्यों नहीं होता?
सामान्य श्राद्ध में मृत व्यक्ति के लिए तिल का उपयोग अनिवार्य माना जाता है, किंतु जीवित व्यक्ति के आत्मश्राद्ध में तिल नहीं डाला जाता। यही अंतर इसे मृत व्यक्ति के पिंडदान से अलग करता है और इसे 'आत्मश्राद्ध' की विशिष्ट पहचान देता है।
जनार्दन मंदिर कहाँ स्थित है और यहाँ जाने का सबसे अच्छा समय कब है?
जनार्दन मंदिर बिहार के गया जिले में भस्मकूट पर्वत पर माँ मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में स्थित है। पितृ पक्ष के दौरान यहाँ सर्वाधिक भीड़ होती है और आत्मश्राद्ध के लिए यही समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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